जो नाना ने देखा, हमने बाद में समझा
Storytellingआज मैं अपने नाना की ज़िंदगी की कुछ झलकियाँ लिख रहा हूँ। इनमें डर भी है, खोने का दर्द भी, पाने की उम्मीद भी, और कुछ ऐसी घटनाएँ भी हैं जिन पर आज बहुत से लोग शायद यक़ीन न करें। यहाँ मैं वही लिख रहा हूँ, जो नाना की ज़ुबानी मैंने कई बार सुना।
यह वाक़या करीब 1947 के आसपास का है, लेकिन इसकी कहानी उससे पहले शुरू होती है। नाना के पिता एक भारतीय सैनिक थे। फौज की नौकरी के बाद उनका झुकाव पूरी तरह इबादत की ओर हो गया था। वे समझदार और पढ़े-लिखे इंसान थे, और अपना अधिकतर समय इबादत में ही बिताते थे।
उनका इंतकाल भी रहस्यमय परिस्थितियों में हुआ। एक दिन वे घर की छत पर इबादत कर रहे थे। तभी अचानक घरवालों ने देखा कि वे सीढ़ियों से नीचे गिर पड़े। उसी हादसे में उनकी रूह परवाज़ कर गई। हैरानी की बात यह थी कि उनके शरीर पर कोई गंभीर चोट दिखाई नहीं दे रही थी, जबकि पूरी सीढ़ियाँ खून से लथपथ थीं।
उन्होंने यह बात बहुत पहले ही कह दी थी कि उन्हें ग्वालियर में ज़िन्नातों की मस्जिद के पास स्थित कब्रिस्तान में ही दफ़न किया जाए। उनके इंतकाल के बाद उनकी यही इच्छा पूरी की गई।
कुछ दिनों बाद, जब नाना अपने वालिद की कब्र पर ग़मगीन होकर फ़ातिहा पढ़ रहे थे, तभी अचानक कई बकरियाँ आकर उनके आसपास खड़ी हो गईं। उसी समय एक चरवाहे के भेष में कोई उनके पास आया और बोला, “इस ख़ाक में क्या रखा है?”
नाना ने शांत, मगर शायराना अंदाज़ में जवाब दिया, “यह ख़ाक मेरे लिए बहुत क़ीमती है।”
वह कुछ क्षण उन्हें देखते रहे, फिर बोले, “तू अपने बाप का बहुत अच्छा बेटा है। यह दुआ पढ़।”
फिर उन्होंने वह दुआ पढ़कर सुनाई और कहा, “इसे पढ़ने से तू मालामाल हो जाएगा। लेकिन एक शर्त है—किसी से नहीं कहना कि तेरी मुलाकात मुझसे हुई, और यह दुआ भी किसी को नहीं बतानी।”
नाना ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “अगर यह दुआ इतनी असरदार है, तो तुम खुद पढ़कर अमीर क्यों नहीं बन जाते?”
उन्होंने बस इतना कहा, “तू अभी बहुत छोटा है…”
इसके बाद नाना एक किनारे जाकर नमाज़ पढ़ने लगे। जैसे ही उन्होंने सलाम फेरा, वह वहाँ से गायब थे। यहाँ तक कि दूर-दूर तक कोई बकरी भी दिखाई नहीं दी।
नाना का स्वभाव ऐसा था कि वे केवल अपने बारे में नहीं सोचते थे। उनके मन में आया कि जब मेरे अपने लोगों को भी पैसों की ज़रूरत है, तो यह दुआ उनसे क्यों छिपाऊँ?
जब वे दाल बाज़ार पहुँचे, तो वही चरवाहे के भेष वाला उन्हें फिर दिखाई दिया। उसे देखकर नाना थोड़ा सहम गए। वह फिर बोले, “ध्यान रखना, किसी को बताना मत।”
लेकिन नाना ने इस चेतावनी को उतनी गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें लगा—आख़िर दुआ ही तो है।
जब वे अपने करीबियों के पास पहुँचे, तो पूरी घटना सुनाने लगे। पर जैसे ही दुआ बताने का समय आया, अचानक उनका मुँह बंद हो गया। ज़ुबान ने साथ छोड़ दिया। गले में जैसे काँटे चुभने लगे। दर्द इतना बढ़ गया कि वे खड़े-खड़े ही नहीं, बैठे-बैठे भी गिर पड़ने लगे।
दो दिन तक वे उसी तकलीफ़ में रहे। फिर एक रात वही हस्ती दोबारा उनके पास आई। उन्होंने उँगली से इशारा करते हुए कहा, “देख… यह सब तेरा था। यह सब तेरा होने वाला था…”
नाना ने देखा कि जहाँ उन्होंने इशारा किया, वहाँ सोने और जवाहरात का ढेर लगा हुआ था। लेकिन पल भर में सब कुछ गायब हो गया।
नाना की वालिदा ही नहीं, बल्कि बाकी करीबी भी इन बातों से अनजान नहीं थे। इसलिए वे सब मिलकर नाना को एक बुज़ुर्ग के पास ले गए, जो उनकी परेशानी का हल निकाल सकते थे।
नाना के साथ गए लोगों ने पूरी घटना उन बुज़ुर्ग के सामने रखी। इसके बाद उन्होंने अपने तरीके से उनका रूहानी इलाज शुरू किया।
लेकिन वहाँ भी एक ऐसा वाक़या हुआ, जिसने नाना को अंदर तक हिला दिया।
एक रात, जब वह बुज़ुर्ग और नाना सो रहे थे, आधी रात को अचानक नाना की आँख खुल गई। उन्होंने देखा कि उन बुज़ुर्ग का सिर एक ओर पड़ा है, हाथ-पैर दूसरी ओर, और धड़ उनसे अलग। यह दृश्य देखकर नाना की जैसे साँस ही रुक गई।
कुछ ही समय उनके पास रहने के बाद नाना पूरी तरह ठीक हो गए। तब उन बुज़ुर्ग ने कहा, “तुम्हारे वालिद ज़िन्नातों के सरदारों को नमाज़ पढ़ाते थे। जो तुम्हारे पास आया था, वह उन्हीं सरदारों में से एक था। तुमने उसकी बात नहीं मानी, इसलिए तुम पर यह मुसीबत आई।”
इसके बाद समय आगे बढ़ता रहा, लेकिन नाना की ज़िंदगी में एक ऐसा डरावना दौर आया, जिसे याद करते हुए भी उनका चेहरा गंभीर हो जाता था। उन्होंने अपनी आँखों से दंगे देखे, उनसे जुड़ा क़त्लेआम देखा, और मारकाट के कई ऐसे दृश्य देखे जिन्हें शब्दों में बयान करना आसान नहीं। वह समय ऐसा था जब इंसान की जान की कोई कीमत नहीं रह गई थी।
नाना की वालिदा का मन अब डबरा में बिल्कुल नहीं लगता था। उस घर की हर दीवार में नाना के वालिद की यादें बसी थीं, और वही यादें सबको भीतर तक बेचैन कर देती थीं।
ग्वालियर में नाना के वालिद के नाम से काफ़ी ज़मीन और कई मकान थे। वही स्थान आज “ओल्याई डॉक्टर का वाड़ा” के नाम से जाना जाता है। वे कभी वहीं रहा करते थे। बाद में, रिश्तेदारों के डबरा में बस जाने के कारण पूरा परिवार भी डबरा आकर रहने लगा।
परिवार के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य के जाने के बाद सब कुछ बदल गया। वे डबरा से भोपाल आ गए। वजहें कई थीं—रोज़गार की तलाश, बीते दुख से दूर जाना और दंगे-फ़साद के अस्थिर माहौल से खुद को बचाना। नाना के सभी भाई अपनी वालिदा को साथ लेकर भोपाल में बस गए।
उस दौर की अफरा-तफरी में ग्वालियर की उनकी ज़मीन के कागज़ात भोपाल ले जाए नहीं जा सके। इसी कारण वह ज़मीन उनसे छूट गई। बाद में वे भोपाल में बस गए।
धीरे-धीरे भोपाल में नाना और उनके भाइयों को लोग जानने-पहचानने लगे। उनका व्यवहार सादा और भरोसेमंद था, इसलिए आस-पास के लोग भी उनसे अपनापन महसूस करने लगे।
उसी दौर में मशहूर गायिका और अभिनेत्री नूरजहां को भोपाल स्थित अपनी हवेली की देखभाल के लिए एक भरोसेमंद और नेक परिवार की ज़रूरत थी। उनकी टीम के एक सदस्य ने नाना के परिवार को वहाँ रहने का प्रस्ताव दिया।
इस तरह नाना के सभी भाई और उनकी वालिदा उस हवेली में रहने लगे और उसकी देखरेख करने लगे।
नूरजहां ज़्यादातर मुंबई में व्यस्त रहती थीं। कभी-कभी आराम के लिए भोपाल आया करती थीं। नाना बताया करते थे कि वह बेहद नेकदिल थीं, और उनकी यह बात सच भी थी—आज भी कई बड़े कलाकारों के इंटरव्यू में उनके बारे में यही सम्मान भरे शब्द सुनने को मिलते हैं।
मैंने स्वयं लता मंगेशकर जी का एक पुराना इंटरव्यू देखा, जिसमें उनसे पूछा गया कि “सब आपके फैन हैं, आप किसकी फैन हैं?” तो उन्होंने नूरजहां का ही नाम लिया। लता जी ने बताया कि जब उनकी पहली मुलाकात नूरजहां से हुई, तब उनकी उम्र करीब 14–15 साल थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने उनसे सिर्फ गायकी ही नहीं, बल्कि बहुत कुछ सीखा।
नाना की उम्र भी तब लगभग इतनी ही रही होगी, शायद एक-दो साल कम। वे कहा करते थे कि जब नूरजहां हवेली में आतीं, तो उनकी वालिदा से तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनवातीं और सबके साथ बैठकर खाना खातीं।
एक दिन नाना की वालिदा नूरजहां के लिए पानी लेकर आ रही थीं। रसोई में रखा महँगा और खूबसूरत काँच का जग और गिलासों का सेट उनके हाथ से गिरकर टूट गया। इस बात का उन्हें गहरा अफसोस हुआ।
जब नूरजहां ने देखा कि नाना की वालिदा इस बात से बेहद शर्मिंदा हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“कोई बात नहीं बीबी, काँच का ही तो था… उसे तो एक दिन टूटना ही था।”
वे जब नाना को मुस्कुराते देखतीं, तो उनकी वालिदा से कहतीं, “बीबी, अपना बेटा तू मुझे गोद दे दे… मैं इसे हीरो बनाऊँगी।”
लेकिन नाना की वालिदा हर बार हँसकर मना कर देती थीं।
जब मैंने उनके बारे में पढ़ा, तो मालूम हुआ कि 1947 के विभाजन के बाद नूरजहां ने पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लिया था। जब दिलीप कुमार ने उनसे भारत में ही रुकने का आग्रह किया, तो उन्होंने कहा, “मैं जहाँ पैदा हुई हूँ, वहीं जाना चाहती हूँ।”
नानी की बहन अपने पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान चली गई थीं। शुरुआती दिनों में उनका परिवार नानी से मिलने आया करता था, मगर धीरे-धीरे वह सिलसिला भी खत्म हो गया।
1947 में भारत विभाजन के बाद, नूरजहां के पाकिस्तान जाने से पहले ही नाना का परिवार फिर से डबरा लौट आया था। वजह बस इतनी थी कि नाना की वालिदा का मन वहाँ बिल्कुल नहीं लगता था। बड़े शहर की भागदौड़ और उस हवेली का सन्नाटा उन्हें रास नहीं आता था।
उधर ग्वालियर में नाना के वालिद का जो अपना वाड़ा और बड़े मकान थे, वे अब उनके नहीं रहे। माहौल अशांत था। कागज़ात साथ न होने के कारण वे उन्हें दोबारा हासिल नहीं कर पाए। आखिरकार उन्होंने वह विचार मन से निकाल दिया।
यह भी सच है कि एक समय ऐसा आया जब नाना के हाथ से उनके वालिद की ज़मीन चली गई। लेकिन बाद में ऐसा भी लगा, जैसे किस्मत हिसाब बराबर करना चाहती हो।
नाना का एक सिख मित्र था, जो उन्हें बहुत चाहता था। आज जहाँ बस स्टैंड के पास पक्की दुकानें हैं, वहाँ उस समय नदी बहती थी और अक्सर पानी भरा रहता था। वही ज़मीन वह सिख मित्र नाना को बिना किसी कीमत के देना चाहता था। वह बार-बार कहता, “तू मुझे बस एक नारियल दे दे, कुछ बताशे दे दे, और यह ज़मीन अपने नाम कर ले।”
लेकिन नाना अपनी खुद्दारी में कहते, “मैं इस ज़मीन का क्या करूँगा? मेरा तो एक ही बेटा है।”
आज उसी ज़मीन पर पक्की दुकानें बनी हुई हैं, और वह डबरा की सबसे कीमती जगहों में गिनी जाती है।
भोपाल से वापस डबरा आने के बाद नाना उषा कॉलोनी में रहने लगे।
याद आता है वह दिन, जब मैं नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के गीत सुन रहा था। तभी मैंने उनका और नूरजहां का साथ गाया हुआ गीत “तेरे बिना रोगी होए प्यासे नैन” सुना। उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि जिसकी आवाज़ दुनिया सुनती है, वह कभी मेरे नाना के इतने क़रीब रही थी।
बचपन में जब नाना कहा करते थे, “हम नूरजहां की शूटिंग देखा करते थे… वह मुझसे बातें करती थीं…”, तो मैं बस इतना ही सोचता था कि कोई पुरानी अभिनेत्री होंगी, जिनका ज़िक्र नाना करते रहते हैं।
लेकिन आज जब नूरजहां के बारे में पढ़ता हूँ, तो समझ आता है कि उन्हें “मलिका-ए-तरन्नुम” क्यों कहा गया। लगभग चार दशकों तक उन्होंने अपनी आवाज़ और अभिनय से लोगों के दिलों पर राज किया। आज भी उनके बारे में चर्चा न हो, ऐसा होना मुश्किल है। एक बार जब मैं उनकी गाई हुई ग़ज़ल “हमारी साँसों में आज तक वो” सुन रहा था, तो दिल से उसे अपनी अब तक की सबसे पसंदीदा ग़ज़ल मान लिया था।
लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।
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