उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब: मेरी जिंदगी का एक हिस्सा
Nostalgiaयाद आता है वह बचपन, जब मैं डेक के पास रखी हर कैसेट के कवर को बड़े गौर से देखा करता था। हर तस्वीर और हर नाम मेरे लिए एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल देता था। उन्हीं कैसेट्स में एक कैसेट ऐसी भी थी, जिसके कवर के बाएँ किनारे पर उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब और दाएँ किनारे पर जावेद अख्तर साहब का चेहरा दिखाई देता था। नीचे बड़े अक्षरों में “संगम” लिखा होता था। वही उस एल्बम का नाम था।
बचपन में मैं हर तरह का संगीत सुनता था, लेकिन जैसे-जैसे बड़ा होता गया और काफ़ी अंतराल के बाद जब उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के गानों को दोबारा याद किया, तब एहसास हुआ कि वह आवाज़ कोई मामूली आवाज़ नहीं थी।
उस दौर में इंटरनेट तो दूर, मोबाइल भी हर किसी के पास नहीं होता था। इसी बीच मुहर्रम का महीना आया। इस्लामी कैलेंडर की 9 तारीख़ को निकले जुलूस में, जब मैंने DJ पर एक क़व्वाली सुनी—
“इस शाने करम का क्या कहना”—
तो मैं सुनकर स्तब्ध रह गया। इतनी कठिन जुगलबंदी, इतनी गहराई और रूह को झकझोर देने वाली क़व्वाली मैंने इससे पहले कभी नहीं सुनी थी। उसी पल समझ आ गया कि इस क़व्वाली को इस शान और असर के साथ कोई और गा ही नहीं सकता।
यहीं से नुसरत साहब को और सुनने की चाह पैदा हुई।
मैं बाज़ार गया, उनका नाम बताया और कैसेट माँगी—लेकिन ज़्यादातर लोग समझ ही नहीं पाए। वजह भी साफ़ थी। मैं डबरा में रहता हूँ, और यहाँ बहुत से लोग संगीत तो सुनते हैं, लेकिन कौन-सा गाना किसने गाया या लिखा, इससे उन्हें ज़्यादा मतलब नहीं होता। यह बात स्वाभाविक भी है—जब ऐसे ही लोग फ़िल्म में “दूल्हे का सेहरा” कादर ख़ान को गाते हुए देखते हैं, तो उनके लिए यह समझना मुश्किल तो होगा ही कि असली गायक कौन है। यानी उनके लिए कुल मिलाकर वही बात है—आम खाओ, गुठलियाँ मत गिनो।
नुसरत साहब के गानों का अलग से कोई कलेक्शन मुझे वहाँ नहीं मिला, तो मजबूरी में मैं फ़िल्म कच्चे धागे की कैसेट ले आया, जिसमें उन्होंने संगीत दिया था और क़व्वाली सहित उनके कई शानदार गीत थे।
वह मेरा टीनेज का समय था। फिर ऐसा हुआ कि टीवी पर हर शाम एक तय समय पर फ़िल्मी गानों के बीच उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब का एक वीडियो सॉन्ग आने लगा। मैं हर शाम उसका इंतज़ार करने लगा।
वह गीत था—“कोई जाने कोई ना जाने”।
दिन में सिर्फ़ एक बार उनका गाना सुन पाना मन को संतोष नहीं देता था। उसी दौरान ज़ी टीवी पर आने वाला संगीत कार्यक्रम सा रे गा मा शुरू हुआ, जो उन दिनों एक अलग ही रंग लेकर आया था। उसमें पाकिस्तान से भी कई कंटेस्टेंट शामिल हुए थे। उन्हीं में से एक थे मुसर्रत, जो अक्सर उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के ही गाने गाया करते थे। वह शो और मुसर्रत—दोनों ही मेरे पसंदीदा बन गए।
एक बार मेरे मोहल्ले का एक दोस्त आया, जो अपनी बहन के नवजात बेटे के लिए नाम ढूँढ रहा था। नाम ‘म’ से शुरू होना चाहिए था, और बच्चे का जन्म भी किसी ख़ास दिन की रात में हुआ था। मैंने सुझाव दिया—मुसर्रत।
इसमें ‘म’ भी था और ‘रत’ भी, जो ‘रात’ की ही ध्वनि और भाव को अपने भीतर समेटे हुए था।
उसने अपने पिताजी को यह नाम बताया, और उन्हें यह नाम बेहद पसंद आया। आज भी वह परिवार याद करता है कि मुसर्रत का नाम मैंने रखा था।
एक समय ऐसा भी था जब इंटरनेट के अभाव में मैं नुसरत साहब को सुनने के लिए बेचैन रहा करता था। आख़िरकार जब मैंने एक ऑल-इन-वन म्यूज़िक प्लेयर खरीदा, तो उसमें सबसे ज़्यादा गाने उन्हीं के थे। सच कहूँ तो उसी प्लेयर ने मुझे नुसरत साहब को भरपूर सुनने का मौका दिया।
जब मैं मोहल्ले के दोस्तों को अपने हाई-क्वालिटी ईयरफ़ोन से “आफ़रीन आफ़रीन” सुनाता, तो उसके स्टिरियो साउंड और सुरों की मिठास से वे भी कह उठते—
“उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब जैसा कोई नहीं।”
अब ज़रा उस नुसरत साहब की बात, जिन्होंने अपनी आवाज़ से पूरी दुनिया को बदल दिया
साल 1985। इंग्लैंड के मर्सी आइलैंड में WOMAD नाम का एक म्यूज़िक फ़ेस्टिवल चल रहा था, जिसे मशहूर रॉकस्टार पीटर गैब्रियल आयोजित कर रहे थे। हाथों में बीयर लिए अंग्रेज़ रॉक और पॉप संगीत पर झूम रहे थे। तभी स्टेज पर अचानक बदलाव हुआ। एक सफ़ेद क़ालीन बिछाई गई, और कुर्ता-पायजामा पहने साज़िंदे आकर चुपचाप बैठ गए। ऑडियंस को लगा, शायद कोई साधारण-सा लोक संगीत होने वाला है।
फिर हारमोनियम सधा। सुर उठे।
आठ-दस मिनट बीत गए।
और अचानक दो शब्द गूँजे—
“अल्लाह हू…”
बस, वहीं से जादू शुरू हो गया।
किसी को शब्दों का अर्थ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन आवाज़ का असर ऐसा था कि लोग खड़े होकर झूमने लगे। कुछ की आँखों से आँसू बहने लगे, कुछ आँखें बंद कर उस संगीत में खो गए। जो परफॉर्मेंस केवल एक घंटे की होनी थी, वह रात के तीन बजे तक चलती रही। वही रात उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान की वैश्विक पहचान की शुरुआत बन गई।
आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि उनका फैन बेस भारत, पाकिस्तान और यूके से भी ज़्यादा जापान में था। जापानी लोग उन्हें सम्मान से “सिंगिंग बुद्धा” कहा करते थे।
जापान के फुकुओका शहर में एक कॉन्सर्ट के दौरान, जब नुसरत साहब “दमादम मस्त कलंदर” गा रहे थे, तो कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक जापानी महिला रोती हुई उनके पास आई और बोली—
“मैं बहुत तनाव में थी। मैं आत्महत्या करने वाली थी। लेकिन आपकी आवाज़ ने मुझे जीने की वजह दे दी।”
यह सिर्फ़ एक गायक की आवाज़ नहीं थी—
यह रूह की आवाज़ थी, जो टूटे हुए दिलों को जोड़ देती थी।
इसी दिव्यता, इसी प्रभाव और इसी महानता के कारण उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब को दुनिया ने एक अमर ख़िताब दिया—
शहंशाह-ए-क़व्वाली।
अब दूसरा वाक़या, जो एक इंसान और एक महान कलाकार के बीच के फ़र्क़ को समझा देता है
फ़िल्म कच्चे धागे के दौरान एक ऐसा प्रसंग हुआ, जिसे गीतकार आनंद बख्शी जी ताउम्र नहीं भूल पाए।
फ़िल्म में लीड रोल में थे अजय देवगन। गीत लिखने थे आनंद बख्शी जी को, और संगीत की ज़िम्मेदारी उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के पास थी।
नुसरत साहब पाकिस्तान से मुंबई आए। तय हुआ कि एक दिन बैठकर आनंद बख्शी जी के साथ सेशन होगा और मिलकर गीत तैयार किया जाएगा।
लेकिन यह सेशन बार-बार टलता रहा।
दरअसल, आनंद बख्शी जी के मन में यह बात घर कर गई थी—
“नुसरत फ़तेह अली ख़ान पाकिस्तान से मुंबई आ गए हैं, लेकिन मुझसे मिलने नहीं आ रहे। अगर उन्हें गाने की ज़रूरत है, तो उन्हें ख़ुद मेरे पास आना चाहिए।”
इसी गलतफ़हमी और अहंकार की वजह से मुलाकात टलती चली गई।
एक दिन नुसरत साहब ने अपने साथ रहने वालों से कहा—
“मुझे बांद्रा ले चलो, जहाँ आनंद बख्शी जी रहते हैं।”
आनंद बख्शी जी बांद्रा के एक घर की पहली मंज़िल पर रहते थे। वहाँ लिफ़्ट नहीं थी, सीढ़ियाँ चढ़कर ही ऊपर जाना पड़ता था।
जब उन्हें पता चला कि नुसरत साहब आ रहे हैं, तो वे खिड़की के पास जाकर देखने लगे। उन्होंने देखा कि एक कार घर के सामने आकर रुकी। तीन-चार लोग मिलकर नुसरत साहब को गाड़ी से उतार रहे थे और सहारा देकर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ा रहे थे।
यह दृश्य देखकर आनंद बख्शी जी स्तब्ध रह गए।
उन्हें उसी क्षण एहसास हुआ कि नुसरत साहब उन्हें अपने पास इसलिए बुला रहे थे, क्योंकि उनके लिए चलना-फिरना आसान नहीं था। फिर भी, उन्होंने अपने स्वाभिमान या अहंकार को बीच में नहीं आने दिया और स्वयं उनसे मिलने उनके घर तक चले आए।
यह सोचते ही आनंद बख्शी जी की आँखें भर आईं। वे फूट-फूट कर रो पड़े। उन्होंने आगे बढ़कर नुसरत साहब के पैर पकड़ लिए और अपने अहंकार पर गहरा पश्चाताप किया।
उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया।
दोनों महान कलाकारों ने साथ मिलकर ऐसे दिलकश और यादगार गीत रचे, जो आज भी भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।
साल 1995 में हॉलीवुड फ़िल्म Dead Man Walking बनी, जिसके निर्देशक सीन पेन थे। इस फ़िल्म के संगीत के लिए मशहूर गायक एडी वेडर को बुलाया गया। लेकिन एडी वेडर एक ऐसी आवाज़ की तलाश में थे, जो केवल गले से नहीं, बल्कि रूह से निकलती हो।
उन्होंने कहा—
“मुझे ऐसी आवाज़ चाहिए जो रूह से आए, गले से नहीं।”
इसके बाद उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब को आमंत्रित किया गया। जब रिकॉर्डिंग पूरी हुई, तो एडी वेडर उनकी आवाज़ से इतने प्रभावित हुए कि वे भावुक हो उठे और सम्मान में झुककर नुसरत साहब के पैर छू लिए। यह केवल एक कलाकार का दूसरे कलाकार के प्रति सम्मान नहीं था, बल्कि उस रूहानी ताक़त के प्रति नतमस्तक होना था, जो उनकी आवाज़ में बसती थी।
आज जब अपने ही देश के कुछ सिंगर्स उनके ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हैं, तो अफ़सोस होता है। उन्हें यह समझ नहीं आता कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती, कोई सरहद नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता।
वो अंग्रेज़, जिन्हें एक भी शब्द समझ नहीं आया था, फिर भी रो पड़े थे।
क्योंकि जब संगीत दिल से निकलता है,
तो वह सीधे रूह पर क़ब्ज़ा कर लेता है।
और उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान
सिर्फ़ गायक नहीं थे—







