Featured Post

Recommended

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब: मेरी जिंदगी का एक हिस्सा

याद आता है वह बचपन , जब मैं डेक के पास रखी हर कैसेट के कवर को बड़े गौर से देखा करता था। हर तस्वीर और हर नाम मेरे लिए एक नई दुनिया का दरवाज़ा...

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब: मेरी जिंदगी का एक हिस्सा

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब: मेरी जिंदगी का एक हिस्सा

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

याद आता है वह बचपन, जब मैं डेक के पास रखी हर कैसेट के कवर को बड़े गौर से देखा करता था। हर तस्वीर और हर नाम मेरे लिए एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल देता था। उन्हीं कैसेट्स में एक कैसेट ऐसी भी थी, जिसके कवर के बाएँ किनारे पर उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब और दाएँ किनारे पर जावेद अख्तर साहब का चेहरा दिखाई देता था। नीचे बड़े अक्षरों में “संगम” लिखा होता था। वही उस एल्बम का नाम था।

बचपन में मैं हर तरह का संगीत सुनता था, लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होता गया और काफ़ी अंतराल के बाद जब उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के गानों को दोबारा याद किया, तब एहसास हुआ कि वह आवाज़ कोई मामूली आवाज़ नहीं थी।

उस दौर में इंटरनेट तो दूर, मोबाइल भी हर किसी के पास नहीं होता था। इसी बीच मुहर्रम का महीना आया। इस्लामी कैलेंडर की 9 तारीख़ को निकले जुलूस में, जब मैंने DJ पर एक क़व्वाली सुनी—
“इस शाने करम का क्या कहना”
तो मैं सुनकर स्तब्ध रह गया। इतनी कठिन जुगलबंदी, इतनी गहराई और रूह को झकझोर देने वाली क़व्वाली मैंने इससे पहले कभी नहीं सुनी थी। उसी पल समझ आ गया कि इस क़व्वाली को इस शान और असर के साथ कोई और गा ही नहीं सकता।

यहीं से नुसरत साहब को और सुनने की चाह पैदा हुई।

मैं बाज़ार गया, उनका नाम बताया और कैसेट माँगी—लेकिन ज़्यादातर लोग समझ ही नहीं पाए। वजह भी साफ़ थी। मैं डबरा में रहता हूँ, और यहाँ बहुत से लोग संगीत तो सुनते हैं, लेकिन कौन-सा गाना किसने गाया या लिखा, इससे उन्हें ज़्यादा मतलब नहीं होता। यह बात स्वाभाविक भी है—जब ऐसे ही लोग फ़िल्म में “दूल्हे का सेहरा” कादर ख़ान को गाते हुए देखते हैं, तो उनके लिए यह समझना मुश्किल तो होगा ही कि असली गायक कौन है। यानी उनके लिए कुल मिलाकर वही बात है—आम खाओ, गुठलियाँ मत गिनो।

नुसरत साहब के गानों का अलग से कोई कलेक्शन मुझे वहाँ नहीं मिला, तो मजबूरी में मैं फ़िल्म कच्चे धागे की कैसेट ले आया, जिसमें उन्होंने संगीत दिया था और क़व्वाली सहित उनके कई शानदार गीत थे।

वह मेरा टीनेज का समय था। फिर ऐसा हुआ कि टीवी पर हर शाम एक तय समय पर फ़िल्मी गानों के बीच उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब का एक वीडियो सॉन्ग आने लगा। मैं हर शाम उसका इंतज़ार करने लगा।
वह गीत था—“कोई जाने कोई ना जाने”।

दिन में सिर्फ़ एक बार उनका गाना सुन पाना मन को संतोष नहीं देता था। उसी दौरान ज़ी टीवी पर आने वाला संगीत कार्यक्रम सा रे गा मा शुरू हुआ, जो उन दिनों एक अलग ही रंग लेकर आया था। उसमें पाकिस्तान से भी कई कंटेस्टेंट शामिल हुए थे। उन्हीं में से एक थे मुसर्रत, जो अक्सर उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के ही गाने गाया करते थे। वह शो और मुसर्रत—दोनों ही मेरे पसंदीदा बन गए।

एक बार मेरे मोहल्ले का एक दोस्त आया, जो अपनी बहन के नवजात बेटे के लिए नाम ढूँढ रहा था। नाम ‘म’ से शुरू होना चाहिए था, और बच्चे का जन्म भी किसी ख़ास दिन की रात में हुआ था। मैंने सुझाव दिया—मुसर्रत
इसमें ‘म’ भी था और ‘रत’ भी, जो ‘रात’ की ही ध्वनि और भाव को अपने भीतर समेटे हुए था।

उसने अपने पिताजी को यह नाम बताया, और उन्हें यह नाम बेहद पसंद आया। आज भी वह परिवार याद करता है कि मुसर्रत का नाम मैंने रखा था।

एक समय ऐसा भी था जब इंटरनेट के अभाव में मैं नुसरत साहब को सुनने के लिए बेचैन रहा करता था। आख़िरकार जब मैंने एक ऑल-इन-वन म्यूज़िक प्लेयर खरीदा, तो उसमें सबसे ज़्यादा गाने उन्हीं के थे। सच कहूँ तो उसी प्लेयर ने मुझे नुसरत साहब को भरपूर सुनने का मौका दिया।

जब मैं मोहल्ले के दोस्तों को अपने हाई-क्वालिटी ईयरफ़ोन से “आफ़रीन आफ़रीन” सुनाता, तो उसके स्टिरियो साउंड और सुरों की मिठास से वे भी कह उठते—
“उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब जैसा कोई नहीं।”



अब ज़रा उस नुसरत साहब की बात, जिन्होंने अपनी आवाज़ से पूरी दुनिया को बदल दिया

साल 1985। इंग्लैंड के मर्सी आइलैंड में WOMAD नाम का एक म्यूज़िक फ़ेस्टिवल चल रहा था, जिसे मशहूर रॉकस्टार पीटर गैब्रियल आयोजित कर रहे थे। हाथों में बीयर लिए अंग्रेज़ रॉक और पॉप संगीत पर झूम रहे थे। तभी स्टेज पर अचानक बदलाव हुआ। एक सफ़ेद क़ालीन बिछाई गई, और कुर्ता-पायजामा पहने साज़िंदे आकर चुपचाप बैठ गए। ऑडियंस को लगा, शायद कोई साधारण-सा लोक संगीत होने वाला है।

फिर हारमोनियम सधा। सुर उठे।
आठ-दस मिनट बीत गए।
और अचानक दो शब्द गूँजे—
“अल्लाह हू…”

बस, वहीं से जादू शुरू हो गया।

किसी को शब्दों का अर्थ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन आवाज़ का असर ऐसा था कि लोग खड़े होकर झूमने लगे। कुछ की आँखों से आँसू बहने लगे, कुछ आँखें बंद कर उस संगीत में खो गए। जो परफॉर्मेंस केवल एक घंटे की होनी थी, वह रात के तीन बजे तक चलती रही। वही रात उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान की वैश्विक पहचान की शुरुआत बन गई।

आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि उनका फैन बेस भारत, पाकिस्तान और यूके से भी ज़्यादा जापान में था। जापानी लोग उन्हें सम्मान से “सिंगिंग बुद्धा” कहा करते थे।

जापान के फुकुओका शहर में एक कॉन्सर्ट के दौरान, जब नुसरत साहब “दमादम मस्त कलंदर” गा रहे थे, तो कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक जापानी महिला रोती हुई उनके पास आई और बोली—
“मैं बहुत तनाव में थी। मैं आत्महत्या करने वाली थी। लेकिन आपकी आवाज़ ने मुझे जीने की वजह दे दी।”

यह सिर्फ़ एक गायक की आवाज़ नहीं थी—
यह रूह की आवाज़ थी, जो टूटे हुए दिलों को जोड़ देती थी।

इसी दिव्यता, इसी प्रभाव और इसी महानता के कारण उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब को दुनिया ने एक अमर ख़िताब दिया—

शहंशाह-ए-क़व्वाली।



अब दूसरा वाक़या, जो एक इंसान और एक महान कलाकार के बीच के फ़र्क़ को समझा देता है

फ़िल्म कच्चे धागे के दौरान एक ऐसा प्रसंग हुआ, जिसे गीतकार आनंद बख्शी जी ताउम्र नहीं भूल पाए।

फ़िल्म में लीड रोल में थे अजय देवगन। गीत लिखने थे आनंद बख्शी जी को, और संगीत की ज़िम्मेदारी उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के पास थी।

नुसरत साहब पाकिस्तान से मुंबई आए। तय हुआ कि एक दिन बैठकर आनंद बख्शी जी के साथ सेशन होगा और मिलकर गीत तैयार किया जाएगा।
लेकिन यह सेशन बार-बार टलता रहा।

दरअसल, आनंद बख्शी जी के मन में यह बात घर कर गई थी—
“नुसरत फ़तेह अली ख़ान पाकिस्तान से मुंबई आ गए हैं, लेकिन मुझसे मिलने नहीं आ रहे। अगर उन्हें गाने की ज़रूरत है, तो उन्हें ख़ुद मेरे पास आना चाहिए।”

इसी गलतफ़हमी और अहंकार की वजह से मुलाकात टलती चली गई।

एक दिन नुसरत साहब ने अपने साथ रहने वालों से कहा—
“मुझे बांद्रा ले चलो, जहाँ आनंद बख्शी जी रहते हैं।”

आनंद बख्शी जी बांद्रा के एक घर की पहली मंज़िल पर रहते थे। वहाँ लिफ़्ट नहीं थी, सीढ़ियाँ चढ़कर ही ऊपर जाना पड़ता था।

जब उन्हें पता चला कि नुसरत साहब आ रहे हैं, तो वे खिड़की के पास जाकर देखने लगे। उन्होंने देखा कि एक कार घर के सामने आकर रुकी। तीन-चार लोग मिलकर नुसरत साहब को गाड़ी से उतार रहे थे और सहारा देकर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ा रहे थे।

यह दृश्य देखकर आनंद बख्शी जी स्तब्ध रह गए।

उन्हें उसी क्षण एहसास हुआ कि नुसरत साहब उन्हें अपने पास इसलिए बुला रहे थे, क्योंकि उनके लिए चलना-फिरना आसान नहीं था। फिर भी, उन्होंने अपने स्वाभिमान या अहंकार को बीच में नहीं आने दिया और स्वयं उनसे मिलने उनके घर तक चले आए।

यह सोचते ही आनंद बख्शी जी की आँखें भर आईं। वे फूट-फूट कर रो पड़े। उन्होंने आगे बढ़कर नुसरत साहब के पैर पकड़ लिए और अपने अहंकार पर गहरा पश्चाताप किया।

उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया।

दोनों महान कलाकारों ने साथ मिलकर ऐसे दिलकश और यादगार गीत रचे, जो आज भी भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।



साल 1995 में हॉलीवुड फ़िल्म Dead Man Walking बनी, जिसके निर्देशक सीन पेन थे। इस फ़िल्म के संगीत के लिए मशहूर गायक एडी वेडर को बुलाया गया। लेकिन एडी वेडर एक ऐसी आवाज़ की तलाश में थे, जो केवल गले से नहीं, बल्कि रूह से निकलती हो।

उन्होंने कहा—
“मुझे ऐसी आवाज़ चाहिए जो रूह से आए, गले से नहीं।”

इसके बाद उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब को आमंत्रित किया गया। जब रिकॉर्डिंग पूरी हुई, तो एडी वेडर उनकी आवाज़ से इतने प्रभावित हुए कि वे भावुक हो उठे और सम्मान में झुककर नुसरत साहब के पैर छू लिए। यह केवल एक कलाकार का दूसरे कलाकार के प्रति सम्मान नहीं था, बल्कि उस रूहानी ताक़त के प्रति नतमस्तक होना था, जो उनकी आवाज़ में बसती थी।



आज जब अपने ही देश के कुछ सिंगर्स उनके ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हैं, तो अफ़सोस होता है। उन्हें यह समझ नहीं आता कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती, कोई सरहद नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता।

वो अंग्रेज़, जिन्हें एक भी शब्द समझ नहीं आया था, फिर भी रो पड़े थे।
क्योंकि जब संगीत दिल से निकलता है,
तो वह सीधे रूह पर क़ब्ज़ा कर लेता है।

और उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान
सिर्फ़ गायक नहीं थे—

वो रूह की आवाज़ थे।

आस्था के नाम पर समझौते: धर्म नहीं, अवसर का खेल?

आस्था के नाम पर समझौते: धर्म नहीं, अवसर का खेल?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

कुछ लोग अपने-अपने दीन-धर्म में रहकर, अपनी धार्मिक आस्था से जुड़ी प्रार्थनाओं और धर्म-कर्म के कामों में शामिल दिखाई देते हैं।
उनका पहनावा और चाल-चलन देखकर लोग अक्सर यही मान लेते हैं कि यह व्यक्ति तो बहुत धार्मिक किस्म का इंसान है।

लेकिन ज़रा रुकिए।
सोचिए।

क्या कहीं ऐसा तो नहीं कि यह धार्मिकता सिर्फ़ तभी तक रहती हो, जब तक वह व्यक्ति किसी परेशानी में है?
या फिर यह धार्मिकता इसलिए दिखती हो क्योंकि उसे कभी बुराई करने का मौका ही नहीं मिला?
या फिर यह सब उसकी आर्थिक स्थिति का ही असर हो?

आज मैं इस विषय पर इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि हाल ही में स्क्रॉल करते समय मुझे एक सेलेब्रिटी का एक वीडियो दिखा, जिसमें उसके नृत्य-भाव से जुड़ी हरकतें उसकी पुरानी आस्था से पूरी तरह उलट थीं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि जब उसके परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी, तब बहुत कम उम्र में ही वह भक्ति-भजनों से जुड़े कार्यक्रमों में दिखाई देने लगी। उस समय यह सब सिर्फ़ आस्था नहीं था, बल्कि ज़रूरत भी थी। उन्हीं मंचों से उसकी पहचान बनी, वहीं से उसे सम्मान मिला, और उसी रास्ते से उसके परिवार का गुज़ारा चलता रहा। उसे देखकर लोग यह मान बैठे कि वह पूरी तरह धर्म और श्रद्धा में रची-बसी लड़की है।

समय बदला।
हालात बदले।
मंच बदले।

और उसी के साथ बदल गया वह रूप, जिसे कभी लोग आस्था का प्रतीक मानते थे। अब उसके हाव-भाव, उसकी प्रस्तुतियाँ और उसका सार्वजनिक व्यक्तित्व उस पुरानी छवि से बिल्कुल उलट दिखाई देने लगे।

सवाल यह नहीं है कि वह आज क्या कर रही है—वह उसका निजी जीवन और उसका चुनाव है।
सवाल यह है कि जिस चीज़ को हमने कभी “श्रद्धा” समझ लिया था, वह वास्तव में कितनी गहरी थी, और कितनी हालात के साथ ढलने वाली।

यहीं पर भ्रम पैदा होता है।

हम अक्सर किसी इंसान के काम, पहनावे या मंच को देखकर उसके भीतर झाँके बिना ही फ़ैसला कर लेते हैं। हम मान लेते हैं कि जो धर्म से जुड़ा दिख रहा है, वह भीतर से भी वैसा ही होगा। जबकि सच्चाई यह है कि कई बार धर्म आस्था से नहीं, ज़रूरत से शुरू होता है — और ज़रूरत खत्म होते ही उसका रूप भी बदल जाता है।

ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि कोई व्यक्ति आज क्या कर रहा है, बल्कि यह होता है कि हमने उसे कल क्या मान लिया था। हमने उसकी ज़रूरतों को उसकी आस्था समझ लिया, उसके हालात को उसका चरित्र मान लिया, और उसके मंच को उसकी आत्मा से जोड़ दिया। यहीं पर हमारी समझ चूक जाती है।

समस्या उस लड़की में नहीं है, जिसने समय के साथ अपने रास्ते बदले।
समस्या उस नज़र में है, जो हर धार्मिक दिखने वाले चेहरे को बिना परखे “सच्चा” मान लेती है।

हम यह मान लेते हैं कि जो भक्ति में दिख रहा है, वह भीतर से भी वैसा ही होगा।
जबकि सच्चाई यह है कि कई बार भक्ति और धर्म रोज़गार का ज़रिया भी होते हैं — सम्मान का साधन भी, और पहचान का माध्यम भी।

इसीलिए जब हालात बदलते हैं, तो रूप बदलता है।
जब ज़रूरत बदलती है, तो रास्ता बदलता है।
और जब विकल्प मिलते हैं, तो असली स्वभाव सामने आता है।

कुछ लोगों के लिए धार्मिकता
तभी तक रहती है
जब तक उनके सामने
कोई बड़ा लालच नहीं आता।

और कुछ ऐसे भी होते हैं
जिनकी धार्मिकता बस इतनी-सी होती है कि
अगर उन्हें लगे कि आसपास के लोग
धर्म के हिसाब से नहीं चल रहे,
तो वे भी उसी पल
धर्म का रास्ता छोड़ देते हैं।

मतलब साफ़ है—
सवाल धर्म का नहीं,
सवाल चरित्र और नीयत का है।

क्योंकि मौका मिलने पर
इंसान वही बनता है
जो वह भीतर से होता है।

अब मैं आपको एक दिलचस्प किस्सा सुनाता हूँ।

मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता है।
एक समय था जब वे दुनियावी चीज़ों के बहुत शौकीन थे।
न कोई बॉलीवुड फ़िल्म उनसे छूटती थी,
न हॉलीवुड।

उनकी ज़िंदगी में
संगीत था,
फ़िल्में थीं,
धारावाहिक थे,
शेर-ओ-शायरियाँ थीं—
यानी जीवन रंगों से भरा हुआ था।

फिर वक्त बदला।
फ़िल्मों और धारावाहिकों में वह मज़ा नहीं रहा जो पहले था।
शायद इसी खालीपन से उन्होंने धर्म का रास्ता पकड़ लिया।
धीरे-धीरे वे इतने सख्त हो गए कि अपनी पुरानी पसंद की हर चीज़ छोड़ दी।

अब अगर कोई संगीत या फ़िल्म की बात करता, तो उसे टोक दिया जाता।
उनकी हर बातचीत प्रवचन बन गई।

यानी कुछ लोगों की धार्मिकता
आस्था से नहीं,
मनोरंजन के अभाव से शुरू होती है।

लेकिन वक्त ने फिर करवट ली।

एक फ़िल्म आई,
जिसका संगीत इतना शानदार था
कि उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया।

बस फिर क्या था—
दबा हुआ शौक
एक बार फिर
जाग उठा।

जो लोग कल तक धारावाहिकों के नाम से भी परहेज़ करने लगे थे,
वे फिर उसी रंगीन ज़िंदगी में लौट आए।

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि
जब वे धार्मिक चोला ओढ़ लेते हैं
और खुद को प्रार्थनाओं का पाबंद मानने लगते हैं,
तो वे दूसरों को भी उसी रास्ते पर चलने के लिए
टोकना और नसीहत देना शुरू कर देते हैं—
सिर्फ़ इसलिए कि लोग उन्हें धर्मी मानें।

पुरानी जीवनशैली
पीछे छूट जाती है,
छुपे हुए गुनाह पहले की तरह ही
रोज़मर्रा की आदत बने रहते हैं—
और वे दूसरों को ऐसा दिखाते हैं
कि अब उनका उनसे
कोई लेना-देना नहीं।

इनकी प्रार्थनाएँ
इसलिए नहीं होतीं कि वे बेहतर इंसान बनें,
बल्कि इसलिए होती हैं कि
ईश्वर उनसे खुश हो जाए।

प्रार्थना खत्म होते ही
इनका दिल जैसे कह उठता है—
“अब जो करना है, करो!”

असल में,
यही लोग बार-बार वही काम कर बैठते हैं
जिसे वे खुद ग़लत मानते हैं।
इसी वजह से उनका ज़मीर
बार-बार प्रार्थनाओं में शामिल होने को बेचैन रहता है।

और जो लोग
खुद को ग़लत कामों से बचाकर रखते हैं,
उन्हें ये लोग अपने से छोटा समझते हैं—
सिर्फ़ इसलिए कि वे
प्रार्थनाओं में शामिल नहीं रहते।

ऐसे ही लोग धीरे-धीरे किसी न किसी धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हैं।
गलियों में, मोहल्लों में, सभाओं में — उनका उद्देश्य प्रार्थना से ज़्यादा प्रचार होता है।
वे उन लोगों को भी खींच लाना चाहते हैं, जो उनकी तरह नहीं चलते।

सवाल आस्था का नहीं होता,
सवाल संख्या का होता है।

जितने ज़्यादा लोग साथ दिखें,
उतनी ही मज़बूत धार्मिक पहचान बनती है।

सीधे-साधे लोगों से कहा जाता है—
देखो, हम वही कर रहे हैं जो पहले के महान लोग करते आए हैं।

पर कोई यह नहीं पूछता कि वे लोग कैसे थे, और हम कैसे हैं।
परंपरा का नाम लिया जाता है,
पर चरित्र की बात टाल दी जाती है।

इसी तर्क के सहारे
और लोगों को जोड़ा जाता है।
लोग जुड़ते हैं—
इसमें कोई बुराई नहीं।

लेकिन असली खेल तब सामने आता है
जब वही बॉलीवुड,
जिसे कल तक ‘माया’, ‘भटकाव’ और ‘फितना’ कहा जा रहा था,
फिर से अच्छा कंटेंट
या कहिए मधुर संगीत देने लगता है।

तब क्या होता है?

वही लोग,
जो कल तक समूहों में घूम-घूमकर
दूसरों को नसीहतें देते थे,
आज फिर उसी संगीत में
अपना दिल लुटा बैठते हैं।

ध्यान रखिए—
मैं यहाँ संगीत सुनने वालों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कह रहा।
संगीत तो आत्मा की भाषा है।

मैं जिस बात की ओर इशारा कर रहा हूँ, वह यह है कि
जिन लोगों को हम धार्मिक समझ लेते हैं,
उनकी धार्मिकता कई बार बहुत सस्ती भी हो सकती है,
इसका अंदाज़ा हमें देर से होता है।

इनकी एक और पहचान यह भी होती है कि
ये अक्सर
ईश्वर द्वारा गुनाह माफ़ किए जाने की बातें
बहुत ज़ोर-शोर से करते हैं।

इससे साफ़ पता चलता है कि उनकी सोच
कुछ ऐसी बन जाती है—

पहले ग़लत करो,
फिर प्रार्थना में जाकर माफ़ी माँगो।
फिर ग़लत करो,
फिर माफ़ी माँगो।
और यह सिलसिला
चलता ही रहे।

और हर बार
मन खुद को समझा लेता है
कि अब सब ठीक हो गया।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है
कि माफ़ी माँगी या नहीं।
असली सवाल यह है
कि गलती के बाद इंसान बदला या नहीं।

यहीं फर्क है
आत्म-संतोष
और आत्म-जवाबदेही में।

आत्म-संतोष कहता है—
मैंने प्रार्थना कर ली, अब मैं सही हूँ।

आत्म-जवाबदेही कहती है—
मैंने जो किया,
क्या वह दोबारा नहीं होना चाहिए?

जहाँ आत्म-जवाबदेही होती है,
वहाँ प्रार्थना ढाल नहीं बनती।

और जहाँ प्रार्थना ढाल बन जाती है,
वहाँ इंसान खुद से बचने लगता है।

हम रोज़ देखते हैं—

कोई सिर झुकाता है,
कोई हाथ उठाता है,
कोई तय समय पर
तय शब्द दोहराता है।

और हमें लगता है—
“यह तो ज़रूर बहुत धार्मिक होगा।”

यहीं से कहानी उलझती है।

क्योंकि धर्म
सिर्फ़ झुकने का नाम नहीं है,
सिर्फ़ बोलने का नाम नहीं है,
और सिर्फ़ दिखने का नाम भी नहीं है।

धर्म तो वहाँ शुरू होता है
जहाँ इंसान
दूसरे इंसान के काम आता है।

अजीब बात है—

जो लोग धर्म की सबसे ज़्यादा बातें करते हैं,
अक्सर वही
सबसे कम सहनशील होते हैं।

और जो लोग
धर्म की बातें नहीं करते,
न कोई चिह्न दिखाते हैं,
न कोई दावा करते हैं—
वही अक्सर
सबसे ज़्यादा धर्म निभा रहे होते हैं।

कुछ लोग धर्म को
अपने भीतर रखते हैं।
उनका धर्म
उनके व्यवहार में दिखता है।

कुछ लोग धर्म को
कपड़ों में,
आवाज़ में,
और पहचान में रखते हैं।

कुछ लोग धर्म को
समय पर निभाते हैं,
और उसके बाद
सब कुछ भूल जाते हैं।

कुछ लोग धर्म को
दूसरों पर थोपते हैं
और खुद को
ऊपर समझने लगते हैं।

और कुछ लोग
न धर्म समझते हैं,
न इंसान।

यही सच्चाई है।

अगर धर्म सच में भीतर होता है,
तो वह इंसान को
नरम बनाता है,
संवेदनशील बनाता है,
और ज़िम्मेदार बनाता है।

और अगर धर्म
सिर्फ़ बाहर होता है,
तो वह अक्सर
अहंकार बन जाता है।

सबसे बड़ा धोखा यही है
कि जो सबसे ज़्यादा धार्मिक दिखता है,
वही सबसे ज़्यादा सही होगा।

नहीं।

धर्म कोई प्रतियोगिता नहीं,
धर्म कोई प्रदर्शन नहीं,
धर्म कोई पहचान-पत्र नहीं।

धर्म तो
चुपचाप किया जाने वाला काम है।

वह वहाँ होता है
जहाँ कोई देख नहीं रहा होता,
जहाँ कोई तारीफ़ नहीं कर रहा होता।

और शायद
इसी वजह से
सबसे सच्चा धर्म
अक्सर दिखाई ही नहीं देता।

क्योंकि वह
शोर नहीं करता,
वह बस
इंसान बनाता है।

यही धर्म है।
बाकी सब—व्याख्या है।

मौसम के साथ जीवन: भालू, मनुष्य और प्रकृति की गहरी समझ

मौसम के साथ जीवन: भालू, मनुष्य और प्रकृति की गहरी समझ

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

वर्षा ऋतु के समाप्त होते ही जाड़े, यानी सर्दी, का प्रभाव वातावरण में साफ़ दिखाई देने लगता है। हवा में ठंडक उतर आती है और प्रकृति का रंग-रूप बदलने लगता है। जाड़े के दिन छोटे होते हैं। कब सुबह हुई और कब शाम ढल गई, इसका एहसास तक नहीं होता। संध्या मानो रात्रि की भूमिका बनकर आती है।

इस समय गाँव का दृश्य भी बदल जाता है। किसानों के कार्य-व्यापार थमने लगते हैं। वे खेतों से लौटकर अपने-अपने घरों की ओर बढ़ जाते हैं, क्योंकि संध्याकालीन ठंडी हवा शरीर को सताने लगती है। धीरे-धीरे अँधेरा छा जाता है, रास्ते सुनसान हो जाते हैं और चारों ओर एक गहरा सन्नाटा फैल जाता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो गाँवों में आदमी ही न हो।

यह वर्णन गाँव में जाड़े के मौसम की एक झलक थी, जहाँ सर्दी के साथ जीवन की गति धीमी पड़ जाती है। अब जंगल की ओर चलें, जहाँ सर्दी केवल मौसम नहीं, बल्कि हर जीव के जीवन को अलग ढंग से आकार देती है।

जंगल में हर जीव एक-सा जीवन नहीं जीता। कुछ प्राणी रोज़ की भागदौड़ में लगे रहते हैं, जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो प्रकृति के संकेत समझकर सही समय पर एक बड़ा फैसला लेते हैं। भालू उन्हीं में से हैं।

जैसे ही मौसम करवट लेता है, भालू को संकेत मिल जाता है—अब रोज़ का भोजन नहीं, बल्कि आने वाले महीनों की तैयारी करनी है। इस समय वे हाइपरफेज़िया नामक अवस्था में प्रवेश करते हैं, जिसमें वे सामान्य से कई गुना अधिक भोजन करते हैं। उद्देश्य पेट भरना नहीं, बल्कि शरीर में अधिकतम ऊर्जा को चर्बी के रूप में जमा करना होता है।

अगर बचपन या टीनएज के दिनों में आप डिस्कवरी चैनल के कार्यक्रम देखा करते थे, तो यह दृश्य आपको ज़रूर याद होगा—तेज़ बहती नदियाँ, ऊपर की ओर छलाँग लगाती सैलमन मछलियाँ और नदी के किनारे खड़े विशाल भालू।

उत्तर अमेरिका और यूरोप के ठंडे इलाकों में रहने वाले भालू—जैसे ग्रिज़ली, अमेरिकी ब्लैक और ब्राउन भालू—सर्दियों से पहले मुख्य रूप से सैलमन और कुछ क्षेत्रों में ट्राउट मछलियों का शिकार करते हैं। ये मछलियाँ ठंडे, तेज़ बहते पानी में पाई जाती हैं और सर्दियों से पहले इनके शरीर में अत्यधिक चर्बी जमा हो जाती है। यही चर्बी भालू के लिए सबसे मूल्यवान ऊर्जा स्रोत होती है।

इसी कारण भालू इन मछलियों के पीछे बेहद सक्रिय दिखाई देते हैं। लेकिन जब वे मछली पकड़ते हैं, तो एक अजीब-सा दृश्य सामने आता है। भालू मछली को उलट-पलटकर देखते हैं और अक्सर मछली का मांस खाने के बजाय केवल वही हिस्से खाते हैं, जिनमें ऊर्जा सबसे अधिक होती है—मछली की खाल, उसके नीचे जमा मोटी चर्बी, पेट के पास का चर्बी-युक्त भाग, रीढ़ के आसपास की परत, दिमाग़ और मादा मछलियों के अंडे। कई बार वे बाकी मांस छोड़ देते हैं।

देखने वाले को लगता है कि यह बर्बादी है। लेकिन भालू जानते हैं—मांस पेट जल्दी भर देता है, जबकि चर्बी महीनों तक जीवन चलाती है। यह बर्बादी नहीं है, यह कुदरत द्वारा दी गई सबसे सही सोच है। भालू जानते हैं कि अगली बार भोजन कई महीनों बाद मिलेगा, इसलिए वे कुछ ही मछलियों पर नहीं रुकते, बल्कि अधिक से अधिक मछलियाँ पकड़ते हैं। वे मांस खाकर पेट जल्दी भरने के बजाय मछली के चर्बी वाले हिस्से पर ध्यान देते हैं, ताकि शरीर में अधिकतम ऊर्जा जमा हो सके।

और फिर एक दिन ऐसा आता है, जब पहली बर्फ़ गिरते ही भालू अचानक ग़ायब हो जाते हैं। न पैरों के निशान, न आवाज़, न कोई हलचल। जंगल में गहरा सन्नाटा छा जाता है।

भालू कभी भी कहीं भी लेटकर नहीं सोते। वे अपनी शीतनिद्रा के लिए अत्यंत सुरक्षित स्थान चुनते हैं—पहाड़ों की गहरी गुफाएँ, बड़े पेड़ों की जड़ों के नीचे बनी खोखली जगहें, या बर्फ़ के नीचे खुद खोदकर बनाए गए मांद। यह मांद ठंड को रोकती है, हवा को काटती है और दुश्मनों से रक्षा करती है।

भालू की शीतनिद्रा कोई गहरी बेहोशी नहीं होती—वे खाते-पीते नहीं, घूमते नहीं, लेकिन पूरी तरह सोए भी नहीं रहते। विज्ञान इसे टॉरपर कहता है: एक तरह की हल्की सुस्ती, जिसमें शरीर धीमा पड़ जाता है, मगर जरा-सी आहट पर भालू तुरंत जाग सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर हमला भी कर सकते हैं।

भालू शीतनिद्रा के दौरान न पेशाब करते हैं, न शौच—फिर भी उनका शरीर पूरी तरह स्वस्थ रहता है। उनका शरीर यूरिया को पुनः उपयोग में ले लेता है; उसे तोड़कर नाइट्रोजन से नए प्रोटीन बनाता है। इसी प्रक्रिया से उनकी मांसपेशियाँ और हड्डियाँ मज़बूत बनी रहती हैं, जबकि जमा की हुई चर्बी धीरे-धीरे ऊर्जा देती रहती है।

इसी बीच समय आगे बढ़ता है। ठंड की कठोरता कम होने लगती है और बसंत का आगमन होता है। बर्फ़ पिघलने लगती है, नदियाँ फिर से बहने लगती हैं और जंगल में जीवन लौट आता है। तभी भालू अपने मांद से बाहर निकलते हैं—धीमे क़दमों से, लेकिन पूरी ताक़त के साथ। चारों ओर बदलते मौसम के साथ जंगल की गतिविधियाँ भी लौटने लगती हैं।

भालू का यह लंबा सोना कोई कहानी नहीं, कोई चमत्कार नहीं और आलस तो बिल्कुल नहीं। यह सही भोजन चुनने, सही हिस्सा खाने और सही समय पर दुनिया से ओझल हो जाने की कला है। एक बार पेट भर लिया, और फिर—महीनों का सुरक्षित, ऊर्जा-बचत वाला सुकून।

प्रकृति कितने सटीक और संतुलित ढंग से काम करती है, इसकी एक झलक हमने भालू के जीवन में देखी। भालू के भोजन से लेकर उसकी शीतनिद्रा तक—हर चरण में प्रकृति की गहरी समझ और समयबद्ध योजना साफ़ दिखाई देती है। सच तो यह है कि यही समझ प्रकृति हर जीव-जंतु के लिए अपनाती है।

जैसा कि हमने जाना है, ग्रिज़ली, अमेरिकी ब्लैक और ब्राउन भालू सर्दियों से पहले सैलमन और कुछ क्षेत्रों में ट्राउट मछलियों का शिकार करते हैं। ठीक उसी समय इन मछलियों के शरीर में अत्यधिक चर्बी जमा हो जाती है, जब भालुओं को उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति की समयानुकूल व्यवस्था है—ऊर्जा वहीं और तभी उपलब्ध कराना, जहाँ और जब उसकी ज़रूरत हो।

इसी प्रकार प्रकृति मनुष्य के लिए भी मौसम के अनुसार भोजन और संसाधन उपलब्ध कराती है। सर्दियों में आलू और शकरकंद जैसे कंद-मूल खूब उगते हैं। आलू कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है और शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है, इसलिए ठंडे इलाकों में यह सदियों से खेतिहर लोगों और मज़दूरों के भोजन का मुख्य हिस्सा रहा है। वहीं शकरकंद प्राकृतिक रूप से मीठा होता है, ज़मीन के भीतर पकता है और शरीर को अंदर से गर्म रखता है। यही कारण है कि सर्द शामों में अलाव के पास शकरकंद भूनकर खाने की परंपरा आज भी जीवित है।

असल बात यह है कि सर्दियों में शरीर अधिक कैलोरी जलाता है और अधिक ऊर्जा की माँग करता है। आलू और शकरकंद, जो ज़मीन के भीतर उगते हैं, ठंड से स्वयं को बचाने के लिए अपने भीतर ऊर्जा संचित करते हैं—और वही ऊर्जा हमारे शरीर को मिलती है। एक पंक्ति में कहें तो, आलू पेट भरता है और शकरकंद शरीर को गरम रखता है।

कभी हमारे खान-पान का रिश्ता मौसम से बहुत गहरा हुआ करता था। गर्मियों में शरीर को ठंडक देने वाले पेय—जैसे सत्तू, शरबत और सिकंजी; बरसात में हल्का और सुपाच्य भोजन—जैसे कद्दू, लौकी और तोरी; तथा सर्दियों में ऊर्जा और गर्मी देने वाले खाद्य पदार्थ—जैसे आलू, शकरकंद और तिल-गुड़—सब कुछ ऋतु के अनुसार होता था। आज हम उस समझ से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं, जबकि पुराने समय में लोग जानते थे कि मौसम के साथ भोजन बदलना ही स्वस्थ जीवन की असली कुंजी है।

आज भी बुज़ुर्ग बताया करते हैं कि उनके समय में लोग सर्दियों में अधिक परिश्रम करते थे। शिल्पकार और पेशेवर लोग रात देर तक काम करते रहते थे।

बचपन और टीनएज के दिनों में मुझे सर्दी से जुड़े अलग-अलग अनुभव अधिक हुआ करते थे—जैसे ठंड बढ़ते ही दाँत से दाँत बजने लगते थे और शरीर में कंपन शुरू हो जाता था। उन दिनों धूप न हो तो लोग आग जलाकर रजाई में दुबक जाते थे।

और फिर आता था बसंत—मार्च और अप्रैल के महीने। न अधिक ठंड, न अधिक गर्मी। पेड़ों पर नई-नई कोपलें फूट पड़तीं, खेतों में फसलें पकने लगतीं और पूरे वातावरण में एक नई ताज़गी फैल जाती थी।

ठीक वैसे ही जैसे बसंत भालुओं को महीनों की शीतनिद्रा के बाद जीवन की नई शुरुआत देता है, वैसे ही यह ऋतु मनुष्य के लिए भी आशा, ऊर्जा और संतुलन का संदेश लेकर आती है।

प्रकृति कभी गलती नहीं करती। वह हर जीव को, हर मौसम में, वही देती है—जो उसके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है।

क्या सच में कुछ मेंढक मरने के बाद फिर ज़िंदा हो जाते हैं?

क्या सच में कुछ मेंढक मरने के बाद फिर ज़िंदा हो जाते हैं?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

अक्सर हम सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर सुनते या पढ़ते हैं कि कुछ मेंढकों की प्रजातियाँ ऐसी होती हैं, जो मरने के बाद फिर ज़िंदा हो जाती हैं। यह बात सुनने में जितनी रहस्यमयी लगती है, सच्चाई उतनी ही वैज्ञानिक और रोचक है।

असल में, ये मेंढक कभी मरते ही नहीं। वे बस ऐसी अस्थायी निष्क्रिय अवस्था में चले जाते हैं, जहाँ शरीर की गतिविधियाँ इतनी धीमी हो जाती हैं कि देखने वाले को वे मरे हुए प्रतीत होते हैं।

आइए, ऐसी ही तीन प्रसिद्ध मेंढक प्रजातियों को समझते हैं।

1. वुड फ्रॉग (Wood Frog)

वैज्ञानिक नाम: Rana sylvatica

वुड फ्रॉग ठंडे इलाक़ों में पाया जाने वाला एक असाधारण मेंढक है।

इसके साथ क्या होता है?

  • कड़ी सर्दी में इसका शरीर लगभग पूरी तरह जम जाता है
  • साँस लेने की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है
  • हृदय की धड़कन अस्थायी रूप से रुक जाती है
  • शरीर के भीतर मौजूद पानी बर्फ का रूप ले लेता है

इस अवस्था में यह मेंढक मरा हुआ नहीं होता, बल्कि उसका शरीर कुछ समय के लिए लगभग निष्क्रिय हो जाता है।

यह सुरक्षित कैसे रहता है?

  • इसके शरीर में प्राकृतिक रूप से शर्करा (glucose) जमा हो जाती है
  • यह शर्करा कोशिकाओं को जमने से होने वाले नुकसान से बचाती है
  • तापमान बढ़ने पर शरीर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे सामान्य होने लगती हैं

इसलिए यह कहना सही है कि
👉 मेंढक फिर से जीवित नहीं होता, बल्कि उसका शरीर दोबारा सक्रिय हो जाता है।

2. ऑस्ट्रेलियन रेज़रेक्शन फ्रॉग (Australian Resurrection Frog)

अन्य नाम: Water-holding Frog

यह मेंढक अत्यधिक गर्म और सूखे क्षेत्रों में पाया जाता है।

इसकी खास रणनीति

  • लंबे सूखे के समय यह ज़मीन के भीतर चला जाता है
  • अपने शरीर के चारों ओर एक सख़्त परत (cocoon) बना लेता है
  • इस दौरान शरीर की गतिविधियाँ बहुत कम हो जाती हैं
  • यह महीनों, यहाँ तक कि वर्षों तक बिना खाए-पीए जीवित रह सकता है

बारिश होने पर

  • मिट्टी में नमी लौट आती है
  • शरीर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे सक्रिय होने लगती हैं
  • मेंढक ज़मीन से बाहर निकल आता है

लोगों को लगता है कि यह “मरकर ज़िंदा” हुआ है, जबकि असल में यह गहरी निष्क्रिय अवस्था (aestivation) से बाहर आता है।

3. अफ़्रीकी बुल फ्रॉग (African Bullfrog)

अन्य नाम: Pixie Frog

यह आकार में बड़ा और काफ़ी सहनशील मेंढक होता है।

यह क्या करता है?

  • सूखे के समय ज़मीन के भीतर छिप जाता है
  • अपनी सूखी त्वचा से एक प्रकार का प्राकृतिक कवच बना लेता है
  • शरीर की ऊर्जा की खपत बहुत कम कर देता है

अनुकूल परिस्थितियाँ मिलते ही

  • यह कवच टूट जाता है
  • शरीर की गतिविधियाँ सामान्य होने लगती हैं
  • मेंढक फिर से सक्रिय जीवन में लौट आता है

यहाँ भी मृत्यु नहीं, बल्कि ऊर्जा बचाने की अवस्था होती है।

🧠 वैज्ञानिक सच्चाई

इन तीनों मेंढकों में एक बात समान है—

  • ये कभी मरते नहीं
  • बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में शरीर की गतिविधियों को अस्थायी रूप से बहुत धीमा या स्थिर कर लेते हैं
  • ताकि जीवन सुरक्षित रह सके

विज्ञान में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे—
Freeze Tolerance, Aestivation और Cryptobiosis

निष्कर्ष

सोशल मीडिया पर फैलने वाली “मरकर ज़िंदा होने” की कहानियाँ असल में प्रकृति की अद्भुत जीवन-रक्षा रणनीतियों की गलत या अधूरी व्याख्या हैं।

यह लेख हमें यह समझाता है कि—
जीवित रहना सिर्फ़ चलने-फिरने का नाम नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर शरीर का रुक जाना भी जीवन की ही एक समझदारी है।

कुछ भी न दिखना: अंधेपन का वो अनुभव जो आप कभी समझ नहीं पाएंगे

कुछ भी न दिखना: अंधेपन का वो अनुभव जो आप कभी समझ नहीं पाएंगे

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

अक्सर हम न दिखने को अँधेरे से जोड़कर समझने की कोशिश करते हैं,
लेकिन आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि जब किसी इंसान की आँखें न हों—या किसी दुर्घटना के कारण उसकी आँखें नष्ट हो जाएँ—तो उसे अँधेरा नहीं, बल्कि कुछ भी नहीं दिखता।

अब आप सोच सकते हैं—
“कुछ भी न दिखना” आखिर होता क्या है?
वह अनुभव कैसा होता होगा?

तो चलिए, इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक सच को समझते हैं।

वैज्ञानिक रूप से देखें तो देखना सिर्फ़ आँखों का काम नहीं होता।
आँखें तो बस बाहर की रोशनी को पकड़ने का ज़रिया हैं।

असल काम होता है दिमाग़ में।

जब रोशनी आँखों में प्रवेश करती है, तो रेटिना उसे विद्युत संकेतों में बदल देता है।
ये संकेत ऑप्टिक नर्व के ज़रिये दिमाग़ के विज़ुअल कॉर्टेक्स तक पहुँचते हैं।
यहीं जाकर “दिखना” नाम का अनुभव पैदा होता है।

अब ज़रा सोचिए—
अगर आँखें ही न हों,
या ऑप्टिक नर्व पूरी तरह नष्ट हो जाए,
तो दिमाग़ तक कोई संकेत पहुँचता ही नहीं।

और जब कोई संकेत नहीं पहुँचता,
तो दिमाग़ के पास
न अँधेरा बनाने का कारण होता है,
न उजाला।

इसीलिए ऐसा व्यक्ति अँधेरा नहीं देखता—
क्योंकि अँधेरा भी अपने आप में एक दृश्य अनुभव है।

वह “कुछ नहीं” देखता है,
क्योंकि वहाँ देखने की प्रक्रिया ही समाप्त हो चुकी होती है।

यही वजह है कि “कुछ भी न दिखना”
अँधेरे से भी अलग अनुभव होता है—
यह दृश्य का अभाव है,
दृश्य नहीं।

अब सवाल उठता है—
“कुछ भी न दिखना” आखिर होता क्या है?

इसे समझना थोड़ा कठिन है,
क्योंकि हमारा दिमाग़ हमेशा
या तो उजाले की कल्पना करता है,
या अँधेरे की।

लेकिन “कुछ भी न दिखना”
इन दोनों से अलग होता है।

“कुछ भी न दिखना”
ऐसा अनुभव है
जिसे न रंगों से समझाया जा सकता है,
न अँधेरे से,
न उजाले से।

न वहाँ काला रंग होता है,
न सफ़ेदी,
न कोई खालीपन।

बस… दृश्य की अनुपस्थिति।

जिस तरह आप इस समय
अपने सिर के पीछे कुछ नहीं देख रहे,
लेकिन आपको वहाँ “अँधेरा” भी नहीं दिख रहा—
ठीक वैसा ही।

उस व्यक्ति के लिए
यह अनुभव ज़रूरी नहीं कि डरावना हो,
क्योंकि डर भी तभी पैदा होता है
जब कुछ देखने या खोने का एहसास हो।

उसके लिए दुनिया
आवाज़ों, स्पर्श, गंध और यादों से बनती है—
न कि दृश्यों से।

इसलिए “कुछ भी न दिखना”
किसी असीम अँधेरे में खो जाना नहीं,
बल्कि एक ऐसा संसार है
जहाँ देखने की अवधारणा
मौजूद ही नहीं होती।

शादी की महफ़िल: रसगुल्ले की गिनती से बुफे की भेड़चाल तक

शादी की महफ़िल: रसगुल्ले की गिनती से बुफे की भेड़चाल तक

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आप सभी ने बचपन की यादों से जुड़े तमाम किस्से-कहानियाँ तो सुनी ही होंगी,
पर आज मैं रोशनी डालने जा रहा हूँ उन्हीं यादों से जुड़े एक ख़ास पहलू पर—और वह पहलू है शादियों का खाना और उसका माहौल।

याद आता है वह समय, जब शादी का खाना अक्सर टेबल-कुर्सियों पर होता था और पत्तल-दोनों पर परोसा जाता था। उन दिनों हम सभी बचपन के दोस्त शादी समारोह में एक साथ पहुँच जाते थे—बिना मम्मी-पापा को ज़्यादा डिस्टर्ब किए।
पता नहीं क्यों, उन दिनों का संगीत एक अलग ही माहौल बना देता था। जैसे ही हम वहाँ पहुँचने वाले होते थे, दूर से ही शादी के फंक्शन में बजता हुआ संगीत सुनाई देने लगता था—

“इश्क़ में जब जी घबराया,
दूरियाँ दिल सह नहीं पाया…”

आपके बचपन में भले ही कोई और गीत बजते होंगे, लेकिन मेरे बचपन में तो कुछ ऐसे ही गीत उन दिनों बजते थे। 😄
साथ ही उस दौर की पहचान बने कुछ अलग वाइब वाले गीत भी गूँजते रहते थे, जैसे—

“जागे-जागे रहते थे, खोये-खोये रहते थे,
करते थे प्यार की बातें…”

हम सभी दोस्त कुर्सियों पर बैठ जाते थे और टेबल पर पत्तल-दोने सजने लगते थे, जिन पर खाना परोसा जाने वाला होता था। वह इंतज़ार भी इंतज़ार जैसा नहीं लगता था, क्योंकि वहाँ मधुर संगीत लगातार बजता रहता था—

“दैया दैया दैया रे, दैया दैया दैया रे,
आशिक़ मेरे, मैंने तुझसे प्यार किया रे…”

हम दोस्तों के बीच वहाँ खाने को लेकर जो शुरुआती गपशप होती थी, वह कुछ इस तरह की होती थी—
“इनके यहाँ रसगुल्ले हैं!”

और अगर किसी ऐसी शादी में जाते थे, जहाँ गुलाब जामुन दिख जाते, तो कहते—
“इनके यहाँ गुलाब जामुन हैं!”

और कभी-कभी अगर खाने में दही-बड़े की जगह बूंदी का रायता कर दिया जाता, तो हम एक-दूसरे से कहते—
“अरे यार, मज़ा नहीं आया… दही-बड़े होने चाहिए थे!”

कभी-कभी माहौल ऐसा होता था कि हम बच्चे डरते भी थे—कहीं हमें बच्चा समझकर सिर्फ़ एक ही रसगुल्ला या गुलाब जामुन न दे दिया जाए। इसलिए हम कमर सीधी करके बैठ जाते थे, ताकि दो पीस मिल जाएँ।

पर थोड़ी देर बाद पता चलता—अरे, यहाँ तो सबको ही दो दिए जा रहे हैं। यानी समझ आता कि जिनके यहाँ शादी है, उन्होंने सभी के लिए दो-दो पीस रखवाए हैं।

उन दिनों खाने में जो स्वाद होता था, वह आज के बुफे में कहाँ मिलता है!

याद आता है वह समय, जब कद्दू की सब्ज़ी बेहद पतली बनती थी—अगर जल्दी-जल्दी न खाई जाए, तो वह पत्तल से बाहर तक बहने लगती थी। और उस कद्दू का स्वाद… क्या खूब होता था!

और जब किसी-किसी शादी में कद्दू कुछ ज़्यादा ही पतला हो जाता था—शायद बहुत ज़्यादा गरम होने की वजह से—तब पंगत खिलाने वाले लोग एक-दूसरे को सलाह देते थे—
“कद्दू सबसे आख़िर में परोसियो, पहले पूड़ी करवा दो!” 😄

याद आता है बचपन का एक ख़ास पल—एक शादी समारोह, जो हमारे घर से कुछ ही दूर, मिसूरिया धर्मशाला में था। जिनके यहाँ शादी थी, उन्होंने बहुत ज़्यादा लोगों को न्योता दे दिया था। हम सभी दोस्त वहाँ पहुँचे और खड़े रह गए।
वहाँ इतनी भारी भीड़ थी कि हम सबने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। शादी समारोह, शादी समारोह जैसा नहीं लग रहा था; ऐसा लगता था मानो यहाँ सिर्फ़ खाना ही खिलाया जा रहा हो।

कठिन परिस्थिति को देखते हुए पंगत खिलाने वालों ने अपने हिसाब से एक अलग सिस्टम बना लिया था—अगर एक-दो लोग भी उठने लगते, तो सबकी पत्तलें उठा ली जाती थीं; यानी टेबल से उठाकर सीधे कंटेनर में डाल दी जाती थीं, और फिर दूसरी पंगत के लिए पत्तलें लगाई जाने लगती थीं।

हम सभी बच्चे काफ़ी देर से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उस कार्यक्रम में न रसगुल्ला था, न गुलाब जामुन; मिठाई में सिर्फ़ कपासी रंग की बेसन की बर्फ़ी शामिल थी।
जैसे ही हम सब दोस्त टेबल-कुर्सियों पर बैठे और सुकून से खाना खाने लगे, हम यह भूल गए कि हमारे साथ भी वही होने वाला है, जो बाक़ी सभी के साथ हो रहा था।

दूर से कुछ लोग उठे और उनकी पत्तलें उठनी शुरू हुईं—तो हमने जल्दी-जल्दी अपनी बर्फ़ी उठा ली। पेट तो नहीं भरा, लेकिन वहाँ ऐसा पल आया कि हम सब दोस्त खुलकर हँस पड़े।

हुआ यूँ कि मेरे चाचा का लड़का हमसे कुछ दूर बैठा था। वह खाने में इतना मग्न था कि उसे ज़रा भी ख़बर नहीं रही कि पत्तल उठाने वाले अब उसके क़रीब आ पहुँचे हैं। जैसे ही उसकी पत्तल उठी, उसने अफ़रा-तफ़री में ऐसी फुर्ती दिखाई कि अपनी उठती पत्तल में से ही बर्फ़ी झपट ली। 😁

वह बर्फ़ी भी कोई मामूली नहीं थी—उसका कपासी रंग ही उसे अपने आप में ख़ास बना रहा था।

ख़ैर, यह तो थी टेबल-कुर्सियों पर खाने की बात। समय के साथ कुछ लोगों ने शादियों में बुफे सिस्टम अपनाना शुरू कर दिया, और देखते-ही-देखते इसका क्रेज़ बढ़ता चला गया। उस दौर में हम इसे ‘बफ़र सिस्टम’ कहा करते थे।
बचपन में यह हमें बेहद आकर्षक लगता था—क्योंकि वहाँ सब कुछ बिना गिनती के मिलता था।

पर सच्चाई यह है कि वही कुर्सी-टेबल पर बैठकर पत्तल-दोनों पर परोसा जाने वाला खाना खाने का अनुभव ही सबसे बेहतरीन था। मिठाई इंसान कितनी खाता है?—एक, दो, तीन या ज़्यादा से ज़्यादा पाँच पीस। और अपनी बात करूँ, तो मैं दो पीस से ज़्यादा नहीं खा पाता।
उस समय का खाना इतना स्वादिष्ट होता था कि उसे खाकर मन को जो सुकून मिलता था, वैसा सुकून आज के बुफे में परोसे गए तमाम देसी-विदेशी आइटम भी नहीं दे पाते।

पत्तल-दोनों पर परोसे जाने वाले खाने का स्वाद ही कुछ और था। लोग सुकून से बैठकर खाते थे, प्यार से खिलाया जाता था… और नब्बे के दशक के गाने बजते रहते थे—वही अनुभव सचमुच बेहतरीन था।

उन दिनों किसी-किसी की शादी में बफ़र सिस्टम सिर्फ़ दिखावे का होता था। मिठाई के स्टॉल पर एक ख़ास आदमी खड़ा कर दिया जाता था, जिसे सख़्त हिदायत होती थी कि बच्चों को सिर्फ़ एक रसगुल्ला या गुलाब जामुन देना—उसके बाद नहीं।
बाहर से देखने पर सब कुछ खुला-खुला और भरपूर लगता था, लेकिन भीतर से गिनती और कंजूसी का पूरा हिसाब चलता था।

यहीं से शादियों के खाने और महफ़िल सजाने की असली तस्वीर सामने आती है। यह ऐसी स्थिति है कि यहाँ बड़े दिल वाला भी ग़लत ठहर सकता है और छोटे दिल वाला भी।

आजकल दिखावे की इस कदर महफ़िल सजाई जा रही है कि हर जगह भेड़चाल के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। कोई शख़्स अमीरी झाड़ने के लिए शादियों में अलग-अलग वैरायटी की तमाम मिठाइयाँ और दुनिया भर के स्वादिष्ट आइटम सजा देता है—मानो ज़रूरत नहीं, बल्कि दिखावे की होड़ चल रही हो।

और लोगों का भी क्या कहना! वे इन्हें ऐसे खाते हैं, मानो खाकर कोई बहुत बड़ा कारनामा कर रहे हों। कभी कोई आइटम पूरा खा लिया जाएगा, तो कभी उसे यूँ ही छोड़ दिया जाएगा।
और अगर नॉनवेज की व्यवस्था भी हो, तो वहाँ यह पागलपन और ज़्यादा खुलकर सामने आ जाता है।

चिकन-मटन से बनी तमाम डिशें सजाई जाती हैं, और अब तो आलम यह है कि लगभग जानवर के आकार में दिखाई देने वाला भुना मटन भी सजा दिया जाता है—सिर्फ़ इसलिए कि इससे पहले किसी अमीर आदमी ने अपनी शादी में ऐसा किया था।

नॉनवेज में इस तरह का रूप दिखाना न तो मटन की किसी डिश में सही है और न ही चिकन में—यानी मांस को इस अंदाज़ में परोसना कि देखकर जानवर की पूरी छवि का एहसास हो जाए। यह सब हरकतें पागलपन के सिवा कुछ नहीं हैं। खाने में सजावट के नाम पर ऐसी प्रस्तुति, जो जानवर की पूरी छवि उभार दे, स्वाभाविक रूप से असहज ही लगती है।

नॉनवेज खाते वक्त इंसान यही चाहता है कि उसके सामने सिर्फ़ खाने का पीस हो, न कि ऐसा रूप, जिसे देखकर वही जानवर याद आ जाए—क्योंकि ऐसा दृश्य अधिकांश लोगों को अच्छा नहीं लगता।

कुछ लोग नॉनवेज के बेहद शौकीन होते हैं; उन्हें इन बातों से बिल्कुल फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कई वेजिटेरियन ही नहीं, बल्कि बहुत-से नॉनवेजिटेरियन लोगों को भी ऐसी प्रस्तुति गहरी असहजता में डाल देती है—बल्कि उनके लिए यह अनुभव बेहद अप्रिय हो जाता है।

तो फिर सवाल यह उठता है कि भेड़चाल का हिस्सा क्यों बना जाए? क्यों न ऐसा रास्ता चुना जाए, जिसमें नॉनवेजिटेरियन और वेजिटेरियन—दोनों ही सहज महसूस करें और किसी की भावनाएँ आहत न हों।

दुबई या मिडिल ईस्ट के अन्य देशों के खान-पान की वीडियो देखी जाएँ, तो यह साफ़ समझ में आता है कि वहाँ ऐसी प्रस्तुतियाँ उनकी स्थानीय सजावट और संस्कृति का हिस्सा हैं। लेकिन कुछ लोगों ने उन्हीं देशों की नकल करते हुए भारत में भी शेखी बघारनी शुरू कर दी है। उसी की देखा-देखी यहाँ भी लोग वही भेड़चाल वाली हरकतें दोहराने लगे हैं।

मेरा लोगों से बस यही कहना है—उनकी नकल न की जाए। वे वे हैं, और हम हम।

और आजकल तो यह भी देखने को मिल रहा है कि दिल्ली की जामा मस्जिद की मुख्य सड़क—जो स्ट्रीट फूड के मामले में काफ़ी मशहूर है—वहाँ कई लोग दुबई के शेखों जैसा गेटअप अपनाकर, खुद को ‘हबीबी’ की तरह पेश करते हुए, ‘मोहब्बत का शरबत’ बेच रहे हैं। उनकी हरकतें देखकर कहीं से भी यह नहीं लगता कि वे खुद को किसी शेख से कमतर समझते हों। इसी वजह से एक शख़्स ने उनकी वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दी, जिसमें वह यह कहते हुए नज़र आता है—

“भाई, ये जो लोग ‘हबीबी’ बने फिर रहे हैं न, इन्हें शेख अपनी ख़ाज खुजवाने के लिए भी न रखें!”

ख़ैर, यह उस शख़्स का कहना है। मेरा कहना बस इतना है कि भारत के लोगों के डीएनए में खाने को लेकर एक अलग ही नज़रिया है। इसलिए यहाँ ऐसी कोई भी बाहरी परंपरा नहीं अपनाई जानी चाहिए, जो लोगों को असहज करे या पसंद न आए।

क्योंकि अगर देश-विदेश पर नज़र डालें, तो भोजन को लेकर ऐसी-ऐसी परंपराएँ देखने को मिलती हैं, जिन्हें हम भारतीय शायद देखना भी न चाहें। इसलिए मेरा सुझाव बस इतना-सा है—नॉनवेज डिशों का रूप वही रहने दिया जाए, उसी रूप और आकार में, जो यहाँ के लोगों को सहज, स्वीकार्य और सामान्य लगे।

वरना दुनिया भर की सभ्यताएँ इतनी अलग-अलग हैं कि कई बार उन्हें देखकर इंसान सिर पकड़कर बैठ जाए। इसलिए किसी भी चलन को अपनाने से पहले लोगों की सोच, भावना और सहजता का ध्यान रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

अहंकार से लबालब भरे महानुभाव: एक ज़रूरी पहचान

अहंकार से लबालब भरे महानुभाव: एक ज़रूरी पहचान

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो पहली नज़र में बहुत ठीक लगते हैं।
बात करते हैं तो अपनापन झलकता है, व्यवहार में शालीनता दिखाई देती है, और मन सहज ही मान लेता है—
“अच्छे इंसान हैं।”

पर इस तरह की तहज़ीब ओढ़ लेने से कोई इंसान सच में अच्छा हो जाए, यह ज़रूरी नहीं।

असल में ऐसी तहज़ीब वाले लोगों में कुछ ऐसे भी होते हैं जो रिश्ते निभाने नहीं आते, बल्कि रिश्तों का इस्तेमाल करने आते हैं।

इनकी दुनिया में बराबरी नाम की कोई जगह नहीं होती।
या तो ये ऊपर होते हैं, या सामने वाला नीचे।
खुद को ये राजा समझते हैं और बाक़ी सबको मोहरा।
जब तक लोग इनके काम के होते हैं, तब तक क़रीबी रहते हैं;
और जैसे ही काम निकल जाता है, वही लोग बोझ बन जाते हैं।

इसीलिए इन्हें पहचानना ज़रूरी है—
बाद में नहीं, समय रहते।

1. अचानक रूठ जाने वाले लोग

ये लोग अक्सर अचानक रूठ जाते हैं।
कभी किसी छोटी-सी बात पर, कभी बिल्कुल बिना वजह।
असल में इन्हें बुरा नहीं लगता; ये बस यह परखते हैं कि आप उन्हें कितनी अहमियत देते हैं।

अगर आप मनाने लगें, बार-बार सफ़ाई देने लगें,
तो इनके भीतर का अहंकार तृप्त हो जाता है।
और अगर आप शांति से दूरी बना लें,
तो कुछ ही दिनों में यही लोग खुद लौटकर बात शुरू कर देते हैं।
क्योंकि सच्चाई यह है कि आपसे दूरी इनके लिए नुकसान का सौदा होती है।

2. जानबूझकर अनदेखा करने वाले

इनकी एक पहचानने लायक आदत होती है—
जवाब न देना।

आप सामने से अभिवादन करें, तो ये बस हल्का-सा सिर हिलाकर आगे बढ़ जाते हैं।

मक़सद साफ़ होता है—
यह जताना कि “हम बहुत व्यस्त हैं, बहुत महत्वपूर्ण हैं।”

लेकिन जिस दिन आप इनके काम आने लायक बन जाते हैं,
उसी दिन यही लोग खुद आगे बढ़कर अभिवादन करते दिखाई देते हैं।
सामने से ही नहीं,
पीछे से भी लोग आपको “अभिवादन” करते हुए सुनाई देने लगते हैं।

क्योंकि इन्हें यह बात अच्छी तरह याद रहती है
कि एक दिन इन्होंने आपको अनदेखा किया था—
बस उसे खुले तौर पर स्वीकार करना
इन्हें शोभा नहीं देता।

3. दूसरों की अमीरी पर अकड़ दिखाने वाले

इनका घमंड प्रायः अपनी कमाई का नहीं होता।
दोस्त अमीर है, रिश्तेदार अमीर है, ख़ानदान का नाम है—
बस वही इनकी पहचान बन जाती है।

खुद के घर में पर्दा गिरा हुआ हो,
नल से पानी टपकता हो,
लेकिन चर्चा मामा, चाचा, फूफा और उनके फ़ार्महाउस की ही होती है।

और जब इनके घर कोई शादी-ब्याह हो
और ये सब लोग वहाँ इकट्ठा हों,
तो हाल कुछ और ही हो जाता है।

ऐसे मौक़ों पर गर्दन ऐसी अकड़ती है
कि सामने के अलावा कुछ दिखता ही नहीं—
बगल में खड़ा इंसान भी अदृश्य हो जाता है।

4. रुतबे और सुरक्षा का दिखावा करने वाले

इन अहंकारी लोगों के भीतर एक स्थायी डर छिपा रहता है—
कि कहीं कोई इन्हें नुकसान न पहुँचा दे।

इस डर को ये अमीरी और रुतबे का जामा पहनाते हैं।
बंदूक रखते हैं—
सुरक्षा के लिए कम,
दिखावे के लिए ज़्यादा।

बच्चों को लेकर हर समय चिंता का नाटक करते रहते हैं—
कहीं कोई कुछ खिला न दे,
कहीं कोई कुछ कर न दे।

असल चिंता कम,
इतराना ज़्यादा।

5. खाने में डर दिखाने वाले

खाने के मामले में इन्हें हमेशा टोने-टोटके का डर लगा रहता है।
अगर आप इन्हें खाने को कुछ दें,
तो अदब से पहले आपसे खाने के लिए कहेंगे—
और कभी-कभी यह सवाल भी ज़रूर करेंगे—
“यह किसने दिया?”

सीधा-सा खाना भी इन्हें संदिग्ध लगता है।
वजह साफ़ है—
ये खुद टोने-टोटके जैसी गतिविधियों में विश्वास रखते हैं।

इसीलिए इन्हें भीतर-ही-भीतर यह डर लगा रहता है
कि कहीं कोई उनके साथ भी वही न कर दे,
जो वे दूसरों के साथ करते हैं।

6. दिखावे की दुनिया में जीने वाले

ये लोग कैफ़े में बड़े-बड़े ब्रांड के बर्गर और पिज़्ज़ा खाते हुए
तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालते हैं।

चाहे मैकडॉनल्ड्स का जोकर ‘रोनाल्ड मैकडॉनल्ड’ हो
या वहाँ सजी आलीशान मेज़—
इनके आसपास खिंची तस्वीरें ज़रूर ली जाती हैं,
ताकि सोशल मीडिया पर अमीरी का ढिंढोरा पीटा जा सके।

दिल से ये भी जानते हैं
कि असली स्वाद स्ट्रीट फ़ूड में है,
लेकिन दिखावे का फ़ोटोशूट
इन्हीं जगहों पर सजता है।

7. दिलचस्पी छुपाने वाले

ऐसे लोग भी होते हैं जो बार-बार यह जताते हैं
कि उन्हें आपकी गाड़ी, घर, मकान
या उनमें सजी मनोरंजन की चीज़ों से
कोई दिलचस्पी नहीं है।

असल में दिलचस्पी पूरी होती है,
बस उसे ज़ाहिर करना इनके घमंड के ख़िलाफ़ पड़ता है।
इन्हें डर रहता है कि अगर किसी और की चीज़ की तारीफ़ कर दी,
तो उनकी अपनी शान में कमी आ जाएगी।

मान लीजिए आपके कमरे में सौ इंच की शानदार स्मार्ट टीवी है।
फ़िल्म देखने की पहल ये खुद करेंगे,
लेकिन कमरे में आते ही नज़र मोबाइल पर टिका लेंगे—
ताकि यह साबित हो सके
कि वे फ़िल्म देखने नहीं, बस यूँ ही आ गए हैं।

हक़ीक़त यह होती है कि
वे फ़िल्म देखने ही आए होते हैं,
बस मानना नहीं चाहते—
क्योंकि रुचि दिखाना इन्हें छोटा लगने लगता है।

8. एहसान स्वीकार न करने वाले

इस तरह के लोगों की एक और बहुत आम आदत होती है।
किसी चीज़ की ज़रूरत पड़े
या कोई काम करवाना हो,
तो ये आपसे ख़ुद ही कहते हैं।

आप पूरी नीयत से हाँ कर देते हैं।
और जब आप उनसे कहते हैं—
“ले जाइए, वह चीज़ तैयार है”
या
“हो गया आपका काम,”

तो जवाब कुछ ऐसा आता है—
“हाँ, मैं उनसे बोल देता हूँ”
या
“ठीक है, मैं उनसे कह देता हूँ।”

यानि ज़रूरत इन्हें थी,
मदद इन्होंने माँगी थी,
काम आपने किया—
लेकिन अहंकार ऐसा कि यह मानने को तैयार नहीं
कि इन्होंने किसी से कुछ लिया है।

भाषा को इस तरह घुमा दिया जाता है
कि ऐसा लगे जैसे
इन्होंने एहसान लिया नहीं,
बस व्यवस्था करा दी हो।

यह मदद लेने की झिझक नहीं है,
सीधा अहंकार है।
दूसरे की सहायता स्वीकार कर लेना
इन्हें यह बात अपनी शान के ख़िलाफ़ लगती है।

9. दूसरों को नीचा दिखाकर ऊपर चढ़ने वाले

खुद के घर में सालों तक कोई सुविधा न हो,
लेकिन आपके यहाँ आएँगे तो उसी में कमी ढूँढेंगे।

कल तक जिनके घर में एसी नहीं थी,
और बिना एसी के ज़िंदगी चल ही रही थी—
आज वही हर जगह कहते फिरते हैं,
“हम एसी के बिना रह ही नहीं सकते।”

और आपके घर पहुँचते ही तंज़ उछलेगा—
“आपकी एसी से पानी क्यों टपकता रहता है?”

मतलब साफ़ है—
आपकी चीज़ को नीचा दिखाने की आड़ में
ये यह भी एलान कर देते हैं
कि अब इनके घर में एसी लग चुकी है।

10. खुद को बहुत व्यस्त दिखाने वाले

इनकी सबसे आम आदत—
व्हाट्सऐप पर उत्तर न देना।

संदेश देख लिया जाएगा,
लेकिन जानबूझकर देर की जाएगी।
क्योंकि देर से जवाब देना
इन्हें महत्वपूर्ण महसूस कराता है।

और जैसे ही इन्हें आपसे कोई काम पड़ता है,
तुरंत उपलब्ध हो जाते हैं।

यह व्यस्तता नहीं,
सीधा घमंड है।

11. सबसे सस्ती तरकीब अपनाने वाले

खुद को बड़ा दिखाने के लिए
ये लोग हर हद पार कर देते हैं—

गरीब बच्चे का मज़ाक उड़ाना,
किसी के हिंदी मीडियम में पढ़ने पर तंज़ कसना,
किसी के लंगड़ेपन,
हकलाने,
शक्ल या बीमारी तक पर हँसना,
इनके लिए कोई बड़ी बात नहीं।

क्योंकि इनके यहाँ
खुद को बड़ा दिखाने का
सबसे सस्ता,
सबसे आसान
और सबसे नीच तरीका
यही है कि
किसी और को
छोटा कर दिया जाए।

12. हर बात का ढिंढोरा पीटने वाले

अगर इन्हें किसी को यह बताना हो कि ये महाशय क्या करते हैं,
तो एक डर भी साथ चलता है—
कहीं लोग इन्हें बड़बोला न समझ लें।

इसलिए ये सीधे नहीं बोलते।
बात को घुमा-फिराकर रखते हैं,
इतनी सफ़ाई से कि
आप खुद ही समझ जाएँ
कि इनका पेशा क्या है।

बातों-बातों में,
कहीं से भी,
बेहद मासूमियत ओढ़कर
अपनी उपलब्धि ठूँस देना
इनकी पुरानी आदत होती है।

जैसे—
“कल मैंने कोचिंग में
अपने एक स्टूडेंट को डाँट दिया,
बेचारा रोने लगा…”

इतना कहना ही काफ़ी होता है—
यह घोषित करने के लिए
कि महाशय कोचिंग चलाते हैं।

आख़िरी बात

ऐसे लोग बहुत मीठे होते हैं,
इसीलिए पहचान में देर लगती है।
लेकिन एक बार पहचान हो जाए,
तो दूरी ही सबसे समझदारी भरा रास्ता है।

पहचानिए, दूरी बनाइए—
और खुद को बचाइए।

अपनी ही आवाज़ रिकॉर्डिंग में अजीब क्यों लगती है?

अपनी ही आवाज़ रिकॉर्डिंग में अजीब क्यों लगती है?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

कई लोगों के लिए यह एक अजीब और परेशान करने वाला अनुभव होता है।
जब वे सामान्य बातचीत में बोलते हैं, तो उन्हें अपनी आवाज़ बिल्कुल ठीक लगती है।
लेकिन जैसे ही वे अपनी ही रिकॉर्ड की हुई आवाज़ सुनते हैं,
उन्हें वही आवाज़ अजनबी, अटपटी या कभी-कभी बेहद खराब लगने लगती है।

कुछ लोगों के लिए यह सिर्फ़ हैरानी की बात होती है,
तो कुछ के लिए शर्म और झिझक का कारण बन जाती है।
इसका एक जीता-जागता उदाहरण मैंने इंस्टाग्राम की एक रील में देखा था,
जहाँ एक रील क्रिएटर मज़ाकिया लेकिन उदासी भरे अंदाज़ में कह रहा था—

“आज जब खुद की आवाज़ रिकॉर्डिंग में सुनी,
तो लगा कि अब तक जिन-जिन लोगों से मैंने बात की है,
उन सब से माफ़ी माँग लूँ।”

वह रील सिर्फ़ एक मज़ेदार क्लिप नहीं थी,
बल्कि उस एहसास की अभिव्यक्ति थी
जिससे बहुत से लोग भीतर ही भीतर गुज़रते हैं।
इसी वजह से अक्सर मन में यही सवाल उठता है—
क्या मेरी आवाज़ सच में ऐसी ही है?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है
कि हम अपनी आवाज़ को कैसे सुनते हैं,
और रिकॉर्डिंग में वही आवाज़ अलग क्यों लगती है।

1. यह समस्या असल में क्या है?

जब हम बोलते हैं, तो अपनी आवाज़ हमें बिल्कुल सामान्य लगती है।
लेकिन रिकॉर्डिंग सुनते समय वही आवाज़ अजीब लगने लगती है।

यह इसलिए नहीं होता कि आवाज़ खराब है,
बल्कि इसलिए कि दिमाग को वैसी आवाज़ सुनने की आदत नहीं होती।

यह एहसास पूरी तरह सामान्य है।
लगभग हर इंसान को अपनी रिकॉर्ड की हुई आवाज़
कभी न कभी अटपटी या “बुरी” लगती है।

2. हम अपनी आवाज़ कैसे सुनते हैं?

जब आप खुद बोलते हैं,
तो आप अपनी आवाज़ को दो रास्तों से सुनते हैं।

एक, हवा के ज़रिए—जिसे Air Conduction कहते हैं।
दूसरा, खोपड़ी की हड्डियों के ज़रिए—जिसे Bone Conduction कहा जाता है।

Bone conduction आपकी आवाज़ में
depth, bass और softness जोड़ देता है।
इसी वजह से जब आप खुद बोलते हैं,
तो आपकी आवाज़ आपको ज़्यादा भारी, साफ़ और बेहतर लगती है।

यही वह आवाज़ होती है,
जिसकी आपके दिमाग को बचपन से आदत पड़ चुकी होती है।

3. रिकॉर्डिंग में आवाज़ अलग क्यों लगती है?

रिकॉर्डिंग सुनते समय bone conduction शामिल नहीं होता।
आप अपनी आवाज़ को सिर्फ़ हवा के ज़रिए सुनते हैं।

इसी कारण रिकॉर्डिंग में आपकी आवाज़
थोड़ी पतली, ऊँची और कम भराव वाली लगती है।
वह “खुद जैसी” नहीं लगती।

यहीं पर दिमाग तुरंत प्रतिक्रिया देता है—
“ये मैं कैसे हो सकता हूँ?”

और इसी क्षण
अजीबपन और शर्म का एहसास शुरू हो जाता है।

4. रिकॉर्डिंग सुनकर शर्म क्यों आती है?

रिकॉर्डिंग में आपकी आवाज़
बिल्कुल सीधी और बिना किसी परत के सामने आती है।
जबकि आपका दिमाग सालों से
bone conduction के साथ मिली हुई आवाज़ सुनता आया है।

इन दोनों के बीच का फर्क
दिमाग “गलत” मान लेता है।
इसीलिए आपको लगता है—
मेरी आवाज़ खराब है।

जबकि सच्चाई यह है कि
आपकी आवाज़ ऐसी ही सबको सुनाई देती है,
और वह बिल्कुल सामान्य होती है।

5. इस एहसास से बाहर कैसे आया जाए?

ज़्यादातर लोग कुछ ही हफ्तों में
बार-बार अपनी आवाज़ सुनकर
इस एहसास के आदी हो जाते हैं।

धीरे-धीरे दिमाग
रिकॉर्डिंग वाली आवाज़ को भी
“अपनी आवाज़” मानने लगता है।

इस प्रक्रिया में मदद करता है—
थोड़ा अभ्यास,
थोड़ा धैर्य
और खुद को जज न करना।

6. एक अहम सच्चाई

आपकी आवाज़ में कोई कमी नहीं है।
बस आपके कानों ने आपकी असली आवाज़
कभी वैसे सुनी ही नहीं,
जैसे दुनिया सुनती है।

इसीलिए रिकॉर्डिंग वाली आवाज़
आपको अजनबी लगती है।

7. दूसरों की आवाज़ अजीब क्यों नहीं लगती?

क्योंकि दूसरों की आवाज़
हम हमेशा सिर्फ़ हवा के ज़रिए सुनते हैं।

उनकी लाइव और रिकॉर्डेड आवाज़
हमें लगभग एक-सी लगती है।
इसलिए दिमाग को कोई झटका नहीं लगता।

लेकिन अपनी आवाज़ के साथ
ऐसा नहीं होता।

8. शर्म आवाज़ की वजह से नहीं होती

अपनी आवाज़ पर जो शर्म महसूस होती है,
वह आवाज़ की गुणवत्ता की वजह से नहीं होती।

यह biology और psychology का मिला-जुला असर है।

अगर आपकी आवाज़ में सच में कोई बड़ी समस्या होती,
तो बातचीत में उसका असर ज़रूर दिखता।
लोग असहज होते,
या संवाद सहज रूप से नहीं चलता।

लेकिन ऐसा नहीं होता।

9. रिकॉर्डिंग आपकी पहचान नहीं है

रिकॉर्डिंग आपकी आवाज़ का
सिर्फ़ एक तकनीकी रूप होती है।

माइक की अपनी सीमाएँ होती हैं,
कमरे की echo आवाज़ को बदल देती है,
और मोबाइल माइक आवाज़ का भराव कम कर देता है।

इसलिए रिकॉर्डिंग में आवाज़
“कच्ची” लग सकती है।
लाइव में वही आवाज़
ज़्यादा असरदार होती है।

10. आख़िरी बात

अजीबपन आपकी आवाज़ में नहीं,
उसे सुनने के अनुभव में है।

जैसे शीशे और कैमरे में
एक ही चेहरा अलग दिखता है,
वैसे ही रिकॉर्डिंग में आपकी आवाज़ नई लगती है—
लेकिन दुनिया आपको इसी आवाज़ में सुनती है,
और उसे वह बिल्कुल सामान्य लगती है।

यही सबसे भरोसेमंद सच्चाई है।