जो नाना ने देखा, हमने बाद में समझा
Storytellingआज मैं अपने नाना की ज़िंदगी की कुछ झलकियाँ लिख रहा हूँ। इनमें डर भी है, खोने का दर्द भी, पाने की उम्मीद भी, और कुछ ऐसी घटनाएँ भी हैं जिन पर आज बहुत से लोग शायद यक़ीन न करें। यहाँ मैं वही लिख रहा हूँ, जो नाना की ज़ुबानी मैंने कई बार सुना।
यह वाक़या करीब 1947 के आसपास का है, लेकिन इसकी शुरुआत उससे भी पहले की घटनाओं से होती है। नाना के पिता एक भारतीय सैनिक थे। सेना में अपना कर्तव्य निभाने के बाद उनका मन पूरी तरह इबादत की ओर लग गया था। वे बेहद समझदार और पढ़े-लिखे बुज़ुर्ग इंसान थे, और अपना ज़्यादातर समय इबादत में ही बिताया करते थे।
उनका इंतकाल भी रहस्यमय परिस्थितियों में हुआ। एक दिन वे घर की छत पर इबादत कर रहे थे। तभी अचानक घरवालों ने देखा कि वे सीढ़ियों से नीचे गिर पड़े। उसी हादसे में उनकी रूह परवाज़ कर गई। हैरानी की बात यह थी कि उनके शरीर पर कोई गंभीर चोट दिखाई नहीं दे रही थी, जबकि पूरी सीढ़ियाँ खून से लथपथ थीं।
उन्होंने यह बात बहुत पहले ही कह दी थी कि उन्हें ग्वालियर में ज़िन्नातों की मस्जिद के पास स्थित कब्रिस्तान में ही दफ़न किया जाए। उनके इंतकाल के बाद उनकी यही इच्छा पूरी की गई।
जब नाना के वालिद का साया उनके सिर से उठा, तब नाना की उम्र मुश्किल से 14–15 साल रही होगी। कुछ दिनों बाद, जब नाना अपने वालिद की कब्र पर ग़मगीन होकर फ़ातिहा पढ़ रहे थे, तभी अचानक कई बकरियाँ आकर उनके आसपास खड़ी हो गईं। उसी समय एक चरवाहे के भेष में कोई उनके पास आया और बोला, “इस ख़ाक में क्या रखा है?”
नाना ने शांत, मगर शायराना अंदाज़ में जवाब दिया, “यह ख़ाक मेरे लिए बहुत क़ीमती है।”
वह कुछ क्षण उन्हें देखते रहे, फिर बोले, “तू अपने बाप का बहुत अच्छा बेटा है। यह दुआ पढ़।”
फिर उन्होंने वह दुआ पढ़कर सुनाई और कहा, “इसे पढ़ने से तू मालामाल हो जाएगा। लेकिन एक शर्त है—किसी से नहीं कहना कि तेरी मुलाकात मुझसे हुई, और यह दुआ भी किसी को मत बताना।”
नाना ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “अगर यह दुआ इतनी असरदार है, तो तुम खुद पढ़कर अमीर क्यों नहीं बन जाते?”
उन्होंने बस इतना कहा, “तू अभी बहुत छोटा है…”
इस बातचीत के बाद नाना एक किनारे जाकर नमाज़ पढ़ने लगे। जैसे ही उन्होंने सलाम फेरा, वह जो चरवाहे के भेष में थे, वहाँ से गायब थे। यहाँ तक कि दूर-दूर तक कोई बकरी भी दिखाई नहीं दी।
नाना का स्वभाव ऐसा था कि वे केवल अपने बारे में नहीं सोचते थे। उनके मन में आया कि जब मेरे अपने लोगों को भी पैसों की ज़रूरत है, तो यह दुआ उनसे क्यों छिपाऊँ?
जब वे दाल बाज़ार पहुँचे, तो वही चरवाहे के भेष वाला उन्हें फिर दिखाई दिया। उसे देखकर नाना थोड़ा सहम गए। उन्होंने नाना से दोबारा कहा, “ध्यान रखना, किसी को बताना मत।”
लेकिन नाना ने इस चेतावनी को उतनी गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें लगा—आख़िर दुआ ही तो है।
जब वे अपने करीबियों के पास पहुँचे, तो पूरी घटना सुनाने लगे। पर जैसे ही दुआ बताने का समय आया, अचानक उनका मुँह बंद हो गया। ज़ुबान ने साथ छोड़ दिया। गले में जैसे काँटे चुभने लगे। दर्द इतना बढ़ गया कि वे खड़े-खड़े ही नहीं, बैठे-बैठे भी गिर पड़ने लगे।
दो दिन तक वे उसी तकलीफ़ में रहे। फिर एक रात वही हस्ती दोबारा उनके पास आई। उन्होंने उँगली से इशारा करते हुए कहा, “देख… यह सब तेरा था। यह सब तेरा होने वाला था…”
नाना ने देखा कि जहाँ उन्होंने इशारा किया, वहाँ सोने और जवाहरात का ढेर लगा हुआ था। लेकिन पल भर में सब कुछ गायब हो गया।
नाना की वालिदा ही नहीं, बल्कि बाकी करीबी भी इन बातों से अनजान नहीं थे। इसलिए वे सब मिलकर नाना को एक बुज़ुर्ग के पास ले गए, जो उनकी परेशानी का हल निकाल सकते थे।
नाना के साथ गए लोगों ने पूरी घटना उन बुज़ुर्ग के सामने रखी। इसके बाद उन्होंने अपने तरीके से उनका रूहानी इलाज शुरू किया।
लेकिन वहाँ भी एक ऐसा वाक़या हुआ, जिसने नाना को अंदर तक हिला दिया।
एक रात, जब वह बुज़ुर्ग और नाना सो रहे थे, आधी रात को अचानक नाना की आँख खुल गई। उन्होंने देखा कि उन बुज़ुर्ग का सिर कहीं पड़ा है, हाथ कहीं, पैर कहीं और बाकी धड़ भी अलग पड़ा हुआ है। यह दृश्य देखकर नाना की जैसे साँस ही थम गई।
कुछ ही समय उनके पास रहने के बाद नाना पूरी तरह ठीक हो गए। तब उन बुज़ुर्ग ने कहा, “तुम्हारे वालिद ज़िन्नातों के सरदारों को नमाज़ पढ़ाते थे। जो तुम्हारे पास आया था, वह उन्हीं सरदारों में से एक था। तुमने उसकी बात नहीं मानी, इसलिए तुम पर यह मुसीबत आई।”
इसके बाद समय आगे बढ़ता रहा, लेकिन नाना की ज़िंदगी में एक ऐसा डरावना दौर आया, जिसे याद करते हुए भी उनका चेहरा गंभीर हो जाता था। उन्होंने अपनी आँखों से दंगे देखे, उनसे जुड़ा क़त्लेआम देखा, और मारकाट के कई ऐसे दृश्य देखे जिन्हें शब्दों में बयान करना आसान नहीं। वह समय ऐसा था जब इंसान की जान की कोई कीमत नहीं रह गई थी।
नाना की वालिदा का मन अब डबरा में बिल्कुल नहीं लगता था। उस घर की हर दीवार में नाना के वालिद की यादें बसी थीं, और वही यादें सबको भीतर तक बेचैन कर देती थीं।
ग्वालियर में नाना के वालिद के नाम से काफ़ी ज़मीन और कई मकान थे। वे कभी वहीं रहा करते थे। बाद में, रिश्तेदारों के डबरा में बस जाने के कारण पूरा परिवार भी डबरा आकर रहने लगा।
परिवार के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य के जाने के बाद सब कुछ बदल गया। वे डबरा से भोपाल आ गए। वजहें कई थीं—रोज़गार की तलाश, बीते दुख से दूर जाना और दंगे-फ़साद के अस्थिर माहौल से खुद को बचाना। नाना के सभी भाई अपनी वालिदा को साथ लेकर भोपाल में बस गए।
उस दौर की अफरा-तफरी में ग्वालियर की उनकी ज़मीन के कागज़ात उसी ज़मीन पर बने घर में ही रह गए और भोपाल नहीं लाए जा सके। उस समय इस बात को सबने हल्के में लिया, और फिर वे सब वहीं अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए।
धीरे-धीरे भोपाल में नाना और उनके भाइयों को लोग जानने-पहचानने लगे। उनका व्यवहार सादा और भरोसेमंद था, इसलिए आस-पास के लोग भी उनसे अपनापन महसूस करने लगे।
उसी दौर में मशहूर गायिका और अभिनेत्री नूरजहां को भोपाल स्थित अपनी हवेली की देखभाल के लिए एक भरोसेमंद और नेक परिवार की ज़रूरत थी। उनकी टीम के एक सदस्य ने नाना के परिवार को वहाँ रहने का प्रस्ताव दिया।
इस तरह नाना के सभी भाई और उनकी वालिदा उस हवेली में रहने लगे और उसकी देखरेख करने लगे।
नूरजहां जी ज़्यादातर मुंबई में व्यस्त रहती थीं। कभी-कभी आराम के लिए भोपाल आया करती थीं। नाना बताया करते थे कि वह बेहद नेकदिल इंसान थीं, और सच कहूँ तो आज जब मैं उनसे जुड़े पुराने इंटरव्यू देखता हूँ, तो कई बड़े कलाकार भी उनके बारे में यही सम्मान से भरी बातें करते दिखाई देते हैं।
एक बार मैंने लता मंगेशकर जी का एक पुराना इंटरव्यू देखा, जिसमें उनसे पूछा गया था, “सब आपके फैन हैं, आप किसकी फैन हैं?” इस पर लता जी ने नूरजहां और मेहदी हसन का नाम लिया था।
लता जी आगे बताती हैं कि जब उनकी पहली मुलाकात नूरजहां से हुई, तब उनकी उम्र करीब 14–15 साल थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने उनसे सिर्फ गायकी ही नहीं, बल्कि बहुत कुछ सीखा। लता जी के मुताबिक, उर्दू के शब्द किस अंदाज़ में बोले जाएँ, यह बात भी उन्होंने नूरजहां से ही सीखी थी।
एक इंटरव्यू में लता जी ने यह भी बताया कि जब नूरजहां जी नमाज़ के अंत में दुआ के लिए हाथ उठाती थीं, तो अक्सर रो पड़ती थीं।
बचपन में नाना हमें अक्सर बताया करते थे कि जब नूरजहां हवेली में आतीं, तो उनकी वालिदा से तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनवातीं और हम सबके साथ बैठकर ही खाना खातीं।
एक दिन नाना की वालिदा नूरजहां के लिए पानी लेकर आ रही थीं। तभी रसोई में रखा जग और गिलासों का सेट उनके हाथ से गिरकर टूट गया। वह सेट बहुत खूबसूरत और महँगा मालूम पड़ता था, इसलिए उन्हें इस बात का गहरा अफसोस हुआ।
जब नूरजहां ने देखा कि नाना की वालिदा इस बात से बेहद शर्मिंदा हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं बीबी, काँच का ही तो था… उसे तो एक दिन टूटना ही था।”
नूरजहां का स्वभाव ही ऐसा था कि वे छोटी-छोटी बातों को दिल पर नहीं लेती थीं। अक्सर जब वे नाना को मुस्कुराते देखतीं, तो उनकी वालिदा से हँसते हुए कहतीं, “बीबी, अपना बेटा तू मुझे गोद दे दे… मैं इसे मुंबई ले जाकर हीरो बनाऊँगी।”
लेकिन नाना की वालिदा हर बार मुस्कुराकर उनकी यह बात टाल देती थीं।
आज जब मैंने नूरजहां जी के बारे में पढ़ा, तो पता चला कि 1947 के विभाजन के बाद उन्होंने पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लिया था। जब दिलीप कुमार ने उनसे भारत में ही रहने का आग्रह किया, तो उन्होंने कहा था, “मैं जहाँ पैदा हुई हूँ, वहीं जाना चाहती हूँ।”
नाना बताया करते थे कि नानी की बहन भी अपने पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान चली गई थीं। शुरुआती दिनों में उनका परिवार हमसे मिलने आया करता था, मगर धीरे-धीरे वह सिलसिला भी खत्म हो गया।
1947 में भारत विभाजन के बाद, नूरजहां के पाकिस्तान जाने से पहले ही नाना का परिवार फिर से डबरा लौट आया था। वजह बस इतनी थी कि नाना की वालिदा का मन वहाँ बिल्कुल नहीं लगता था। बड़े शहर की भागदौड़ और उस हवेली का सन्नाटा उन्हें रास नहीं आता था।
उधर ग्वालियर में नाना के वालिद की जो ज़मीन थी और उस पर बने मकान थे, वे अब उनके हाथ से निकल चुके थे। उस दौर का माहौल भी अशांत था और वहाँ बहुत कुछ बदल चुका था। कागज़ात साथ न होने के कारण वे उन्हें दोबारा हासिल नहीं कर पाए, और आखिरकार उस ज़मीन को वापस पाने का ख्याल भी मन से निकाल दिया। आज वही जगह “ओल्याई डॉक्टर का वाड़ा” के नाम से जानी जाती है।
भोपाल जाने से पहले नाना का परिवार डबरा में ‘बिजलीघर’ नामक इलाके में रहता था। भोपाल से वापस डबरा आने के बाद नाना उषा कॉलोनी में रहने लगे थे।
यह सच है कि एक समय ऐसा आया जब नाना के हाथ से उनके वालिद की ज़मीन चली गई। लेकिन बाद में ऐसा भी लगा, जैसे किस्मत हिसाब बराबर करना चाहती हो।
नाना का एक सिख मित्र था, जो उनसे बेहद स्नेह रखता था। आज डबरा में जहाँ बस स्टैंड के पास पक्की दुकानें बनी हुई हैं, वहाँ उस समय नदी बहती थी और अक्सर पानी भरा रहता था। वही ज़मीन वह सिख मित्र नाना को बिना किसी कीमत के देना चाहता था। वह अक्सर नाना से कहा करता था, “भाई, तू मुझे बस एक नारियल और कुछ बताशे दे दे, और यह ज़मीन अपने नाम कर ले।”
लेकिन नाना अपनी खुद्दारी में उनसे कहा करते थे, “मैं इस ज़मीन का क्या करूँगा? मेरा एक ही तो बेटा है।”
आज उसी ज़मीन पर पक्की दुकानें बनी हुई हैं, और वह डबरा की सबसे कीमती जगहों में गिनी जाती है।
याद आता है वह पल, जब एक दिन मैं नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के गीत सुन रहा था। तभी अचानक नुसरत साहब और नूरजहां का गाया हुआ गीत “तेरे बिना रोगी होए प्यासे नैन” सुनने को मिला। उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि जिन शख्सियतों की दुनिया दीवानी है, वे कभी मेरे नाना के कितने क़रीब रही थीं।
बचपन में जब नाना कहा करते थे, “हम नूरजहां की शूटिंग देखा करते थे… वह मुझसे तरह-तरह की बातें किया करती थीं…”, तो मैं बस यही समझता था कि कोई पुरानी अभिनेत्री होंगी, जिनका ज़िक्र नाना किया करते हैं।
लेकिन आज जब नूरजहां के बारे में पढ़ता हूँ, तो समझ आता है कि उन्हें “मलिका-ए-तरन्नुम” क्यों कहा गया। लगभग चार दशकों तक उन्होंने अपनी आवाज़ और अभिनय से लोगों के दिलों पर राज किया। आज भी उनके बारे में चर्चा न हो, ऐसा होना मुश्किल है।
काफ़ी समय पहले जब मैं उनकी गाई हुई ग़ज़ल “हमारी साँसों में आज तक वो” सुन रहा था, तो दिल से उसे अपनी अब तक की सबसे पसंदीदा ग़ज़ल मान लिया था।
बाद में यह एहसास हुआ—अरे, यह तो वही नूरजहां हैं, जिनका ज़िक्र नाना अक्सर किया करते थे। सच है, बुज़ुर्ग जो कहते हैं, उसे हम कभी-कभी हल्के में ले लेते हैं। बचपन में उनकी बातें साधारण लग सकती हैं, लेकिन वे ऐसे दौर को देखकर आए होते हैं, जिसकी सीढ़ियाँ हम अभी चढ़ना शुरू ही करते हैं।
यह भी सच है कि भले ही आज तकनीक बहुत आगे बढ़ गई हो, लेकिन उस दौर के संगीत की जो मिठास थी, वह अब कम ही महसूस होती है। आज कई बार सब कुछ बनावटी-सा लगता है। शायद यही वजह है कि लोग फिर से पुराने दौर की हर चीज़ को याद करने लगे हैं और उसे फिर से महसूस करना चाहते हैं।







