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यूट्यूब का वो सच—जो हर यूज़र झेलता है, पर कोई बोलता नहीं!

आजकल यूट्यूब वाले तो मानो विज्ञापन उद्योग के ब्रांड एम्बेसडर बन चुके हैं। यूट्यूब अब वीडियो प्लेटफ़ॉर्म कम, और “विज्ञापन प्रसारण सेवा” ज़्या...

यूट्यूब का वो सच—जो हर यूज़र झेलता है, पर कोई बोलता नहीं!

यूट्यूब का वो सच—जो हर यूज़र झेलता है, पर कोई बोलता नहीं!

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आजकल यूट्यूब वाले तो मानो विज्ञापन उद्योग के ब्रांड एम्बेसडर बन चुके हैं। यूट्यूब अब वीडियो प्लेटफ़ॉर्म कम, और “विज्ञापन प्रसारण सेवा” ज़्यादा लगने लगा है।

अब देखो, यह भी सच है कि यूट्यूब इतना सारा कंटेंट अपने सिर पर ढो रहा है, तो कमाई भी ज़रूरी है—वरना इतनी भारी ज़िम्मेदारी कैसे उठाएगा?
लेकिन जनाब, कमाई और “अति-लालच” में भी थोड़ा फर्क होता है।

म्यूज़िक सुनने के लिए यूट्यूब पर ही निर्भर रहने वाले एक आम इंसान की ट्रैजेडी देखिए—
जनाब अच्छे मूड में हैं। दिल चाहता है कि कोई पसंदीदा गाना सुना जाए।

जैसे ही उँगली वीडियो पर जाती है, और दिमाग में गाने की शुरुआती धुन की आस जगती है—कि अब ये बस बजने ही वाली है…
तभी अचानक कानों पर एक तेज़ हमला होता है—

‘मैं आपसे सिर्फ़ एक घंटा माँगता हूँ…’

बस… यहीं सब कुछ खत्म हो जाता है!

मूड ऐसा टूटता है जैसे किसी ने चाय में अमचूर डाल दिया हो।
आप जिस एहसास में जाने वाले थे, वहाँ जाने से पहले ही आपको ज़मीन पर पटक दिया जाता है—एक तेज़, चिल्लाता हुआ, जबरन घुसाया गया विज्ञापन सुनाकर।

यूट्यूब महाराज को यह बात अच्छी तरह पता है कि इंसान जब गाना सुनना चाहता है, तो वह इस दुनिया से, इस शोर से, इस तनाव से दूर भागना चाहता है।
लेकिन जनाब, आपने तो उसी “शोर” को गाने के दरवाज़े पर खड़ा कर दिया!

चार मिनट के गाने के पहले दो-दो विज्ञापन ठूँस देना—यह कौन-सा न्यायशास्त्र है? और आवाज़ इतनी तेज़—क्या पड़ोसी के घर टीवी खराब है, इसलिए हमारी तरफ़ से सेवा दे रहे हो?

यह तो वैसा ही है—जैसे हम डांडिया महोत्सव में पूरे जोश के साथ पहुँचे हों, इस उम्मीद में कि फाल्गुनी पाठक बस अब स्टेज पर आने ही वाली हैं…

और जैसे ही पर्दा खुले—कोई ‘पाठक साहब’ माइक लेकर खड़े मिलें और फरमाएँ—
‘पहले मेरी दो बातें सुन लीजिए।’

सच में, तीन-चार मिनट के गाने के पहले विज्ञापन ठूँसने का आइडिया किस महान आत्मा को आया होगा?
भाई, अगर लगाना ही है तो बीच में लगा लो—कम से कम शुरुआत तो सुकून से होने दो! बाद में तुम्हारा विज्ञापन भी झेल लेंगे।

और सोचने वाली बात यह है कि ये विज्ञापन भी ऐसे-ऐसे होते हैं, जिनका आपके मूड से कोई लेना-देना नहीं।
आप रोमांटिक गाना सुनने आए हैं, और सामने इंश्योरेंस, टूथपेस्ट या मोटिवेशनल गुरु जी खड़े मिलते हैं।

और असली अत्याचार तो तब होता है जब आप ईयरफ़ोन का वॉल्यूम फुल करके आराम से लेटे होते हैं—पूरी तैयारी के साथ कि आज तो गाने में डूब ही जाएँगे…
और तभी—धड़ाम!

एक ऐसा विज्ञापन कानों में घुसता है जैसे किसी ने लाउडस्पीकर सीधे दिमाग में फिट कर दिया हो।
वो दो-तीन सेकंड भी ऐसा एहसास देते हैं जैसे सिर के अंदर पटाखा फूट गया हो।

आप तुरंत वॉल्यूम कम करते हैं, लेकिन तब तक जो नुकसान होना था, वो हो चुका होता है—मूड का पोस्टमॉर्टम।

और फिर शुरू होता है सबसे बड़ा इम्तिहान—
उस “स्किप ऐड” बटन का इंतज़ार…
जो कभी-कभी ऐसे देर से आता है, जैसे आपसे बदला ले रहा हो।
और मानो कह रहा हो—
“गाना सुनने आए हो, तो उसका कर्ज भी अदा करो… इतने आसानी से स्किप नहीं होने दूँगा!”

पहले के दिन भी क्या दिन थे—
आप कोई भी वीडियो चलाते थे, और साइड में उसी माहौल वाले वीडियो अपने-आप दिखने लगते थे।
अब हालत ये है कि आप कोई पॉडकास्ट देख रहे होते हैं, और बगल में ध्रुव राठी की वीडियो, कोई डॉक्यूमेंट्री, या कुछ और ही ‘ज्ञान का बम’ फूट रहा होता है।
कोई गारंटी नहीं कि उसी कैटेगरी की वीडियो दिखेगी।
मतलब एल्गोरिदम भी अब ‘मनमर्जी विभाग’ में ट्रांसफर हो चुका है।

कभी-कभी तो लगता है कि यूट्यूब ने यह तय कर लिया है—
“अगर इंसान खुश है, तो उसे ज़्यादा देर खुश नहीं रहने देना।”

सच कहें तो, यूट्यूब ने सिर्फ़ विज्ञापन नहीं बढ़ाए…
उसने संगीत और इंसान के बीच जो सीधा रिश्ता था, उसके बीच एक दीवार खड़ी कर दी है—
जिसका नाम है “ऐड ब्रेक।”

और दीवार भी ऐसी, जो हर बार वहीं आकर खड़ी हो जाती है—
जहाँ दिल को सबसे ज़्यादा सुकून मिलने वाला होता है।

ईस्ट इंडिया कंपनी: व्यापार से शासन तक की कहानी

ईस्ट इंडिया कंपनी: व्यापार से शासन तक की कहानी

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

एक दिन इंग्लैंड में कुछ व्यापारियों ने सोचा—
भारत में मसाले हैं,
कपड़ा है,
और सबसे बड़ी बात—पैसा है।

अगर वहाँ व्यापार मिल जाए,
तो फायदा ही फायदा है।

इसी सोच के साथ
ईस्ट इंडिया कंपनी बनी
और जहाज़ों के साथ
भारत की ओर रवाना हो गई।

कुछ समय बाद
कंपनी भारत के तटों तक पहुँच गई—
लेकिन यहाँ एक सच्चाई थी:

आ जाना आसान था,
टिकना और व्यापार करना नहीं।

उस समय भारत पर
मुग़ल साम्राज्य का शासन था—
और उसकी ताक़त बहुत बड़ी थी।

मतलब साफ था—
बिना इजाज़त
कोई भी बाहरी व्यापारी
यहाँ व्यापार नहीं कर सकता था।

कंपनी को भी
झुकना पड़ा।

दरबार में पहुँची,
अनुमति माँगी,
और मुग़ल नियमों के अनुसार
व्यापार करने की इजाज़त मिली।

समय बीता…

और फिर आया दौर
औरंगज़ेब का।

अब भी कंपनी मौजूद थी—
लेकिन ताक़त नहीं थी।
उसे मुग़ल नियमों के अनुसार ही व्यापार करना पड़ता था।

लेकिन कंपनी के कुछ नेताओं को लगा कि
समुद्र में उनकी ताक़त बढ़ रही है
और वे मुग़ल सत्ता पर दबाव बना सकते हैं।

इसी सोच से
मुग़ल साम्राज्य से टकराव शुरू हुआ।

कंपनी ने मुग़ल जहाज़ों और व्यापार पर
दबाव बनाने की कोशिश की।

लेकिन यह फैसला
कंपनी पर ही भारी पड़ गया।

मुग़ल सत्ता उस समय
बहुत शक्तिशाली थी।

औरंगज़ेब के आदेश पर
कंपनी की कई फैक्ट्रियों पर कार्रवाई की गई,
संपत्ति ज़ब्त कर ली गई,
और उनका व्यापार रोक दिया गया।

आख़िर में
कंपनी को हार माननी पड़ी।

इतनी बुरी हार हुई
कि कंपनी के प्रतिनिधियों को
दरबार में जाकर

झुककर
माफ़ी माँगनी पड़ी,
भारी जुर्माना देना पड़ा,
और साथ ही वादा करना पड़ा—
कि आगे से वे यह गलती फिर कभी नहीं करेंगे।

उस दिन कंपनी को
एक बात समझ आ गई—

अभी नहीं…
अभी वे कमजोर हैं।

लेकिन एक दिन
ताक़तवर बनेंगे।

सीधी लड़ाई छोड़ दी गई
और रास्ता बदल दिया गया।

समय बीता…

औरंगज़ेब के बाद
मुग़ल साम्राज्य
धीरे-धीरे कमजोर होने लगा।

भारत में नई शक्तियाँ उभरने लगीं—

मराठा शक्ति बढ़ी,
सिख शक्ति मजबूत हुई,
और कई क्षेत्रीय नवाब
अपनी-अपनी सत्ता मजबूत करने लगे।

पूरे देश में
राजनीतिक बिखराव फैलने लगा।

जहाँ सत्ता बिखरती है,
वहीं मौके पैदा होते हैं—

और कंपनी को
ऐसे ही मौके का इंतज़ार था।

सीधी लड़ाई की जगह
अब चालें चली गईं—

दरबारों में दख़ल,
आपसी फूट,
रिश्वत,
और साज़िश।

धीरे-धीरे
व्यापार पीछे छूट गया…

और सत्ता
सामने आ गई।

फिर एक निर्णायक मोड़ आया—

प्लासी का युद्ध

यह सिर्फ एक युद्ध नहीं था,
बल्कि सत्ता बदलने की शुरुआत थी।

साज़िश और गद्दारी के सहारे
कंपनी ने जीत हासिल की।

यहीं से
सब कुछ बदल गया।

जो टैक्स देता था
→ अब टैक्स लेने लगा

जो अनुमति माँगता था
→ अब आदेश देने लगा

जो मेहमान था
→ अब मालिक बन गया।

इसके बाद
असली खेल शुरू हुआ।

भारत से कच्चा माल बाहर जाने लगा।
इंग्लैंड में उसी से सामान तैयार होता,
और वही सामान
भारत में महँगे दामों पर बेचा जाता।

धीरे-धीरे
भारत का पुराना कपड़ा उद्योग टूटने लगा,
और कारीगर बेरोज़गार होने लगे।

नतीजा साफ था—

किसान पर बोझ बढ़ने लगा,
कारीगरों की रोज़ी छिनने लगी।

ऊपर से टैक्स,
नीचे से भूख,
और बीच में
अंग्रेज़ी हुकूमत की लूट।

स्थानीय उद्योग टूटने लगे।
किसान पर बोझ बढ़ता गया।
और कंपनी का खजाना भरता गया।

फिर अकाल आए—

लोग भूखे मरते रहे,
लेकिन माल
विदेश जाता रहा।

धीरे-धीरे लोगों को समझ आने लगा—

यह शासन उनके हित में नहीं था,
बल्कि उनके शोषण का साधन बन चुका था।

और जब जनता समझ जाती है,
तो इतिहास बदलना शुरू हो जाता है।

देश भर में आवाज़ उठने लगी—

कहीं आंदोलन,
कहीं बलिदान।

अलग-अलग आवाज़ें
एक साथ आने लगीं।

धीरे-धीरे
पूरा देश जाग गया…

और अंत में
अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ा।

जो देश दबाया गया था—
वह आज़ाद हो गया।

यह सिर्फ
अंग्रेज़ों की कहानी नहीं है।

यह एक सबक है—

जब कोई सिर्फ लेने लगता है,
और देने का संतुलन खत्म हो जाता है,

तो एक दिन
उसे सब कुछ छोड़कर जाना ही पड़ता है।

लालच धीरे-धीरे नहीं गिराता…
सीधे नीचे गिराता है।

व्यापार करना गलत नहीं था,
ताक़त बढ़ाना भी गलत नहीं था—

लेकिन जब सब कुछ
सिर्फ अपने फायदे के लिए हो जाए,
तो अंत
पहले ही तय हो जाता है।

कभी-कभी इतिहास
छोटे-छोटे फैसलों से बदल जाता है।

यहाँ एक दिलचस्प सवाल उठता है—
अगर उस दिन औरंगज़ेब की सत्ता में
अंग्रेज़ों को माफ़ न किया जाता
और उन्हें उसी वक्त भारत से निकाल बाहर कर दिया जाता,
तो आगे का इतिहास कैसा होता?
हम भारतीयों का जीवन कैसा होता—
बेहतर या बदतर,
या शायद उससे भी कठिन?

औरंगज़ेब को एक कठोर शासक माना जाता है।
उसकी नीतियाँ पहले के मुग़ल बादशाहों जितनी उदार नहीं थीं।

औरंगज़ेब के दौर में कई समुदायों के साथ सख़्ती हुई,
लेकिन उसके पीछे कारण सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीति भी थी।

यह सिर्फ धर्म में सही या गलत का मामला नहीं था—
यह सत्ता, डर और उस समय की सोच का मिश्रण था।

जहाँ भी औरंगज़ेब को लगा कि कोई समूह उसकी सत्ता के खिलाफ खड़ा हो सकता है,
वहाँ उसने सख़्ती दिखाई।

इसलिए यह कहना आसान नहीं कि
अगर मुग़ल शासन जारी रहता,
तो हम भारतीयों का जीवन कैसा होता—
बेहतर, बदतर, या शायद उससे भी कठिन।

लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि—

हर जीत सिर्फ युद्ध से नहीं मिलती…
कभी-कभी अहिंसा भी
एक बड़ी ताक़त बन जाती है।

फ्री स्टॉक फुटेज = लेज़ी क्रिएटिविटी का सबूत…

फ्री स्टॉक फुटेज = लेज़ी क्रिएटिविटी का सबूत…

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आजकल कंटेंट बनाना इतना आसान हो गया है—
जैसे क्रिएटिविटी भी अब “डाउनलोड” होकर मिलने लगी हो।

एक स्क्रिप्ट उठाओ,
अपनी आवाज़ चिपकाओ,
और फिर… फ्री स्टॉक फुटेज का ट्रक उलट दो।

पिक्साबे, पेक्सेल्स — सब कुछ फ्री है,
तो ठूंसो भाई, जमकर ठूंसो!

और फिर बड़े गर्व से कहो —
“देखो, कितना प्रोफेशनल वीडियो बनाया है।”

असल में ये प्रोफेशनल नहीं,
“प्रो-फालतू” बन जाता है।

सीधी बात —
फ्री स्टॉक फुटेज = लेज़ी क्रिएटिविटी का सबूत।

मुझे हॉरर स्टोरी सुनना बहुत पसंद है —
वो दिल को छू लेने वाला डर,
जो दिमाग में ऐसा एहसास देता है
कि डर के होते हुए भी हम सुरक्षित महसूस करते हैं।

लेकिन आजकल के चैनल क्या करते हैं?

जैसे ही कहानी इंट्रेस्टिंग होती है —
धड़ाम! स्क्रीन पर एक खून से सना चेहरा,
टूटा हुआ जबड़ा,
और आँखें फाड़े एक डरावनी छवि सामने आ जाती है!

मतलब डराना है या हार्ट अटैक देना है?

कहानी कह रही है — “अंधेरा गलियारा…”
और वीडियो दिखा रहा है —
“भूत जी का क्लोज़-अप फोटोशूट।”

ये फुटेज कहानी से उतने ही जुड़े होते हैं,
जितना समोसे में पास्ता फिट बैठता है।

बस “हॉरर फेस” सर्च किया,
डाउनलोड किया,
और ठेल दिया।

नतीजा?
सिर्फ डर रह जाता है,
और कहानी की रोचकता से ध्यान हट जाता है।

असल डर तो सन्नाटे में होता है —
सूखे पत्तों की आवाज़,
दूर चलती परछाईं,
हवा की खामोशी…

लेकिन नहीं,
हमें तो हर दो मिनट में
“भूत जी का सेल्फी मोमेंट” दिखाना है।

लोग सोचते हैं —
“फ्री मिला है, ज्यादा डालेंगे तो वीडियो मस्त लगेगा।”

सच्चाई ये है —
जितना ज्यादा ठूंसोगे,
उतना ही कंटेंट उबाऊ लगेगा।

और यहीं पर एक बात अक्सर मन में आती है…

जब हम अपना कंटेंट खुद बना रहे हैं,
तो विज़ुअल्स भी अपने क्यों नहीं बनाते?
हम अपने ही लोगों को, अपनी ही जगहों को क्यों नहीं दिखाते?

मान लीजिए आप एक ढाबे से जुड़ी हॉरर स्टोरी बना रहे हैं —
तो क्यों न आप अपने दोस्तों के साथ
रात में किसी ढाबे पर जाकर शूट करें?

वही असली माहौल,
वही असली फील —
जो किसी भी फ्री फुटेज से नहीं मिल सकता।

जब आप अपना कंटेंट खुद शूट करते हैं,
तो उसमें एक अलग ही जान होती है…
और वही जान सीधे दर्शक तक पहुँचती है।

सबसे खास बात —
अच्छा कंटेंट लोग जल्दी-जल्दी नहीं,
बल्कि रुक-रुक कर, ठहराव के साथ देखना पसंद करते हैं।

क्योंकि वहाँ सिर्फ वीडियो नहीं होता,
वहाँ असलियत होती है।

एक दिन, सुबह चाय के साथ
मैं एक इंडियन हॉरर स्टोरी सुन रहा था।

कहानी में माइक पर बोल रहा व्यक्ति कह रहा था:
दो दोस्त थे…
गाँव का सुनसान रास्ता था…
तभी पुलिस ने गाड़ी रोक ली।

पर वीडियो में क्या दिखा रहे थे?

जंगल में पुलिस कार…
और उसमें से उतर रही एक अफ्रीकी लड़की।

अब कहानी भारतीय गाँव की,
पुलिस वाले सारे मर्द…

लेकिन फुटेज कह रही है —
“ग्लोबल विलेज बना देते हैं भाई!”

दर्शक सोचता है —
“ये कहानी है या इंटरनेशनल एक्सचेंज प्रोग्राम?”

जब डॉक्यूमेंट्री भी ‘मिक्स एंड मैच’ खेलती है,
तब तो कमाल ही हो जाता है।

एक डॉक्यूमेंट्री में
सद्दाम हुसैन की कहानी चल रही थी —
पॉलिटिक्स, ड्रामा, फांसी तक।

और बैकग्राउंड में?
करबला… वहाँ के मातम की फुटेज।

मतलब…
कहानी कुछ और,
फुटेज कुछ और।

बस “इराक जैसा लग रहा है” —
इतना कनेक्शन काफी समझ लिया!

अब दर्शक कन्फ्यूज —
“ये इतिहास है या रिलिजन का रीमिक्स?”

ट्रस्ट?
वो तो वहीं खत्म हो जाता है।

और आजकल एक और अजीब ट्रेंड दिख रहा है…

न्यूज़ चैनल अब ज़रूरत से ज़्यादा
AI इमेज का इस्तेमाल करने लगे हैं।

समस्या ये नहीं कि AI इस्तेमाल हो रहा है —
समस्या ये है कि
गलत इमेज भी बिना सुधारे ही डाल दी जाती है।

एक बार AI ने जो बना दिया,
बस वही सीधे चला दिया जाता है।

और सबसे अजीब बात —
AI अक्सर भारतीय चेहरों को
एक जैसे टेम्पलेट में ढाल देता है।

जबकि सच्चाई ये है कि
यहाँ लोगों के चेहरे
अलग-अलग रंग, टोन और बनावट में होते हैं।

लेकिन AI वही दिखा रहा है,
जो डेटा उसे मिला है —
और वो डेटा भी अक्सर वहीं से आता है
जहाँ विदेशी लोग भारत आकर
कुछ चुनिंदा तस्वीरें लेकर चले जाते हैं।

अब ये तो हुई AI इमेज की बात…

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता।
यही हाल फ्री स्टॉक फुटेज के साथ भी हो रहा है।

ऐसे ही एक दिन क्रिप्टो वीडियो खोला —
सोचा आज कुछ ज्ञान मिलेगा।

वीडियो शुरू —
बिटकॉइन, ब्लॉकचेन, ट्रेडिंग…

और स्क्रीन पर?
पेड़ हिल रहे हैं,
हवा बह रही है,
स्लो मोशन में प्रकृति मुस्कुरा रही है।

क्यों?
क्योंकि “रिलैक्सिंग नेचर फुटेज” फ्री थी।

भाई, ये क्रिप्टो है या योगा क्लास?

चार्ट दिखाओ,
डेटा दिखाओ,
मार्केट दिखाओ…

लेकिन नहीं,
हमें तो पेड़ों से ही ट्रेडिंग समझानी है।

नतीजा —
दिमाग भी हवा के साथ बह जाता है।

अगर स्टोरी में दम है,
तो आवाज़ ही काफी है,
चेहरा ही काफी है।

बाकी सब सजावट है,

और सजावट अगर ज़्यादा हो जाए,
तो घर नहीं…
शादी का पंडाल लगने लगता है।

अच्छे क्रिएटर्स जानते हैं —
कम दिखाओ, सही दिखाओ।

हॉरर है तो माहौल बनाओ,
डॉक्यूमेंट्री है तो रिसर्च दिखाओ,
क्रिप्टो है तो डेटा और विज़ुअल्स दिखाओ।

हर जगह “फ्री मिला तो डाल दो” —
ये क्रिएटिविटी नहीं,
आलस का प्रदर्शन है।

फ्री स्टॉक फुटेज इस्तेमाल करना गलत नहीं है,

लेकिन बिना सोचे-समझे,
बिना मैच किए,
सिर्फ इसलिए कि “फ्री है” —

ये साफ-साफ लेज़ी क्रिएटिविटी है।

तो अगली बार जब
हॉरर स्टोरी में भूत जी अचानक फोटो खिंचवाने आ जाएँ,

या किसी डॉक्यूमेंट्री में बेमेल फुटेज घुसा दी जाए,

या क्रिप्टो वीडियो में पेड़ लहराने लगें,

तो समझ जाना —

फ्री स्टॉक फुटेज वाला सीन है।

इससे अच्छा तो AI इमेज इस्तेमाल कर लेता —
कम से कम कंटेंट से मेल तो खाती।

और वैसे भी असली असर

ना उस फुटेज में है,
ना उस इफेक्ट में,

वो छुपा है —
शब्दों में,
आवाज़ में,
और सही टाइमिंग वाले सस्पेंस में।

बाकी सब…
बस फ्री का लालच है।

तस्वीरों में अपना-सा ईरान, खबरों में पराया क्यों?

तस्वीरों में अपना-सा ईरान, खबरों में पराया क्यों?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

कुछ चित्र ऐसे होते हैं जो सिर्फ तस्वीरें नहीं होते…
वे यादों के दरवाज़े होते हैं।

उन्हें देखते ही बचपन की खुशबू, मासूमियत और सादगी जैसे फिर से ज़िंदा हो उठती है—
और हम अनजाने में ही उसी दुनिया में लौट जाते हैं,
जहाँ ज़िंदगी आसान थी… और दिल सच्चे थे।

ऐसे ही कुछ चित्रों ने मुझे रोक लिया।
इतना कि एक दिन मेरी नज़र उनके सिग्नेचर पर ठहर गई।

थोड़ा खोजा… और तब पता चला कि ये खूबसूरत रचनाएँ एक ईरानी कलाकार अली मिरी की हैं।

उनकी कला सिर्फ चित्र नहीं बनाती—
वो एहसास जगा देती है।

कहीं बच्चे खेलते दिखते हैं,
कहीं परिवार एक साथ बैठा होता है…
और हर दृश्य में एक सुकून छुपा होता है,
जो धीरे-धीरे दिल में उतरता जाता है।

उनके कुछ चित्रों में दीवार पर रुहोल्ला खोमैनी की तस्वीर भी नजर आती है—
जो उनके ईरानी परिवेश की झलक देती है…
लेकिन भावनाएँ?
वो बिल्कुल अपनी-सी लगती हैं।

और शायद यहीं से एक सच्चाई समझ में आती है—

ईरान के लोग भी हमारी तरह ही हैं…
वही हँसी, वही रिश्ते, वही छोटी-छोटी खुशियाँ, वही ज़िंदगी।

तो फिर सवाल उठता है—

जिस देश के लोग इतने अपने जैसे हैं…
उसे दुनिया के सामने “पराया” क्यों दिखाया जाता है?

अक्सर दुनिया में “अच्छा” और “बुरा” तय करने का पैमाना भी ताकत से तय होता है।

आपने सुना होगा—
ईरान पर दबाव इसलिए है क्योंकि वह न्यूक्लियर प्रोग्राम चला रहा है।

यह सच है कि दुनिया में सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है…
लेकिन क्या पूरी कहानी सिर्फ इतनी ही है?

अगर थोड़ा गहराई से देखें, तो बात सिर्फ न्यूक्लियर या आतंकवाद की नहीं लगती…
बात लगती है—नियंत्रण की, ताकत की, और यह तय करने की कि कौन झुकेगा और कौन नहीं।

ईरान की “गलती” क्या थी?

बस इतनी कि उसने कहा—
हम अपने फैसले खुद लेंगे।

अपने संसाधनों पर अपना हक माँगा।
और झुकने से इंकार किया।

फिर क्या हुआ?

प्रतिबंध लगे।
छवि खराब की गई।
दबाव बढ़ाया गया।

संदेश सीधा था—
या तो झुको… या झुका दिए जाओ।

आज की दुनिया देखिए—

हमले होते हैं… जवाब दिए जाते हैं।
लेकिन इस टकराव के बीच सबसे ज्यादा कौन पिसता है?

मासूम लोग।

आज ग़ज़ा में हज़ारों बच्चे, औरतें, परिवार—अपनी जान गंवा चुके हैं।
अस्पताल तक सुरक्षित नहीं रहे।

कारण बताया जाता है—
वहाँ आतंकी छिपे थे।

लेकिन एक सवाल दिल में चुभता है—

अगर किसी जगह कुछ गलत लोग छिपे हों…
तो क्या उस पूरी जगह को मिटा देना इंसाफ़ है?
क्या वे बच्चे भी दोषी थे?

यहीं एक पुरानी कहानी याद आती है—

एक धनी व्यक्ति था, जिसके पास एक बंदर था, जो उसकी सेवा करता था।

एक दिन वह व्यक्ति सो रहा था।
एक मक्खी बार-बार आकर उसे परेशान कर रही थी।

बंदर ने यह देखा… और उसे सहन नहीं हुआ।
वह मक्खी को भगाने की कोशिश करता रहा,
लेकिन जब वह बार-बार लौटती रही, तो वह झुंझला गया।

आखिरकार उसने एक बड़ा पत्थर उठाया…
और ज़ोर से वार कर दिया।

लेकिन उस एक वार में…
उसने अपने ही स्वामी की जान ले ली।

सीख बहुत साफ है—

मूर्खता और जल्दबाज़ी,
हमेशा विनाश लाती है।

आज भी कहीं-कहीं यही हो रहा है—
एक को खत्म करने के नाम पर
सैकड़ों मासूमों को मिटा दिया जाता है।

असल मुद्दा क्या है?

सिर्फ हथियार नहीं।
सिर्फ आतंकवाद नहीं।

असल खेल है—
ताकत, संसाधन और नियंत्रण।

और सबसे बड़ी सच्चाई?

ताकतवर देश कहानियाँ बनाते हैं…
और दुनिया उन्हें सच मान लेती है।

लेकिन असली कहानियाँ कहीं और लिखी जाती हैं—

मासूमों के खून में,
टूटी हुई छतों के नीचे,
और उन आँखों में…

जो आज भी बस एक ही सवाल पूछ रही हैं—

“हमारा कसूर क्या था?”

जो नाना ने देखा, हमने बाद में समझा

जो नाना ने देखा, हमने बाद में समझा

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आज मैं अपने नाना की ज़िंदगी की कुछ झलकियाँ लिख रहा हूँ। इनमें डर भी है, खोने का दर्द भी, पाने की उम्मीद भी, और कुछ ऐसी घटनाएँ भी हैं जिन पर आज बहुत से लोग शायद यक़ीन न करें। यहाँ मैं वही लिख रहा हूँ, जो नाना की ज़ुबानी मैंने कई बार सुना।

यह वाक़या करीब 1947 के आसपास का है, लेकिन इसकी शुरुआत उससे भी पहले की घटनाओं से होती है। नाना के पिता एक भारतीय सैनिक थे। सेना में अपना कर्तव्य निभाने के बाद उनका मन पूरी तरह इबादत की ओर लग गया था। वे बेहद समझदार और पढ़े-लिखे बुज़ुर्ग इंसान थे, और अपना ज़्यादातर समय इबादत में ही बिताया करते थे।

उनका इंतकाल रहस्यमय परिस्थितियों में हुआ। एक दिन वे घर की छत पर इबादत कर रहे थे। तभी अचानक घरवालों ने देखा कि वे सीढ़ियों से नीचे गिर पड़े। उसी हादसे में उनकी रूह परवाज़ कर गई। हैरानी की बात यह थी कि उनके शरीर पर कोई गंभीर चोट दिखाई नहीं दे रही थी, जबकि पूरी सीढ़ियाँ खून से लथपथ थीं।

उन्होंने यह बात बहुत पहले ही कह दी थी कि उन्हें ग्वालियर में ज़िन्नातों की मस्जिद के पास स्थित कब्रिस्तान में ही दफ़न किया जाए। उनके इंतकाल के बाद उनकी यही इच्छा पूरी की गई।

जब नाना के वालिद का साया उनके सिर से उठा, तब नाना की उम्र मुश्किल से 14–15 साल रही होगी। कुछ दिनों बाद, जब नाना अपने वालिद की कब्र पर ग़मगीन होकर फ़ातिहा पढ़ रहे थे, तभी अचानक कई बकरियाँ आकर उनके आसपास खड़ी हो गईं। उसी समय एक चरवाहे के भेष में कोई उनके पास आया और बोला, “इस ख़ाक में क्या रखा है?”

नाना ने शांत, मगर शायराना अंदाज़ में जवाब दिया, “यह ख़ाक मेरे लिए बहुत क़ीमती है।”

वह कुछ क्षण उन्हें देखते रहे, फिर बोले, “तू अपने बाप का बहुत अच्छा बेटा है। यह दुआ पढ़।”

फिर उन्होंने वह दुआ पढ़कर सुनाई और कहा, “इसे पढ़ने से तू मालामाल हो जाएगा। लेकिन एक शर्त है—किसी से नहीं कहना कि तेरी मुलाकात मुझसे हुई, और यह दुआ भी किसी को मत बताना।”

नाना ने हँसकर कहा, “तुम खुद इसे पढ़कर अमीर क्यों नहीं बन जाते?”

इस पर उन्होंने नाना से बस इतना ही कहा, “तू अभी बहुत छोटा है…”

इस बातचीत के बाद नाना एक किनारे जाकर नमाज़ पढ़ने लगे। जैसे ही उन्होंने सलाम फेरा, वह जो चरवाहे के भेष में थे, वहाँ से गायब थे। यहाँ तक कि दूर-दूर तक कोई बकरी भी दिखाई नहीं दी।

नाना का स्वभाव ऐसा था कि वे केवल अपने बारे में नहीं सोचते थे। उनके मन में आया—जब मेरे अपने लोगों को भी पैसों की ज़रूरत है, तो यह दुआ उनसे क्यों छिपाऊँ?

जब वे दाल बाज़ार पहुँचे, तो वही चरवाहे के भेष वाला उन्हें फिर दिखाई दिया। उसे देखकर नाना थोड़ा सहम गए। उन्होंने नाना से दोबारा कहा, “ध्यान रखना, किसी को बताना मत।”

लेकिन नाना ने इस चेतावनी को उतनी गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें लगा—आख़िर दुआ ही तो है।

जब वे अपने करीबियों के पास पहुँचे, तो पूरी घटना सुनाने लगे। पर जैसे ही दुआ बताने का समय आया, अचानक उनका मुँह बंद हो गया। ज़ुबान ने साथ छोड़ दिया। गले में जैसे काँटे चुभने लगे। दर्द इतना बढ़ गया कि वे खड़े-खड़े ही नहीं, बैठे-बैठे भी गिर पड़ने लगे।

दो दिन तक वे उसी तकलीफ़ में रहे। फिर एक रात वही हस्ती दोबारा उनके पास आई। उन्होंने उँगली से इशारा करते हुए कहा, “देख… यह सब तेरा था। यह सब तेरा होने वाला था…”

नाना ने देखा कि जहाँ उन्होंने इशारा किया, वहाँ सोने और जवाहरात का ढेर लगा हुआ था। लेकिन पल भर में सब कुछ गायब हो गया।

नाना की वालिदा ही नहीं, बल्कि बाकी करीबी भी इन बातों से अनजान नहीं थे। इसलिए वे सब मिलकर नाना को एक ऐसे बुज़ुर्ग के पास ले गए, जो रूहानी इल्म रखते थे और वही उनकी परेशानी का हल निकाल सकते थे।

नाना के साथ गए लोगों ने पूरी घटना उन बुज़ुर्ग के सामने रखी। इसके बाद उन्होंने अपने तरीके से उनका रूहानी इलाज शुरू किया।

लेकिन वहाँ भी एक ऐसा वाक़या हुआ, जिसने नाना को अंदर तक हिला दिया।

एक समय, जब वह बुज़ुर्ग और नाना सो रहे थे, तभी अचानक नाना की आँख खुल गई। उन्होंने देखा कि उन बुज़ुर्ग का सिर कहीं पड़ा है, हाथ कहीं, पैर कहीं और धड़ भी उनसे अलग पड़ा हुआ है। यह डरावना दृश्य देखकर नाना की जैसे साँस ही थम गई।

हालाँकि बाद में पता चला कि वह बुज़ुर्ग बिल्कुल ठीक थे। दरअसल वे सब दृश्य इस बात का इशारा थे कि वे बुज़ुर्ग किस कदर रूहानी इल्म के मालिक थे।

कुछ ही समय उनके पास रहने के बाद नाना पूरी तरह ठीक हो गए। तब उन बुज़ुर्ग ने कहा, “तुम्हारे वालिद ज़िन्नातों के सरदारों को नमाज़ पढ़ाते थे। जो तुम्हारे पास आया था, वह उन्हीं सरदारों में से एक था। तुमने उसकी बात नहीं मानी, इसलिए तुम पर यह मुसीबत आई।”

इसके बाद समय आगे बढ़ता रहा, लेकिन नाना की ज़िंदगी में एक ऐसा डरावना दौर आया, जिसे याद करते हुए भी उनका चेहरा गंभीर हो जाता था। उन्होंने अपनी आँखों से दंगे देखे, उनसे जुड़ा क़त्लेआम देखा, और मारकाट के कई ऐसे दृश्य देखे जिन्हें शब्दों में बयान करना आसान नहीं। वह समय ऐसा था जब इंसान की जान की कोई कीमत नहीं रह गई थी।

नाना की वालिदा का मन अब उस घर में बिल्कुल नहीं लगता था। उस घर की हर दीवार में नाना के वालिद की यादें बसी थीं, और वही यादें सबको भीतर तक बेचैन कर देती थीं।

और इतना ही नहीं, उस घर में कुछ ऐसी अजीब घटनाएँ भी होने लगी थीं जो दिल में एक अनजाना डर पैदा करती थीं। नाना की वालिदा अक्सर सफेद साड़ी पहना करती थीं। उनकी साड़ी पर बिना किसी कारण अक्सर खून के छींटे दिखाई देने लगे थे। इसी कारण उन्होंने बिजलीघर के पास बने उस घर को छोड़ दिया और रामगढ़ में अपने कुछ करीबियों के पास रहने लगीं।

ग्वालियर में नाना के वालिद के नाम से काफ़ी ज़मीन और कई मकान थे। वे कभी वहीं रहा करते थे। बाद में, रिश्तेदारों के डबरा में बस जाने के कारण पूरा परिवार भी डबरा आकर रहने लगा।

परिवार के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य के जाने के बाद सब कुछ बदल गया। वे डबरा से भोपाल आ गए। वजहें कई थीं—रोज़गार की तलाश, बीते दुख से दूर जाना और दंगे-फ़साद के अस्थिर माहौल से खुद को बचाना। नाना के सभी भाई-बहन अपनी वालिदा को साथ लेकर भोपाल में बस गए।

उस दौर की अफरा-तफरी में ग्वालियर की उनकी ज़मीन के कागज़ात उसी ज़मीन पर बने घर में ही रह गए और भोपाल नहीं लाए जा सके। उस समय इस बात को सबने हल्के में लिया, और फिर वे सब वहीं अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए।

धीरे-धीरे भोपाल में नाना के भाइयों को लोग जानने-पहचानने लगे। उनका व्यवहार बहुत अच्छा था, इसलिए आस-पास के लोग भी उनसे अपनापन महसूस करने लगे।

उसी दौर में मशहूर गायिका और अभिनेत्री नूरजहां को भोपाल स्थित अपनी हवेली में रहने के लिए एक भरोसेमंद और नेक परिवार की तलाश थी, ताकि जब भी वे वहाँ आएँ तो हवेली में एक अपनापन बना रहे। काफी खोजबीन के बाद आखिरकार उनकी टीम के एक सदस्य ने नाना के परिवार को वहाँ रहने का प्रस्ताव दिया।

इस तरह नाना के सभी भाई-बहन और उनकी वालिदा उस हवेली में रहने लगे। नाना के तीन भाई और दो बहनें थीं, और नाना उन सबमें सबसे छोटे थे। उनके सभी भाई किसी फैक्टरी में काम करने लगे थे, जबकि नाना अपनी वालिदा और बहनों के साथ नूरजहां की हवेली में ही रहा करते थे।

नूरजहां जी ज़्यादातर मुंबई में व्यस्त रहती थीं। कभी-कभी आराम के लिए भोपाल आया करती थीं। नाना बताया करते थे कि वह बेहद नेकदिल थीं—और सच में, नाना सही कहा करते थे। आज जब मैं उनसे जुड़े पुराने इंटरव्यू देखता हूँ, तो कई बड़े कलाकार भी उनके बारे में इसी तरह सम्मान से भरी बातें करते नज़र आते हैं।

एक बार मैंने लता मंगेशकर जी का एक पुराना इंटरव्यू देखा, जिसमें उनसे पूछा गया था, “सब आपके फैन हैं, आप किसकी फैन हैं?” इस पर लता जी ने नूरजहां और मेहदी हसन का नाम लिया था।

लता जी आगे बताती हैं कि जब उनकी पहली मुलाकात नूरजहां से हुई, तब उनकी उम्र करीब 14–15 साल थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने उनसे सिर्फ गायकी ही नहीं, बल्कि बहुत कुछ सीखा। लता जी के मुताबिक, उर्दू के शब्द किस अंदाज़ में बोले जाएँ, यह बात भी उन्होंने नूरजहां से ही सीखी थी।

एक इंटरव्यू में लता जी ने यह भी बताया कि जब नूरजहां जी नमाज़ के अंत में दुआ के लिए हाथ उठाती थीं, तो अक्सर रो पड़ती थीं।

बचपन में नाना हमें अक्सर बताया करते थे कि जब नूरजहां हवेली में आतीं, तो नाना की वालिदा से तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनवातीं और हम सबके साथ बैठकर ही खाना खातीं।

एक दिन नाना की वालिदा नूरजहां के लिए पानी लेकर आ रही थीं। तभी रसोई में रखा जग और गिलासों का सेट उनके हाथ से गिरकर टूट गया। वह सेट बहुत खूबसूरत और महँगा मालूम पड़ता था, इसलिए उन्हें इस बात का गहरा अफसोस हुआ।

जब नूरजहां ने देखा कि नाना की वालिदा इस बात से बेहद शर्मिंदा हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं बीबी, काँच का ही तो था… उसे तो एक दिन टूटना ही था।”

नूरजहां का स्वभाव ही ऐसा था कि वे छोटी-छोटी बातों को दिल पर नहीं लेती थीं। अक्सर जब वे नाना को मुस्कुराते देखतीं, तो उनकी वालिदा से हँसते हुए कहतीं, “बीबी, अपना बेटा तू मुझे गोद दे दे… मैं इसे मुंबई ले जाकर हीरो बनाऊँगी।”

लेकिन नाना की वालिदा हर बार मुस्कुराकर उनकी यह बात टाल देती थीं।

आज जब मैंने नूरजहां जी के बारे में पढ़ा, तो पता चला कि 1947 के विभाजन के बाद उन्होंने पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लिया था। जब दिलीप कुमार ने उनसे भारत में ही रहने का आग्रह किया, तो उन्होंने कहा था, “मैं जहाँ पैदा हुई हूँ, वहीं जाना चाहती हूँ।”

नाना बताया करते थे कि भारत विभाजन के समय समाज बहुत बड़े बदलावों से गुजर रहा था। उसी दौर में तुम्हारी नानी की बहन भी अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चली गई थीं। शुरुआती दिनों में उनका परिवार हमसे मिलने आया करता था और हमारे घर ही ठहरता था। हम लोग उनसे फोन पर बातें भी किया करते थे, लेकिन बाद में दोनों तरफ से संपर्क टूट गया और धीरे-धीरे मिलने-जुलने का सिलसिला भी खत्म होता गया।

1947 में भारत विभाजन के बाद, नूरजहां के पाकिस्तान जाने से पहले ही नाना का परिवार फिर से डबरा लौट आया था। वजह बस इतनी थी कि नाना की वालिदा का मन वहाँ बिल्कुल नहीं लगता था। बड़े शहर की भागदौड़ और नूरजहां की गैरमौजूदगी में उस हवेली का सूनापन उन्हें रास नहीं आता था।

उधर ग्वालियर में नाना के वालिद की जो ज़मीन थी और उस पर बने मकान थे, वे अब उनके हाथ से निकल चुके थे। उस दौर का माहौल भी अशांत था और वहाँ बहुत कुछ बदल चुका था। कागज़ात साथ न होने के कारण वे उन्हें दोबारा हासिल नहीं कर पाए, और आखिरकार उस ज़मीन को वापस पाने का ख्याल भी मन से निकाल दिया। आज वही जगह “ओल्याई डॉक्टर का वाड़ा” के नाम से जानी जाती है।

भोपाल जाने से पहले नाना का परिवार डबरा में ‘बिजलीघर’ के पास रहता था। बाद में वे वहीं से कुछ दूर रामगढ़ में रहे। फिर भोपाल से वापस डबरा आने के बाद नाना उषा कॉलोनी में रहने लगे और जीवन के अंत तक वहीं रहे।

यह सच है कि एक समय ऐसा आया जब नाना के हाथ से उनके वालिद की ज़मीन चली गई। लेकिन बाद में ऐसा भी लगा, जैसे किस्मत हिसाब बराबर करना चाहती हो।

नाना का एक सिख मित्र था, जो उनसे बेहद स्नेह रखता था। आज डबरा में जहाँ बस स्टैंड के पास पक्की दुकानें बनी हुई हैं, वहाँ उस समय नदी बहती थी और अक्सर पानी भरा रहता था। वही ज़मीन वह सिख मित्र नाना को बिना किसी कीमत के देना चाहता था। वह अक्सर नाना से कहा करता था, “भाई, तू मुझे बस एक नारियल और कुछ बताशे दे दे, और यह ज़मीन अपने नाम कर ले।”

लेकिन नाना ने उस ज़मीन को लेने के लिए कभी भी हामी नहीं भरी। वे हमेशा अपनी खुद्दारी में उनसे कहा करते थे, “मैं इस ज़मीन का क्या करूँगा? मेरा एक ही तो बेटा है।”

आज उसी ज़मीन पर पक्की दुकानें बनी हुई हैं, और वह जगह डबरा की बेहद कीमती जगहों में गिनी जाती है।

नाना से काफ़ी लोग स्नेह रखते थे। जीवन के एक दौर में वे दर्जी का काम किया करते थे। आगे चलकर उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ आढ़त का व्यवसाय भी शुरू किया। पुराने गाड़ी अड्डा में उनकी फल-सब्ज़ियों से भरी आढ़त की दुकान हुआ करती थी। उन्हें खाने-पीने और दूसरों को खिलाने-पिलाने का बड़ा शौक था। खासकर मीठा उन्हें बेहद पसंद था।

उनकी ज़िंदगी में ग़ज़लें थीं, शेरो-शायरी थी, नातें थीं और नज़्में भी थीं। साथ ही उन्हें शौक के तौर पर पहलवानी और कुश्ती का भी बड़ा शौक था—वे खुद भी कुश्ती खेलते थे और दूसरों को सिखाया करते थे।

साथ ही उन्हें अपनों के बीच बैठकर पुरानी फ़िल्मों के कुछ मशहूर कॉमेडियन, जैसे जॉनी वॉकर, की कॉमेडी के किस्से या फ़िल्मों के मज़ेदार सीनों की चर्चा करने का बेहद शौक था। वे हँसते-मुस्कुराते हुए यह सब किस्से सुनाया करते थे। साथ ही उन्हें बच्चों से बातें करने का भी बड़ा शौक था। वे बच्चों से हँसी-मज़ाक किया करते थे—कभी कहते, “ये कपड़े मेरे हैं”, तो कभी ‘चुन-चुन करती आई चिड़ियाँ’ जैसे गीत गाकर उन्हें हँसा देते थे।

आगे चलकर उन्होंने रूहानी और यूनानी दोनों तरह के इल्म हासिल किए। वे अलग-अलग लोगों का इलाज किया करते थे—कुछ का रूहानी तरीक़े से और कुछ का देसी तथा यूनानी दवाओं से।

आज जब मैं नाना की ये बातें याद करता हूँ, तो महसूस होता है कि हर इंसान की ज़िंदगी अपने भीतर इतिहास, अनुभव और अनगिनत कहानियाँ छिपाए रहती है।

याद आता है वह पल, जब एक दिन मैं नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के गीत सुन रहा था। तभी अचानक नुसरत साहब और नूरजहां का गाया हुआ गीत “तेरे बिना रोगी होए प्यासे नैन” सुनने को मिला। उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि जिन शख्सियतों की दुनिया दीवानी है, वे कभी मेरे नाना के कितने क़रीब रही थीं।

बचपन में जब नाना कहा करते थे, “हम नूरजहां की शूटिंग देखा करते थे… वह मुझसे तरह-तरह की बातें किया करती थीं…”, तो मैं बस यही समझता था कि कोई पुरानी अभिनेत्री होंगी, जिनका ज़िक्र नाना किया करते हैं।

लेकिन आज जब नूरजहां के बारे में पढ़ता हूँ, तो समझ आता है कि उन्हें “मलिका-ए-तरन्नुम” क्यों कहा गया। लगभग चार दशकों तक उन्होंने अपनी आवाज़ और अभिनय से लोगों के दिलों पर राज किया। आज भी उनके बारे में चर्चा न हो, ऐसा होना मुश्किल है।

काफ़ी समय पहले जब मैं उनकी गाई हुई ग़ज़ल “हमारी साँसों में आज तक वो” सुन रहा था, तो दिल से उसे अपनी अब तक की सबसे पसंदीदा ग़ज़ल मान लिया था।

सच है, बुज़ुर्ग जो कहते हैं, उसे हम कभी-कभी हल्के में ले लेते हैं। बचपन में उनकी बातें साधारण लग सकती हैं, लेकिन वे ऐसे दौर को देखकर आए होते हैं, जिसकी सीढ़ियाँ हम अभी चढ़ना शुरू ही करते हैं।

हमें यह एहसास बहुत देर से होता है कि जिन बुज़ुर्गों के साथ हम बड़े हुए, वे अपने भीतर पूरे एक दौर की यादें समेटे हुए थे।

यह सच है कि भले ही आज तकनीक बहुत आगे बढ़ गई हो, लेकिन उस दौर के संगीत की जो मिठास थी, वह अब कम ही महसूस होती है। आज कई बार सब कुछ बनावटी-सा लगता है। शायद यही वजह है कि लोग फिर से पुराने दौर की हर चीज़ को याद करने लगे हैं और उसे फिर से महसूस करना चाहते हैं।

धर्म नहीं, इंसान के कर्म जिम्मेदार हैं — फिर धर्म को क्यों बदनाम किया जाता है?

धर्म नहीं, इंसान के कर्म जिम्मेदार हैं — फिर धर्म को क्यों बदनाम किया जाता है?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आज का समय एक अजीब और चिंताजनक दौर से गुजर रहा है। हर धर्म विशेष का व्यक्ति दूसरे धर्म पर लांछन लगाने में लगा हुआ है—और ये लांछन इतने विचित्र होते हैं कि सुनने वाला व्यक्ति स्वयं से यह प्रश्न करने लगता है कि मैंने या मेरे परिवार ने ऐसा कब किया, जिसका आरोप मुझ पर लगाया जा रहा है।

यदि हम ईमानदारी से देखें, तो हर धर्म के प्राचीन शास्त्रों में कुछ ऐसी बातें मिल जाएँगी, जिन्हें आज के समय में न तो हम अपनाना चाहेंगे और न ही उनके बारे में चर्चा करना पसंद करेंगे। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है, क्योंकि हर धर्म एक अलग समय और सामाजिक परिस्थिति में विकसित हुआ। लेकिन जब आज के शिक्षित और जागरूक लोग स्वयं उन बातों का अनुसरण नहीं कर रहे, तो उन्हीं बातों को आधार बनाकर नफरत फैलाने का उद्देश्य क्या है? क्या यह केवल समाज को बाँटने का एक साधन नहीं बन गया है?

यह भी एक सच्चाई है कि हर धर्म के कुछ देहाती या अशिक्षित क्षेत्रों में ऐसे लोग मिल सकते हैं, जो आज भी पुरानी परंपराओं और मान्यताओं का पालन करते हैं।

नफरत फैलाने वाले लोग इसी सच्चाई का फायदा उठाते हैं। वे जानबूझकर ऐसे लोगों को खोजते हैं, उन्हें कैमरे में कैद करते हैं, उनकी राय लेते हैं, और फिर उस सामग्री को भ्रामक और अधूरी जानकारी के साथ मिलाकर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत करते हैं। इससे एक ऐसा भ्रम पैदा किया जाता है, मानो वही विचार पूरे धर्म का प्रतिनिधित्व करते हों।

दुखद बात यह है कि अब इस कार्य में बड़े-बड़े फिल्म निर्माता और प्रभावशाली व्यक्ति भी शामिल होते जा रहे हैं, जो अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण निष्पक्ष सत्य दिखाने के बजाय एक विशेष धारणा गढ़ने और उसे स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

आज स्थिति यह हो गई है कि जिस धर्म में किसी गलत चीज का स्पष्ट और सख्त विरोध किया गया है, उसी धर्म को उसी चीज का समर्थक दिखाने की कोशिश की जाती है—वह भी आधी-अधूरी या पूरी तरह भ्रामक जानकारी के आधार पर। जबकि वास्तविकता यह होती है कि उस धर्म में उस चीज का कोई समर्थन ही नहीं होता। क्या यह विडंबना नहीं है? क्या यह सचमुच एक अजीब और चिंताजनक स्थिति नहीं है?

लोग शायद यह मूलभूत सत्य भूल गए हैं कि जिनके घर शीशे के बने होते हैं, उन्हें दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।

और यह भी एक गहरा सत्य है कि जब हम किसी और की ओर एक उंगली उठाते हैं, तो तीन उंगलियाँ हमारी ओर ही होती हैं—जो हमें हमारी अपनी कमियों की याद दिलाती हैं।

समझ से परे है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी धर्म को लेकर कोई गलतफहमी है, तो वह स्वयं उसकी सच्चाई जानने का प्रयास क्यों नहीं करता। और यदि वह स्वयं अध्ययन नहीं कर सकता, तो आज के समय में ChatGPT जैसे माध्यम उपलब्ध हैं, जहाँ विभिन्न धार्मिक शास्त्रों के आधार पर संतुलित और तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

पर अफसोस, सत्य की खोज करने के बजाय लोगों को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी की अधूरी, भ्रामक और सनसनीखेज जानकारी पर विश्वास करना अधिक आसान लगता है।

उदाहरण के लिए, व्हाट्सऐप पर एक पोस्ट में दावा किया गया कि महाराणा प्रताप युद्ध के मैदान में 360 किलो का भार अपने शरीर पर लेकर उतरते थे। सुनने में यह बात भले ही अत्यंत रोमांचक लगे, लेकिन जब कोई व्यक्ति सत्य जानने का प्रयास करता है, तो वास्तविकता बिल्कुल अलग सामने आती है।

उदयपुर के सिटी पैलेस म्यूजियम में आज भी महाराणा प्रताप के कवच और हथियार सुरक्षित रखे हुए हैं, और वहाँ स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि उनका वास्तविक वजन लगभग 35 किलो है।

स्पष्ट है कि तथ्य और कल्पना के बीच गहरा अंतर होता है। लेकिन जो लोग सत्य से अधिक विवाद और उत्तेजना में रुचि रखते हैं, उन्हें व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया ज्ञान ही अधिक आकर्षक लगता है।

सत्य और असत्य के बीच का अंतर समझना आज पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। गलत जानकारी पर आधारित वीडियो और प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित जानकारी में जमीन-आसमान का अंतर होता है। यह भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि सोशल मीडिया पर एक विशेष धर्म को बदनाम करने के लिए जानबूझकर वीडियो और रील्स वायरल की जाती हैं।

किसी मानसिक रूप से अस्थिर या गलत व्यवहार करने वाले व्यक्ति की हरकतों को अक्सर उसके पूरे धर्म से जोड़ दिया जाता है, और उसे इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो वह पूरे धर्म की पहचान हो। जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। सच यह है कि ऐसे लोग हर धर्म में पाए जाते हैं—यह किसी एक धर्म की समस्या नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज की एक सच्चाई है।

लेकिन यहाँ एक पैटर्न साफ दिखाई देता है। कुछ मामलों में ऐसी घटनाओं को पूरी प्रमुखता के साथ दिखाया जाता है—व्यक्ति का नाम, उसकी पहचान, उसका धर्म—सब कुछ बार-बार दोहराया जाता है, जिससे धीरे-धीरे वह घटना एक व्यक्ति की न रहकर एक पूरे धर्म की पहचान बना दी जाती है। वहीं दूसरी ओर, जब किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति वैसी ही हरकत करता है, तो मीडिया कई बार उसका नाम और धार्मिक पहचान बताने से बचता है। वह खबर तो दिखाता है, क्योंकि यह उसका कर्तव्य है और वह उसे पूरी तरह छुपा नहीं सकता, लेकिन व्यक्ति की पहचान को सीमित रखता है।

यही वह अंतर है, जिसे एक जागरूक व्यक्ति आसानी से समझ सकता है—कि सूचना केवल निष्पक्ष रूप से नहीं दी जाती, बल्कि उसे धर्म के आधार पर दो अलग-अलग तरीकों से परोसा जाता है।

परंतु वास्तविकता इससे अलग और अधिक व्यापक है। सच यह है कि गलत व्यक्ति का कोई धर्म नहीं होता—गलत केवल उसका कर्म होता है। लेकिन जब कर्म की जगह धर्म को केंद्र बना दिया जाता है, तो इससे सत्य कमजोर और भ्रम मजबूत हो जाता है।

इसी कारण आज यह पहले से अधिक आवश्यक हो गया है कि हम हर जानकारी को बिना सोचे-समझे स्वीकार न करें, बल्कि उसके स्रोत, संदर्भ और उद्देश्य को भी समझें।

नफरत फैलाने वालों से एक प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए—यदि आपका जन्म उसी धर्म में हुआ होता, जिसका आज आप अपमान कर रहे हैं, तो क्या आप तब भी उसे तुच्छ समझते, या उसे छोड़कर किसी दूसरे धर्म को अपनाने का साहस दिखाते?

केवल दो परिवारों का ही उदाहरण ले लीजिए, जिनके घर एक-दूसरे के बिल्कुल पास-पास हैं। दोनों एक ही धर्म से जुड़े हुए हैं, लेकिन एक परिवार ऐसा है जहाँ शराब, जुआ और बुरी आदतों ने घर का माहौल बिगाड़ दिया है, और उनके बच्चे भी उन्हीं गलत रास्तों पर आगे बढ़ रहे हैं। वहीं, उसी धर्म का दूसरा परिवार ऐसा है, जो इन सभी बुराइयों से दूर रहकर आध्यात्मिक विचारों और अच्छे संस्कारों के साथ एक संतुलित और सम्मानजनक जीवन जी रहा है।

अब प्रश्न यह उठता है कि इन दोनों परिवारों में अंतर किसने पैदा किया? क्या उनका धर्म अलग था? नहीं—धर्म तो दोनों का एक ही था।

इससे स्पष्ट होता है कि केवल किसी धर्म विशेष से जुड़ा होना ही पर्याप्त नहीं है। धर्म का वास्तविक अर्थ उसे अपने आचरण और जीवन में अपनाना है, न कि केवल उसके नाम पर इतराना। क्योंकि धर्म की पहचान व्यक्ति के नाम से नहीं, बल्कि उसके कर्म, उसके संस्कार और उसके चरित्र से होती है।

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि इंसान अपने धर्म से नहीं, बल्कि अपने कर्म और संस्कारों से महान बनता है। धर्म चाहे कितना ही महान क्यों न हो, यदि व्यक्ति के अंदर अच्छे संस्कार नहीं हैं, तो समाज उसे सम्मान नहीं देगा। और इसके विपरीत, यदि व्यक्ति के कर्म श्रेष्ठ हैं, तो उसका सम्मान उसके धर्म से परे जाकर भी किया जाएगा।

इससे यह स्पष्ट होता है कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और संस्कारों से प्राप्त होती है।

यदि किसी व्यक्ति को सच में धर्म को समझने की इच्छा है, तो उसे व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी की भ्रामक और अधूरी जानकारी से ऊपर उठना होगा और विभिन्न धर्मों के मूल शास्त्रों का अध्ययन करना होगा—वह भी खुले मन और विनम्र दृष्टिकोण के साथ। क्योंकि जब तक मन में अपने धर्म को लेकर अहंकार बना रहेगा, तब तक सच्चे ज्ञान का द्वार कभी नहीं खुल सकता।

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब: मेरी जिंदगी का एक हिस्सा

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब: मेरी जिंदगी का एक हिस्सा

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

याद आता है वह बचपन का सुनहरा दौर, जब घर के उस कमरे में, जहाँ डेक रखा होता था, उसके पास बैठकर हर कैसेट का कवर बड़े गौर से देखा करता था—उसकी चमकदार तस्वीरें, रंग-बिरंगे नाम और बड़े-बड़े अक्षर। हर कवर एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल देता था। उनमें से एक कैसेट मेरे लिए खास थी। बाएँ कोने में उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब और दाएँ कोने में जावेद अख्तर साहब—दोनों के मुस्कान भरे चेहरे। और नीचे बीच में बड़े अक्षरों में सिर्फ़ एक शब्द लिखा था—संगम। वही उस एल्बम का नाम था।

बचपन में मैं हर तरह का संगीत सुनता था—फिल्मी गाने, क़व्वाली, ग़ज़लें, सब कुछ। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और एक लंबे अंतराल के बाद जब उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब की आवाज़ फिर से मेरे कानों में गूँजी, तब जाकर सच्चा एहसास हुआ। यह कोई मामूली आवाज़ नहीं थी। यह रूह की गहराइयों से निकलती हुई, सीधे दिल को छूने वाली, आत्मा को झकझोर देने वाली पुकार थी—एक ऐसी आवाज़ जो शब्दों से परे जाकर भावनाओं को जगा देती थी।

उस समय इंटरनेट तो दूर की बात थी, मोबाइल फ़ोन भी बहुत कम लोगों के पास थे। जानकारी सीमित थी, लेकिन चाहत असीम। फिर आया मुहर्रम का महीना। इस्लामी कैलेंडर की नौवीं तारीख। गली-मोहल्ले में जुलूस निकला। दूर से डीजे की आवाज़ आ रही थी। और अचानक एक क़व्वाली गूँजी—

“इस शाने करम का क्या कहना…”

इतनी कठिन जुगलबंदी, इतनी गहराई और रूह को भीतर तक झकझोर देने वाली वह आवाज़ मैंने इससे पहले कभी नहीं सुनी थी। उस क्षण ऐसा लगा मानो समय ठहर गया हो। उसी पल यह स्पष्ट हो गया कि इस क़व्वाली को इस शान, इस असर और इस आत्मिक शक्ति के साथ कोई और गा ही नहीं सकता।

यहीं से मेरे भीतर एक नई चाह पैदा हुई—नुसरत साहब को और सुनने की, उन्हें और समझने की।

मैं बाज़ार गया, उनका नाम बताया और उनकी कैसेट माँगी—लेकिन ज़्यादातर लोग समझ ही नहीं पाए। वजह साफ़ थी। मैं डबरा में रहता हूँ, और यहाँ बहुत से लोग संगीत तो सुनते हैं, लेकिन कौन-सा गीत किसने गाया या लिखा, यह जानना उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं होता। यह स्वाभाविक भी है—जब ऐसे ही लोग फ़िल्म में “दूल्हे का सेहरा” में कादर ख़ान को देखेंगे, तो उनके लिए यह समझना कठिन होगा कि वास्तविक गायक कौन है। उनके लिए मूल बात केवल यही होती है—आम खाओ, गुठलियाँ मत गिनो।

नुसरत साहब के गीतों का अलग से कोई संग्रह मुझे नहीं मिला, इसलिए मैंने फ़िल्म कच्चे धागे की कैसेट खरीद ली, जिसमें उन्होंने संगीत दिया था और क़व्वाली सहित कई शानदार गीत शामिल थे। उस कैसेट ने मेरे लिए एक नया दरवाज़ा खोल दिया—एक ऐसी दुनिया का, जहाँ संगीत केवल सुना नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है।

फिर टेलीविज़न पर एक नया दौर शुरू हुआ। हर शाम एक तय समय पर फिल्मी गीतों के बीच नुसरत साहब का भी एक गीत आता। मैं हर शाम उसका इंतज़ार करने लगा। वह गीत था—“कोई जाने कोई ना जाने…” केवल एक बार सुन पाना मन को तसल्ली नहीं देता था। दिल कहता—और सुनना है, और गहराई में उतरना है।

उसी समय ज़ी टीवी पर “सा रे गा मा” शुरू हुआ। वह कार्यक्रम उन दिनों एक अलग ही रंग लेकर आया था। पाकिस्तान से कई प्रतियोगी शामिल हुए। उनमें मुसर्रत सबसे खास थे। वे अक्सर उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब के गीत गाते थे। उनकी आवाज़ में वही रूहानी झलक दिखाई देती थी। वह कार्यक्रम और मुसर्रत—दोनों मेरे पसंदीदा बन गए।

उन दिनों मेरा एक दोस्त अपनी बहन के नवजात बेटे के लिए नाम सुझाने की बात करने आया था। उसके पापा ने कहा था कि नाम ‘म’ से शुरू होना चाहिए, क्योंकि बच्चे का जन्म किसी खास रात में हुआ था। मैंने बिना सोचे तुरंत कहा—मुसर्रत।

इस नाम में ‘म’ भी था और ‘रत’ भी—जो ‘रात’ से जुड़ा हुआ था।

जब उसने अपने पिताजी को यह नाम बताया, तो उन्हें यह नाम बेहद पसंद आया। आज भी वह परिवार स्नेहपूर्वक याद करता है कि मुसर्रत का नाम मैंने सुझाया था।

इंटरनेट के बिना उन दिनों बेचैनी चरम पर थी। नुसरत साहब को सुनने के लिए तरसता था। आखिरकार एक ऑल-इन-वन म्यूज़िक प्लेयर खरीदा। उसमें सबसे अधिक उनके ही गीत होते थे। सच कहूँ, उसी प्लेयर ने मुझे नुसरत साहब की दुनिया में पूरी तरह ले जाकर बसाया। मोहल्ले के दोस्तों को जब अपने हाई क्वालिटी ईयरफ़ोन से “आफ़रीन आफ़रीन” सुनाता, तो नुसरत साहब की सरगम की आवाज़ कभी लेफ्ट से गूँजती, तो कभी राइट से उभरती। उस स्टीरियो ध्वनि का जादू ऐसा होता, मानो उनकी आवाज़ चारों ओर फैलकर सीधे रूह को छू रही हो। वे भी सुनकर कह उठते—“नुसरत साहब जैसा कोई नहीं।”

अब केवल बात उस महान शख्स की, जिन्होंने अपनी आवाज़ से पूरी दुनिया को बदल दिया।

सन् 1985। इंग्लैंड का मर्सी आइलैंड। वर्ल्ड ऑफ म्यूज़िक, आर्ट्स एंड डांस उत्सव, जिसका आयोजन मशहूर रॉक कलाकार पीटर गैब्रियल कर रहे थे। लोग हाथों में बीयर लिए रॉक और पॉप पर झूम रहे थे। तभी मंच पर अचानक बदलाव हुआ। सफेद कालीन बिछाई गई। कुर्ता-पायजामा में साज़िंदे चुपचाप बैठ गए। दर्शकों को लगा—शायद कोई साधारण लोक संगीत होगा।

हारमोनियम सधा। सुर उठे।

आठ-दस मिनट बीते।

फिर दो शब्द गूँजे—“अल्लाह हू…”

बस, वहीं से जादू छा गया। शब्दों का अर्थ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन आवाज़ का असर इतना गहरा था कि लोग खड़े होकर झूमने लगे। कुछ की आँखों से आँसू बहने लगे। कुछ आँखें बंद कर उस संगीत में खो गए। जो प्रस्तुति केवल एक घंटे की थी, वह रात के तीन बजे तक चलती रही। वही रात उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान की वैश्विक पहचान की शुरुआत बनी।

आपको शायद हैरानी होगी कि उनका प्रशंसक वर्ग भारत, पाकिस्तान और यूनाइटेड किंगडम से भी ज़्यादा जापान में था। जापानी उन्हें सम्मान से “सिंगिंग बुद्धा” कहते थे। फुकुओका शहर में एक कॉन्सर्ट के दौरान वे “दमादम मस्त कलंदर” गा रहे थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक जापानी महिला रोती हुई उनके पास आई। उसने भावुक स्वर में कहा—

“मैं बहुत तनाव में थी। मैं आत्महत्या करने वाली थी। लेकिन आपकी आवाज़ ने मुझे जीने की वजह दे दी।” 

यह केवल एक गायक की आवाज़ नहीं थी। यह रूह की आवाज़ थी—टूटे हुए दिलों को जोड़ने वाली, जीवन की बुझती लौ को फिर से प्रज्वलित करने वाली।

इसी दिव्यता और प्रभाव के कारण दुनिया ने उन्हें “शहंशाह-ए-क़व्वाली” का खिताब दिया। यह कोई साधारण उपाधि नहीं थी—यह प्रेम, श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक थी, जो पूरी दुनिया के श्रोताओं ने उन्हें अपने दिल से दी थी। उनकी आवाज़ ने भाषा, धर्म और सरहदों की सीमाओं को पार कर सीधे रूह को छुआ। यही कारण है कि वे संगीत की दुनिया में अमर हो गए।

एक और वाकया है, जो एक साधारण इंसान और एक महान कलाकार के बीच का अंतर स्पष्ट कर देता है।

फिल्म कच्चे धागे के दौरान, जिसमें मुख्य भूमिका अजय देवगन निभा रहे थे, गीत आनंद बख्शी जी द्वारा लिखे जाने थे और संगीत की जिम्मेदारी उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब के हाथों में थी। इसी सिलसिले में नुसरत साहब पाकिस्तान से मुंबई आए। तय हुआ कि उनकी मुलाकात आनंद बख्शी जी से होगी और दोनों साथ बैठकर गीतों पर काम करेंगे। लेकिन किसी न किसी कारण से यह मुलाकात बार-बार टलती रही।

धीरे-धीरे आनंद बख्शी जी के मन में यह बात घर कर गई—

“नुसरत साहब मुंबई आए हैं, लेकिन मुझसे मिलने नहीं आ रहे। अगर उन्हें गीत चाहिए, तो उन्हें स्वयं आना चाहिए।”

यह एक गलतफहमी थी, लेकिन अहंकार और संकोच ने इस दूरी को और बढ़ा दिया।

एक दिन नुसरत साहब ने अपने साथियों से कहा—

“मुझे बांद्रा ले चलो, आनंद बख्शी जी के घर।”

आनंद बख्शी जी पहली मंजिल पर रहते थे। वहाँ लिफ्ट नहीं थी। सीढ़ियाँ चढ़कर ही ऊपर जाना पड़ता था।

जब आनंद जी को पता चला कि नुसरत साहब आ रहे हैं, तो वे खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए। उन्होंने नीचे देखा—एक कार आकर रुकी। कार से उतरते समय तीन-चार लोग नुसरत साहब को सहारा दे रहे थे। फिर वे धीरे-धीरे, बड़ी कठिनाई से सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

यह दृश्य देखकर आनंद बख्शी जी स्तब्ध रह गए।

उन्हें उसी क्षण यह एहसास हुआ कि नुसरत साहब उनसे मिलने इसलिए नहीं आ सके थे, क्योंकि उन दिनों उनके लिए चलना-फिरना बेहद कठिन हो गया था।

यह सच्चाई समझते ही आनंद जी की आँखें नम हो गईं, और वे खुद को संभाल नहीं पाए—वे रो पड़े।

जैसे ही नुसरत साहब ऊपर पहुँचे, आनंद बख्शी जी अपने भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाए। वे तुरंत आगे बढ़े, उनके चरणों में झुक गए और अपने अहंकार व गलतफहमी के लिए विनम्रता से गहरा पश्चाताप व्यक्त करने लगे।

वह क्षण केवल दो कलाकारों की मुलाकात नहीं था—वह महानता, विनम्रता और सच्चे सम्मान का प्रतीक था।

उस दिन के बाद दोनों महान कलाकारों ने साथ मिलकर ऐसे अमर गीतों की रचना की, जो आज भी भारतीय सिनेमा की अनमोल धरोहर हैं।

एक और वाकया है, सन् 1995 में हॉलीवुड फिल्म डेड मैन वॉकिंग के लिए संगीत तैयार किया जा रहा था। निर्देशक सीन पेन थे। संगीत के लिए एडी वेडर को बुलाया गया। एडी वेडर ने कहा—

“मुझे ऐसी आवाज़ चाहिए, जो सिर्फ गले से नहीं, रूह की गहराइयों से निकले।”

तब उन्हें नुसरत साहब का नाम सुझाया गया। जैसे ही नुसरत साहब ने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा, एडी वेडर इतने प्रभावित हुए कि रिकॉर्डिंग समाप्त होते ही वे गहरे सम्मान के साथ उनके सामने झुक गए।

यह केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं था—यह एक रूहानी आवाज़ के प्रति आत्मा से निकला हुआ समर्पण था।

आज जब अपने ही देश के कुछ गायक उनके ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हैं, तो दिल में गहरा अफ़सोस होता है। वे ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो संगीत पर केवल उन्हीं का अधिकार हो।

पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि नुसरत साहब द्वारा गाई गई क़व्वालियों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करके उनके बारे में भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है।

हाल ही में एक क्लिप वायरल हुई—

“कुछ तो सोचो मुसलमान हो तुम, काफ़िरों को ना घर में बिठाओ…”

पहली नज़र में यह पंक्ति सुनकर गलतफहमी होना स्वाभाविक है। शब्दों का सतही अर्थ अक्सर मन में भ्रम पैदा कर देता है। लेकिन जब आप यूट्यूब पर जाकर ‘साथ देने का वादा किया है’ शीर्षक वाली इसी क़व्वाली को पूरी तरह सुनते हैं, तब इसका वास्तविक भाव और गहराई सामने आती है। ज़रा इन पंक्तियों पर गौर फ़रमाइए—

साथ देने का वादा किया है
जान-ए-जां अपना वादा निभाओ
यूँ ना छोड़ो मुझे रास्ते में
दो कदम तो मेरे साथ आओ

कुछ तो सोचो मुसलमान हो तुम
काफ़िरों को ना घर में बिठाओ
लूट लेंगे ये ईमान हमारा
अपने चेहरे से गेसू हटाओ

मेरी तुरबत पे क्यों रो रहे हो
नींद आई है मुश्किल से मुझको
कब्र में चैन से सो रहा हूँ
छींटे देकर ना मुझको जगाओ

चारागर, मैं हूँ बीमार ऐ फ़ुरक़त
क्यों उठाते हो बेकार ज़हमत
करना चाहो जो मेरा मदावा
ढूँढ़कर मेरे दिलबर को लाओ

जब वो देखेंगे मय्यत तुम्हारी
ऐ फ़ना उनको अफ़सोस होगा
हो तो मुमकिन तो अपने ख़ुदा से
थोड़ी-सी ज़िंदगी माँग लाओ

यह क़व्वाली किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक आशिक़ के टूटे हुए दिल की पुकार है। यह उस प्रेमी की कहानी है, जिसकी महबूबा ने साथ निभाने का वादा किया, लेकिन उसे अधूरा छोड़ दिया। वह स्वयं को बीमार बताता है—ऐसी बीमारी से, जिसका इलाज केवल उसका ‘दिलबर’ है।

जिस शब्द पर सबसे अधिक आपत्ति की जाती है, वह है—‘काफ़िर’। लेकिन सूफ़ी काव्य और उर्दू शायरी में ‘काफ़िर’ शब्द का प्रयोग अक्सर धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक अर्थ में होता है। यहाँ ‘काफ़िर’ उस महबूबा का रूपक है, जिसकी खूबसूरती और बेरुख़ी आशिक़ का ‘ईमान लूट लेती है।’ जब नुसरत साहब गाते हैं—“अपने चेहरे से गेसू हटाओ”—तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आशिक़ अपनी प्रेमिका की ज़ुल्फ़ों की बात कर रहा है, न कि किसी धार्मिक पहचान की।

अब ज़रा इस स्थिति पर विचार कीजिए—यदि आम लोगों को इस क़व्वाली का केवल एक अंश सुनाया जाए, तो स्वाभाविक है कि वे उसी सीमित संदर्भ में अर्थ निकालेंगे। अधूरी जानकारी अक्सर गलत निष्कर्षों को जन्म देती है। ‘काफ़िर’ शब्द का एक अर्थ ‘नास्तिक’ भी है—ऐसा व्यक्ति, जो ईश्वर को नहीं मानता। विभिन्न धर्मों और परंपराओं में ईश्वर की ओर उन्मुख रहने और नास्तिकता से दूर रहने की बात कही गई है। इस संदर्भ में भी यह शब्द घृणा का नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और काव्यात्मक प्रयोग है।

याद आता है ‘आप की अदालत’ का वह प्रसंग, जिसमें तारेक फ़तेह ने कहा था कि ‘काफ़िर’ शब्द का अर्थ समय के साथ विकृत कर दिया गया। कभी यही शब्द सुंदरता के लिए प्रशंसा के रूप में प्रयोग होता था—“क्या काफ़िर हसीना है…”—अर्थात ऐसी सुंदरता, जो व्यक्ति को सम्मोहित कर दे।

लेकिन विडंबना यह है कि जब यही प्रसंग नुसरत साहब की क़व्वाली के संदर्भ में सामने आया, तो बिना पूरी रचना को सुने ही तारेक फ़तेह ने उस पर कठोर टिप्पणी कर दी।

यह भी उल्लेखनीय है कि ‘आप की अदालत’ के उसी एपिसोड में तारेक फ़तेह ने बेबाकी से स्वयं को अदनान सामी से बेहतर गायक तक बताया था—जो अपने आप में एक चौंकाने वाला और दिलचस्प दावा है।

यह अक्सर देखने में आता है कि सार्वजनिक जीवन में कुछ लोग पाकिस्तान या वहाँ के कलाकारों पर तीखी टिप्पणियाँ करके सुर्खियाँ बटोरने का प्रयास करते हैं। लेकिन अधूरी जानकारी के आधार पर दिया गया कोई भी बयान न तो निष्पक्ष होता है और न ही वह कलाकार के साथ न्याय कर पाता है।

नुसरत साहब ने लगभग हर धर्म से जुड़े धार्मिक गीत गाए हैं और यहाँ तक कि हज़रत बुल्ले शाह, अमीर खुसरो और अन्य महान सूफ़ी संतों के कलाम गाकर प्रेम, एकता और आध्यात्मिकता का संदेश पूरी दुनिया तक पहुँचाया है।

सूफ़ी और उर्दू शायरी में—

मुसलमान का अर्थ होता है—सच्चा प्रेमी

काफ़िर का अर्थ होता है—महबूब की खूबसूरती

“काफ़िर हुस्न”, “काफ़िर निगाहें” और “काफ़िर अदाएँ”—यह धार्मिक नहीं, प्रेम की तीव्रता का प्रतीक है। पूरी क़व्वाली में प्रेमी महबूब से वादा निभाने की बात करता है, जुदाई के दर्द में तड़पता है, और अंत में कहता है—“जब वो देखेंगे मय्यत तुम्हारी, ऐ फ़ना, उनको अफ़सोस होगा…”

यह धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम के प्रतीक हैं।

सूफ़ी परंपरा में इश्क़ दो प्रकार का होता है—

इश्क़-ए-मजाज़ी (मानव से प्रेम)

इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वर से प्रेम)

दोनों के लिए एक ही भाषा, एक ही प्रतीक प्रयुक्त होते हैं।

इसी संदर्भ में अमीर खुसरो की प्रसिद्ध रचना “छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके” को भी समझना चाहिए। “छाप तिलक” का अर्थ बाहरी पहचान से है—जैसे सामाजिक पहचान। सूफ़ी दर्शन के अनुसार, जब साधक भक्ति या प्रेम की उच्चतम अवस्था तक पहुँच जाता है, तो वह इन बाहरी प्रतीकों की परवाह नहीं करता। प्रेम की उस अवस्था में केवल समर्पण शेष रह जाता है। इसका अर्थ किसी धर्म या परंपरा को त्यागना नहीं, बल्कि बाहरी प्रतीकों की परवाह से ऊपर उठना है।

आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोग पूरी रचना को नहीं सुनते। केवल दस या पंद्रह सेकंड का क्लिप देखकर निष्कर्ष निकाल लेते हैं।

लेकिन सच्चाई यह है—

नुसरत साहब का संगीत कभी विभाजन का नहीं, बल्कि एकता का माध्यम था।

उन्होंने कभी किसी के खिलाफ़ एक शब्द नहीं कहा।

उनकी आवाज़ ने पूरी दुनिया को जोड़ा।

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान केवल एक गायक नहीं थे—

वे रूह की आवाज़ थे।

और रूह की आवाज़ कभी नहीं मरती।

वह आज भी गूँज रही है।

वह अमर है।

और सदियों तक गूँजती रहेगी।

आस्था के नाम पर समझौते: धर्म नहीं, अवसर का खेल?

आस्था के नाम पर समझौते: धर्म नहीं, अवसर का खेल?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

कुछ लोग अपने-अपने दीन-धर्म में रहकर, अपनी धार्मिक आस्था से जुड़ी प्रार्थनाओं और धर्म-कर्म के कामों में शामिल दिखाई देते हैं।
उनका पहनावा और चाल-चलन देखकर लोग अक्सर यही मान लेते हैं कि यह व्यक्ति तो बहुत धार्मिक किस्म का इंसान है।

लेकिन ज़रा रुकिए।
सोचिए।

क्या कहीं ऐसा तो नहीं कि यह धार्मिकता सिर्फ़ तभी तक रहती हो, जब तक वह व्यक्ति किसी परेशानी में है?
या फिर यह धार्मिकता इसलिए दिखती हो क्योंकि उसे कभी बुराई करने का मौका ही नहीं मिला?
या फिर यह सब उसकी आर्थिक स्थिति का ही असर हो?

आज मैं इस विषय पर इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि हाल ही में स्क्रॉल करते समय मुझे एक सेलेब्रिटी का एक वीडियो दिखा, जिसमें उसके नृत्य-भाव से जुड़ी हरकतें उसकी पुरानी आस्था से पूरी तरह उलट थीं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि जब उसके परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी, तब बहुत कम उम्र में ही वह भक्ति-भजनों से जुड़े कार्यक्रमों में दिखाई देने लगी। उस समय यह सब सिर्फ़ आस्था नहीं था, बल्कि ज़रूरत भी थी। उन्हीं मंचों से उसकी पहचान बनी, वहीं से उसे सम्मान मिला, और उसी रास्ते से उसके परिवार का गुज़ारा चलता रहा। उसे देखकर लोग यह मान बैठे कि वह पूरी तरह धर्म और श्रद्धा में रची-बसी लड़की है।

समय बदला।
हालात बदले।
मंच बदले।

और उसी के साथ बदल गया वह रूप, जिसे कभी लोग आस्था का प्रतीक मानते थे। अब उसके हाव-भाव, उसकी प्रस्तुतियाँ और उसका सार्वजनिक व्यक्तित्व उस पुरानी छवि से बिल्कुल उलट दिखाई देने लगे।

सवाल यह नहीं है कि वह आज क्या कर रही है—वह उसका निजी जीवन और उसका चुनाव है।
सवाल यह है कि जिस चीज़ को हमने कभी “श्रद्धा” समझ लिया था, वह वास्तव में कितनी गहरी थी, और कितनी हालात के साथ ढलने वाली।

यहीं पर भ्रम पैदा होता है।

हम अक्सर किसी इंसान के काम, पहनावे या मंच को देखकर उसके भीतर झाँके बिना ही फ़ैसला कर लेते हैं। हम मान लेते हैं कि जो धर्म से जुड़ा दिख रहा है, वह भीतर से भी वैसा ही होगा। जबकि सच्चाई यह है कि कई बार धर्म आस्था से नहीं, ज़रूरत से शुरू होता है — और ज़रूरत खत्म होते ही उसका रूप भी बदल जाता है।

ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि कोई व्यक्ति आज क्या कर रहा है, बल्कि यह होता है कि हमने उसे कल क्या मान लिया था। हमने उसकी ज़रूरतों को उसकी आस्था समझ लिया, उसके हालात को उसका चरित्र मान लिया, और उसके मंच को उसकी आत्मा से जोड़ दिया। यहीं पर हमारी समझ चूक जाती है।

समस्या उस लड़की में नहीं है, जिसने समय के साथ अपने रास्ते बदले।
समस्या उस नज़र में है, जो हर धार्मिक दिखने वाले चेहरे को बिना परखे “सच्चा” मान लेती है।

हम यह मान लेते हैं कि जो भक्ति में दिख रहा है, वह भीतर से भी वैसा ही होगा।
जबकि सच्चाई यह है कि कई बार भक्ति और धर्म रोज़गार का ज़रिया भी होते हैं — सम्मान का साधन भी, और पहचान का माध्यम भी।

इसीलिए जब हालात बदलते हैं, तो रूप बदलता है।
जब ज़रूरत बदलती है, तो रास्ता बदलता है।
और जब विकल्प मिलते हैं, तो असली स्वभाव सामने आता है।

कुछ लोगों के लिए धार्मिकता
तभी तक रहती है
जब तक उनके सामने
कोई बड़ा लालच नहीं आता।

और कुछ ऐसे भी होते हैं
जिनकी धार्मिकता बस इतनी-सी होती है कि
अगर उन्हें लगे कि आसपास के लोग
धर्म के हिसाब से नहीं चल रहे,
तो वे भी उसी पल
धर्म का रास्ता छोड़ देते हैं।

मतलब साफ़ है—
सवाल धर्म का नहीं,
सवाल चरित्र और नीयत का है।

क्योंकि मौका मिलने पर
इंसान वही बनता है
जो वह भीतर से होता है।

अब मैं आपको एक दिलचस्प किस्सा सुनाता हूँ।

मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता है।
एक समय था जब वे दुनियावी चीज़ों के बहुत शौकीन थे।
न कोई बॉलीवुड फ़िल्म उनसे छूटती थी,
न हॉलीवुड।

उनकी ज़िंदगी में
संगीत था,
फ़िल्में थीं,
धारावाहिक थे,
शेर-ओ-शायरियाँ थीं—
यानी जीवन रंगों से भरा हुआ था।

फिर वक्त बदला।
फ़िल्मों और धारावाहिकों में वह मज़ा नहीं रहा जो पहले था।
शायद इसी खालीपन से उन्होंने धर्म का रास्ता पकड़ लिया।
धीरे-धीरे वे इतने सख्त हो गए कि अपनी पुरानी पसंद की हर चीज़ छोड़ दी।

अब अगर कोई संगीत या फ़िल्म की बात करता, तो उसे टोक दिया जाता।
उनकी हर बातचीत प्रवचन बन गई।

यानी कुछ लोगों की धार्मिकता
आस्था से नहीं,
मनोरंजन के अभाव से शुरू होती है।

लेकिन वक्त ने फिर करवट ली।

एक फ़िल्म आई,
जिसका संगीत इतना शानदार था
कि उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया।

बस फिर क्या था—
दबा हुआ शौक
एक बार फिर
जाग उठा।

जो लोग कल तक धारावाहिकों के नाम से भी परहेज़ करने लगे थे,
वे फिर उसी रंगीन ज़िंदगी में लौट आए।

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि
जब वे धार्मिक चोला ओढ़ लेते हैं
और खुद को प्रार्थनाओं का पाबंद मानने लगते हैं,
तो वे दूसरों को भी उसी रास्ते पर चलने के लिए
टोकना और नसीहत देना शुरू कर देते हैं—
सिर्फ़ इसलिए कि लोग उन्हें धर्मी मानें।

पुरानी जीवनशैली
पीछे छूट जाती है,
छुपे हुए गुनाह पहले की तरह ही
रोज़मर्रा की आदत बने रहते हैं—
और वे दूसरों को ऐसा दिखाते हैं
कि अब उनका उनसे
कोई लेना-देना नहीं।

इनकी प्रार्थनाएँ
इसलिए नहीं होतीं कि वे बेहतर इंसान बनें,
बल्कि इसलिए होती हैं कि
ईश्वर उनसे खुश हो जाए।

प्रार्थना खत्म होते ही
इनका दिल जैसे कह उठता है—
“अब जो करना है, करो!”

असल में,
यही लोग बार-बार वही काम कर बैठते हैं
जिसे वे खुद ग़लत मानते हैं।
इसी वजह से उनका ज़मीर
बार-बार प्रार्थनाओं में शामिल होने को बेचैन रहता है।

और जो लोग
खुद को ग़लत कामों से बचाकर रखते हैं,
उन्हें ये लोग अपने से छोटा समझते हैं—
सिर्फ़ इसलिए कि वे
प्रार्थनाओं में शामिल नहीं रहते।

ऐसे ही लोग धीरे-धीरे किसी न किसी धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हैं।
गलियों में, मोहल्लों में, सभाओं में — उनका उद्देश्य प्रार्थना से ज़्यादा प्रचार होता है।
वे उन लोगों को भी खींच लाना चाहते हैं, जो उनकी तरह नहीं चलते।

सवाल आस्था का नहीं होता,
सवाल संख्या का होता है।

जितने ज़्यादा लोग साथ दिखें,
उतनी ही मज़बूत धार्मिक पहचान बनती है।

सीधे-साधे लोगों से कहा जाता है—
देखो, हम वही कर रहे हैं जो पहले के महान लोग करते आए हैं।

पर कोई यह नहीं पूछता कि वे लोग कैसे थे, और हम कैसे हैं।
परंपरा का नाम लिया जाता है,
पर चरित्र की बात टाल दी जाती है।

इसी तर्क के सहारे
और लोगों को जोड़ा जाता है।
लोग जुड़ते हैं—
इसमें कोई बुराई नहीं।

लेकिन असली खेल तब सामने आता है
जब वही बॉलीवुड,
जिसे कल तक ‘माया’, ‘भटकाव’ और ‘फितना’ कहा जा रहा था,
फिर से अच्छा कंटेंट
या कहिए मधुर संगीत देने लगता है।

तब क्या होता है?

वही लोग,
जो कल तक समूहों में घूम-घूमकर
दूसरों को नसीहतें देते थे,
आज फिर उसी संगीत में
अपना दिल लुटा बैठते हैं।

ध्यान रखिए—
मैं यहाँ संगीत सुनने वालों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कह रहा।
संगीत तो आत्मा की भाषा है।

मैं जिस बात की ओर इशारा कर रहा हूँ, वह यह है कि
जिन लोगों को हम धार्मिक समझ लेते हैं,
उनकी धार्मिकता कई बार बहुत सस्ती भी हो सकती है,
इसका अंदाज़ा हमें देर से होता है।

इनकी एक और पहचान यह भी होती है कि
ये अक्सर
ईश्वर द्वारा गुनाह माफ़ किए जाने की बातें
बहुत ज़ोर-शोर से करते हैं।

इससे साफ़ पता चलता है कि उनकी सोच
कुछ ऐसी बन जाती है—

पहले ग़लत करो,
फिर प्रार्थना में जाकर माफ़ी माँगो।
फिर ग़लत करो,
फिर माफ़ी माँगो।
और यह सिलसिला
चलता ही रहे।

और हर बार
मन खुद को समझा लेता है
कि अब सब ठीक हो गया।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है
कि माफ़ी माँगी या नहीं।
असली सवाल यह है
कि गलती के बाद इंसान बदला या नहीं।

यहीं फर्क है
आत्म-संतोष
और आत्म-जवाबदेही में।

आत्म-संतोष कहता है—
मैंने प्रार्थना कर ली, अब मैं सही हूँ।

आत्म-जवाबदेही कहती है—
मैंने जो किया,
क्या वह दोबारा नहीं होना चाहिए?

जहाँ आत्म-जवाबदेही होती है,
वहाँ प्रार्थना ढाल नहीं बनती।

और जहाँ प्रार्थना ढाल बन जाती है,
वहाँ इंसान खुद से बचने लगता है।

हम रोज़ देखते हैं—

कोई सिर झुकाता है,
कोई हाथ उठाता है,
कोई तय समय पर
तय शब्द दोहराता है।

और हमें लगता है—
“यह तो ज़रूर बहुत धार्मिक होगा।”

यहीं से कहानी उलझती है।

क्योंकि धर्म
सिर्फ़ झुकने का नाम नहीं है,
सिर्फ़ बोलने का नाम नहीं है,
और सिर्फ़ दिखने का नाम भी नहीं है।

धर्म तो वहाँ शुरू होता है
जहाँ इंसान
दूसरे इंसान के काम आता है।

अजीब बात है—

जो लोग धर्म की सबसे ज़्यादा बातें करते हैं,
अक्सर वही
सबसे कम सहनशील होते हैं।

और जो लोग
धर्म की बातें नहीं करते,
न कोई चिह्न दिखाते हैं,
न कोई दावा करते हैं—
वही अक्सर
सबसे ज़्यादा धर्म निभा रहे होते हैं।

कुछ लोग धर्म को
अपने भीतर रखते हैं।
उनका धर्म
उनके व्यवहार में दिखता है।

कुछ लोग धर्म को
कपड़ों में,
आवाज़ में,
और पहचान में रखते हैं।

कुछ लोग धर्म को
समय पर निभाते हैं,
और उसके बाद
सब कुछ भूल जाते हैं।

कुछ लोग धर्म को
दूसरों पर थोपते हैं
और खुद को
ऊपर समझने लगते हैं।

और कुछ लोग
न धर्म समझते हैं,
न इंसान।

यही सच्चाई है।

अगर धर्म सच में भीतर होता है,
तो वह इंसान को
नरम बनाता है,
संवेदनशील बनाता है,
और ज़िम्मेदार बनाता है।

और अगर धर्म
सिर्फ़ बाहर होता है,
तो वह अक्सर
अहंकार बन जाता है।

सबसे बड़ा धोखा यही है
कि जो सबसे ज़्यादा धार्मिक दिखता है,
वही सबसे ज़्यादा सही होगा।

नहीं।

धर्म कोई प्रतियोगिता नहीं,
धर्म कोई प्रदर्शन नहीं,
धर्म कोई पहचान-पत्र नहीं।

धर्म तो
चुपचाप किया जाने वाला काम है।

वह वहाँ होता है
जहाँ कोई देख नहीं रहा होता,
जहाँ कोई तारीफ़ नहीं कर रहा होता।

और शायद
इसी वजह से
सबसे सच्चा धर्म
अक्सर दिखाई ही नहीं देता।

क्योंकि वह
शोर नहीं करता,
वह बस
इंसान बनाता है।

यही धर्म है।
बाकी सब—व्याख्या है।