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जो नाना ने देखा, हमने बाद में समझा

आज मैं अपने नाना की ज़िंदगी की कुछ झलकियाँ लिख रहा हूँ। इनमें डर भी है, खोने का दर्द भी, पाने की उम्मीद भी, और कुछ ऐसी घटनाएँ भी हैं जिन पर ...

जो नाना ने देखा, हमने बाद में समझा

जो नाना ने देखा, हमने बाद में समझा

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आज मैं अपने नाना की ज़िंदगी की कुछ झलकियाँ लिख रहा हूँ। इनमें डर भी है, खोने का दर्द भी, पाने की उम्मीद भी, और कुछ ऐसी घटनाएँ भी हैं जिन पर आज बहुत से लोग शायद यक़ीन न करें। यहाँ मैं वही लिख रहा हूँ, जो नाना की ज़ुबानी मैंने कई बार सुना।

यह वाक़या करीब 1947 के आसपास का है, लेकिन इसकी शुरुआत उससे भी पहले की घटनाओं से होती है। नाना के पिता एक भारतीय सैनिक थे। सेना में अपना कर्तव्य निभाने के बाद उनका मन पूरी तरह इबादत की ओर लग गया था। वे बेहद समझदार और पढ़े-लिखे बुज़ुर्ग इंसान थे, और अपना ज़्यादातर समय इबादत में ही बिताया करते थे।

उनका इंतकाल भी रहस्यमय परिस्थितियों में हुआ। एक दिन वे घर की छत पर इबादत कर रहे थे। तभी अचानक घरवालों ने देखा कि वे सीढ़ियों से नीचे गिर पड़े। उसी हादसे में उनकी रूह परवाज़ कर गई। हैरानी की बात यह थी कि उनके शरीर पर कोई गंभीर चोट दिखाई नहीं दे रही थी, जबकि पूरी सीढ़ियाँ खून से लथपथ थीं।

उन्होंने यह बात बहुत पहले ही कह दी थी कि उन्हें ग्वालियर में ज़िन्नातों की मस्जिद के पास स्थित कब्रिस्तान में ही दफ़न किया जाए। उनके इंतकाल के बाद उनकी यही इच्छा पूरी की गई।

जब नाना के वालिद का साया उनके सिर से उठा, तब नाना की उम्र मुश्किल से 14–15 साल रही होगी। कुछ दिनों बाद, जब नाना अपने वालिद की कब्र पर ग़मगीन होकर फ़ातिहा पढ़ रहे थे, तभी अचानक कई बकरियाँ आकर उनके आसपास खड़ी हो गईं। उसी समय एक चरवाहे के भेष में कोई उनके पास आया और बोला, “इस ख़ाक में क्या रखा है?”

नाना ने शांत, मगर शायराना अंदाज़ में जवाब दिया, “यह ख़ाक मेरे लिए बहुत क़ीमती है।”

वह कुछ क्षण उन्हें देखते रहे, फिर बोले, “तू अपने बाप का बहुत अच्छा बेटा है। यह दुआ पढ़।”

फिर उन्होंने वह दुआ पढ़कर सुनाई और कहा, “इसे पढ़ने से तू मालामाल हो जाएगा। लेकिन एक शर्त है—किसी से नहीं कहना कि तेरी मुलाकात मुझसे हुई, और यह दुआ भी किसी को मत बताना।”

नाना ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “अगर यह दुआ इतनी असरदार है, तो तुम खुद पढ़कर अमीर क्यों नहीं बन जाते?”

उन्होंने बस इतना कहा, “तू अभी बहुत छोटा है…”

इस बातचीत के बाद नाना एक किनारे जाकर नमाज़ पढ़ने लगे। जैसे ही उन्होंने सलाम फेरा, वह जो चरवाहे के भेष में थे, वहाँ से गायब थे। यहाँ तक कि दूर-दूर तक कोई बकरी भी दिखाई नहीं दी।

नाना का स्वभाव ऐसा था कि वे केवल अपने बारे में नहीं सोचते थे। उनके मन में आया कि जब मेरे अपने लोगों को भी पैसों की ज़रूरत है, तो यह दुआ उनसे क्यों छिपाऊँ?

जब वे दाल बाज़ार पहुँचे, तो वही चरवाहे के भेष वाला उन्हें फिर दिखाई दिया। उसे देखकर नाना थोड़ा सहम गए। उन्होंने नाना से दोबारा कहा, “ध्यान रखना, किसी को बताना मत।”

लेकिन नाना ने इस चेतावनी को उतनी गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें लगा—आख़िर दुआ ही तो है।

जब वे अपने करीबियों के पास पहुँचे, तो पूरी घटना सुनाने लगे। पर जैसे ही दुआ बताने का समय आया, अचानक उनका मुँह बंद हो गया। ज़ुबान ने साथ छोड़ दिया। गले में जैसे काँटे चुभने लगे। दर्द इतना बढ़ गया कि वे खड़े-खड़े ही नहीं, बैठे-बैठे भी गिर पड़ने लगे।

दो दिन तक वे उसी तकलीफ़ में रहे। फिर एक रात वही हस्ती दोबारा उनके पास आई। उन्होंने उँगली से इशारा करते हुए कहा, “देख… यह सब तेरा था। यह सब तेरा होने वाला था…”

नाना ने देखा कि जहाँ उन्होंने इशारा किया, वहाँ सोने और जवाहरात का ढेर लगा हुआ था। लेकिन पल भर में सब कुछ गायब हो गया।

नाना की वालिदा ही नहीं, बल्कि बाकी करीबी भी इन बातों से अनजान नहीं थे। इसलिए वे सब मिलकर नाना को एक बुज़ुर्ग के पास ले गए, जो उनकी परेशानी का हल निकाल सकते थे।

नाना के साथ गए लोगों ने पूरी घटना उन बुज़ुर्ग के सामने रखी। इसके बाद उन्होंने अपने तरीके से उनका रूहानी इलाज शुरू किया।

लेकिन वहाँ भी एक ऐसा वाक़या हुआ, जिसने नाना को अंदर तक हिला दिया।

एक रात, जब वह बुज़ुर्ग और नाना सो रहे थे, आधी रात को अचानक नाना की आँख खुल गई। उन्होंने देखा कि उन बुज़ुर्ग का सिर कहीं पड़ा है, हाथ कहीं, पैर कहीं और बाकी धड़ भी अलग पड़ा हुआ है। यह दृश्य देखकर नाना की जैसे साँस ही थम गई।

कुछ ही समय उनके पास रहने के बाद नाना पूरी तरह ठीक हो गए। तब उन बुज़ुर्ग ने कहा, “तुम्हारे वालिद ज़िन्नातों के सरदारों को नमाज़ पढ़ाते थे। जो तुम्हारे पास आया था, वह उन्हीं सरदारों में से एक था। तुमने उसकी बात नहीं मानी, इसलिए तुम पर यह मुसीबत आई।”

इसके बाद समय आगे बढ़ता रहा, लेकिन नाना की ज़िंदगी में एक ऐसा डरावना दौर आया, जिसे याद करते हुए भी उनका चेहरा गंभीर हो जाता था। उन्होंने अपनी आँखों से दंगे देखे, उनसे जुड़ा क़त्लेआम देखा, और मारकाट के कई ऐसे दृश्य देखे जिन्हें शब्दों में बयान करना आसान नहीं। वह समय ऐसा था जब इंसान की जान की कोई कीमत नहीं रह गई थी।

नाना की वालिदा का मन अब डबरा में बिल्कुल नहीं लगता था। उस घर की हर दीवार में नाना के वालिद की यादें बसी थीं, और वही यादें सबको भीतर तक बेचैन कर देती थीं।

ग्वालियर में नाना के वालिद के नाम से काफ़ी ज़मीन और कई मकान थे। वे कभी वहीं रहा करते थे। बाद में, रिश्तेदारों के डबरा में बस जाने के कारण पूरा परिवार भी डबरा आकर रहने लगा।

परिवार के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य के जाने के बाद सब कुछ बदल गया। वे डबरा से भोपाल आ गए। वजहें कई थीं—रोज़गार की तलाश, बीते दुख से दूर जाना और दंगे-फ़साद के अस्थिर माहौल से खुद को बचाना। नाना के सभी भाई अपनी वालिदा को साथ लेकर भोपाल में बस गए।

उस दौर की अफरा-तफरी में ग्वालियर की उनकी ज़मीन के कागज़ात उसी ज़मीन पर बने घर में ही रह गए और भोपाल नहीं लाए जा सके। उस समय इस बात को सबने हल्के में लिया, और फिर वे सब वहीं अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए।

धीरे-धीरे भोपाल में नाना और उनके भाइयों को लोग जानने-पहचानने लगे। उनका व्यवहार सादा और भरोसेमंद था, इसलिए आस-पास के लोग भी उनसे अपनापन महसूस करने लगे।

उसी दौर में मशहूर गायिका और अभिनेत्री नूरजहां को भोपाल स्थित अपनी हवेली की देखभाल के लिए एक भरोसेमंद और नेक परिवार की ज़रूरत थी। उनकी टीम के एक सदस्य ने नाना के परिवार को वहाँ रहने का प्रस्ताव दिया।

इस तरह नाना के सभी भाई और उनकी वालिदा उस हवेली में रहने लगे और उसकी देखरेख करने लगे।

नूरजहां जी ज़्यादातर मुंबई में व्यस्त रहती थीं। कभी-कभी आराम के लिए भोपाल आया करती थीं। नाना बताया करते थे कि वह बेहद नेकदिल इंसान थीं, और सच कहूँ तो आज जब मैं उनसे जुड़े पुराने इंटरव्यू देखता हूँ, तो कई बड़े कलाकार भी उनके बारे में यही सम्मान से भरी बातें करते दिखाई देते हैं।

एक बार मैंने लता मंगेशकर जी का एक पुराना इंटरव्यू देखा, जिसमें उनसे पूछा गया था, “सब आपके फैन हैं, आप किसकी फैन हैं?” इस पर लता जी ने नूरजहां और मेहदी हसन का नाम लिया था।

लता जी आगे बताती हैं कि जब उनकी पहली मुलाकात नूरजहां से हुई, तब उनकी उम्र करीब 14–15 साल थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने उनसे सिर्फ गायकी ही नहीं, बल्कि बहुत कुछ सीखा। लता जी के मुताबिक, उर्दू के शब्द किस अंदाज़ में बोले जाएँ, यह बात भी उन्होंने नूरजहां से ही सीखी थी।

एक इंटरव्यू में लता जी ने यह भी बताया कि जब नूरजहां जी नमाज़ के अंत में दुआ के लिए हाथ उठाती थीं, तो अक्सर रो पड़ती थीं।

बचपन में नाना हमें अक्सर बताया करते थे कि जब नूरजहां हवेली में आतीं, तो उनकी वालिदा से तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनवातीं और हम सबके साथ बैठकर ही खाना खातीं।

एक दिन नाना की वालिदा नूरजहां के लिए पानी लेकर आ रही थीं। तभी रसोई में रखा जग और गिलासों का सेट उनके हाथ से गिरकर टूट गया। वह सेट बहुत खूबसूरत और महँगा मालूम पड़ता था, इसलिए उन्हें इस बात का गहरा अफसोस हुआ।

जब नूरजहां ने देखा कि नाना की वालिदा इस बात से बेहद शर्मिंदा हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं बीबी, काँच का ही तो था… उसे तो एक दिन टूटना ही था।”

नूरजहां का स्वभाव ही ऐसा था कि वे छोटी-छोटी बातों को दिल पर नहीं लेती थीं। अक्सर जब वे नाना को मुस्कुराते देखतीं, तो उनकी वालिदा से हँसते हुए कहतीं, “बीबी, अपना बेटा तू मुझे गोद दे दे… मैं इसे मुंबई ले जाकर हीरो बनाऊँगी।”

लेकिन नाना की वालिदा हर बार मुस्कुराकर उनकी यह बात टाल देती थीं।

आज जब मैंने नूरजहां जी के बारे में पढ़ा, तो पता चला कि 1947 के विभाजन के बाद उन्होंने पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लिया था। जब दिलीप कुमार ने उनसे भारत में ही रहने का आग्रह किया, तो उन्होंने कहा था, “मैं जहाँ पैदा हुई हूँ, वहीं जाना चाहती हूँ।”

नाना बताया करते थे कि नानी की बहन भी अपने पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान चली गई थीं। शुरुआती दिनों में उनका परिवार हमसे मिलने आया करता था, मगर धीरे-धीरे वह सिलसिला भी खत्म हो गया।

1947 में भारत विभाजन के बाद, नूरजहां के पाकिस्तान जाने से पहले ही नाना का परिवार फिर से डबरा लौट आया था। वजह बस इतनी थी कि नाना की वालिदा का मन वहाँ बिल्कुल नहीं लगता था। बड़े शहर की भागदौड़ और उस हवेली का सन्नाटा उन्हें रास नहीं आता था।

उधर ग्वालियर में नाना के वालिद की जो ज़मीन थी और उस पर बने मकान थे, वे अब उनके हाथ से निकल चुके थे। उस दौर का माहौल भी अशांत था और वहाँ बहुत कुछ बदल चुका था। कागज़ात साथ न होने के कारण वे उन्हें दोबारा हासिल नहीं कर पाए, और आखिरकार उस ज़मीन को वापस पाने का ख्याल भी मन से निकाल दिया। आज वही जगह “ओल्याई डॉक्टर का वाड़ा” के नाम से जानी जाती है।

भोपाल जाने से पहले नाना का परिवार डबरा में ‘बिजलीघर’ नामक इलाके में रहता था। भोपाल से वापस डबरा आने के बाद नाना उषा कॉलोनी में रहने लगे थे।

यह सच है कि एक समय ऐसा आया जब नाना के हाथ से उनके वालिद की ज़मीन चली गई। लेकिन बाद में ऐसा भी लगा, जैसे किस्मत हिसाब बराबर करना चाहती हो।

नाना का एक सिख मित्र था, जो उनसे बेहद स्नेह रखता था। आज डबरा में जहाँ बस स्टैंड के पास पक्की दुकानें बनी हुई हैं, वहाँ उस समय नदी बहती थी और अक्सर पानी भरा रहता था। वही ज़मीन वह सिख मित्र नाना को बिना किसी कीमत के देना चाहता था। वह अक्सर नाना से कहा करता था, “भाई, तू मुझे बस एक नारियल और कुछ बताशे दे दे, और यह ज़मीन अपने नाम कर ले।”

लेकिन नाना अपनी खुद्दारी में उनसे कहा करते थे, “मैं इस ज़मीन का क्या करूँगा? मेरा एक ही तो बेटा है।”

आज उसी ज़मीन पर पक्की दुकानें बनी हुई हैं, और वह डबरा की सबसे कीमती जगहों में गिनी जाती है।

याद आता है वह पल, जब एक दिन मैं नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के गीत सुन रहा था। तभी अचानक नुसरत साहब और नूरजहां का गाया हुआ गीत “तेरे बिना रोगी होए प्यासे नैन” सुनने को मिला। उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि जिन शख्सियतों की दुनिया दीवानी है, वे कभी मेरे नाना के कितने क़रीब रही थीं।

बचपन में जब नाना कहा करते थे, “हम नूरजहां की शूटिंग देखा करते थे… वह मुझसे तरह-तरह की बातें किया करती थीं…”, तो मैं बस यही समझता था कि कोई पुरानी अभिनेत्री होंगी, जिनका ज़िक्र नाना किया करते हैं।

लेकिन आज जब नूरजहां के बारे में पढ़ता हूँ, तो समझ आता है कि उन्हें “मलिका-ए-तरन्नुम” क्यों कहा गया। लगभग चार दशकों तक उन्होंने अपनी आवाज़ और अभिनय से लोगों के दिलों पर राज किया। आज भी उनके बारे में चर्चा न हो, ऐसा होना मुश्किल है।

काफ़ी समय पहले जब मैं उनकी गाई हुई ग़ज़ल “हमारी साँसों में आज तक वो” सुन रहा था, तो दिल से उसे अपनी अब तक की सबसे पसंदीदा ग़ज़ल मान लिया था।

बाद में यह एहसास हुआ—अरे, यह तो वही नूरजहां हैं, जिनका ज़िक्र नाना अक्सर किया करते थे। सच है, बुज़ुर्ग जो कहते हैं, उसे हम कभी-कभी हल्के में ले लेते हैं। बचपन में उनकी बातें साधारण लग सकती हैं, लेकिन वे ऐसे दौर को देखकर आए होते हैं, जिसकी सीढ़ियाँ हम अभी चढ़ना शुरू ही करते हैं।

यह भी सच है कि भले ही आज तकनीक बहुत आगे बढ़ गई हो, लेकिन उस दौर के संगीत की जो मिठास थी, वह अब कम ही महसूस होती है। आज कई बार सब कुछ बनावटी-सा लगता है। शायद यही वजह है कि लोग फिर से पुराने दौर की हर चीज़ को याद करने लगे हैं और उसे फिर से महसूस करना चाहते हैं।

धर्म नहीं, इंसान के कर्म जिम्मेदार हैं — फिर धर्म को क्यों बदनाम किया जाता है?

धर्म नहीं, इंसान के कर्म जिम्मेदार हैं — फिर धर्म को क्यों बदनाम किया जाता है?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आज का समय एक अजीब और चिंताजनक दौर से गुजर रहा है। हर धर्म विशेष का व्यक्ति दूसरे धर्म पर लांछन लगाने में लगा हुआ है—और ये लांछन इतने विचित्र होते हैं कि सुनने वाला व्यक्ति स्वयं से यह प्रश्न करने लगता है कि मैंने या मेरे परिवार ने ऐसा कब किया, जिसका आरोप मुझ पर लगाया जा रहा है।

यदि हम ईमानदारी से देखें, तो हर धर्म के प्राचीन शास्त्रों में कुछ ऐसी बातें मिल जाएँगी, जिन्हें आज के समय में न तो हम अपनाना चाहेंगे और न ही उनके बारे में चर्चा करना पसंद करेंगे। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है, क्योंकि हर धर्म एक अलग समय और सामाजिक परिस्थिति में विकसित हुआ। लेकिन जब आज के शिक्षित और जागरूक लोग स्वयं उन बातों का अनुसरण नहीं कर रहे, तो उन्हीं बातों को आधार बनाकर नफरत फैलाने का उद्देश्य क्या है? क्या यह केवल समाज को बाँटने का एक साधन नहीं बन गया है?

यह भी एक सच्चाई है कि हर धर्म के कुछ देहाती या अशिक्षित क्षेत्रों में ऐसे लोग मिल सकते हैं, जो आज भी पुरानी परंपराओं और मान्यताओं का पालन करते हैं।

नफरत फैलाने वाले लोग इसी सच्चाई का फायदा उठाते हैं। वे जानबूझकर ऐसे लोगों को खोजते हैं, उन्हें कैमरे में कैद करते हैं, उनकी राय लेते हैं, और फिर उस सामग्री को भ्रामक और अधूरी जानकारी के साथ मिलाकर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत करते हैं। इससे एक ऐसा भ्रम पैदा किया जाता है, मानो वही विचार पूरे धर्म का प्रतिनिधित्व करते हों।

दुखद बात यह है कि अब इस कार्य में बड़े-बड़े फिल्म निर्माता और प्रभावशाली व्यक्ति भी शामिल होते जा रहे हैं, जो अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण निष्पक्ष सत्य दिखाने के बजाय एक विशेष धारणा गढ़ने और उसे स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

आज स्थिति यह हो गई है कि जिस धर्म में किसी गलत चीज का स्पष्ट और सख्त विरोध किया गया है, उसी धर्म को उसी चीज का समर्थक दिखाने की कोशिश की जाती है—वह भी आधी-अधूरी या पूरी तरह भ्रामक जानकारी के आधार पर। जबकि वास्तविकता यह होती है कि उस धर्म में उस चीज का कोई समर्थन ही नहीं होता। क्या यह विडंबना नहीं है? क्या यह सचमुच एक अजीब और चिंताजनक स्थिति नहीं है?

लोग शायद यह मूलभूत सत्य भूल गए हैं कि जिनके घर शीशे के बने होते हैं, उन्हें दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।

और यह भी एक गहरा सत्य है कि जब हम किसी और की ओर एक उंगली उठाते हैं, तो तीन उंगलियाँ हमारी ओर ही होती हैं—जो हमें हमारी अपनी कमियों की याद दिलाती हैं।

समझ से परे है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी धर्म को लेकर कोई गलतफहमी है, तो वह स्वयं उसकी सच्चाई जानने का प्रयास क्यों नहीं करता। और यदि वह स्वयं अध्ययन नहीं कर सकता, तो आज के समय में ChatGPT जैसे माध्यम उपलब्ध हैं, जहाँ विभिन्न धार्मिक शास्त्रों के आधार पर संतुलित और तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

पर अफसोस, सत्य की खोज करने के बजाय लोगों को व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी की अधूरी, भ्रामक और सनसनीखेज जानकारी पर विश्वास करना अधिक आसान लगता है।

उदाहरण के लिए, व्हाट्सऐप पर एक पोस्ट में दावा किया गया कि महाराणा प्रताप युद्ध के मैदान में 360 किलो का भार अपने शरीर पर लेकर उतरते थे। सुनने में यह बात भले ही अत्यंत रोमांचक लगे, लेकिन जब कोई व्यक्ति सत्य जानने का प्रयास करता है, तो वास्तविकता बिल्कुल अलग सामने आती है।

उदयपुर के सिटी पैलेस म्यूजियम में आज भी महाराणा प्रताप के कवच और हथियार सुरक्षित रखे हुए हैं, और वहाँ स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि उनका वास्तविक वजन लगभग 35 किलो है।

स्पष्ट है कि तथ्य और कल्पना के बीच गहरा अंतर होता है। लेकिन जो लोग सत्य से अधिक विवाद और उत्तेजना में रुचि रखते हैं, उन्हें व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया ज्ञान ही अधिक आकर्षक लगता है।

सत्य और असत्य के बीच का अंतर समझना आज पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। गलत जानकारी पर आधारित वीडियो और प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित जानकारी में जमीन-आसमान का अंतर होता है। यह भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि सोशल मीडिया पर एक विशेष धर्म को बदनाम करने के लिए जानबूझकर वीडियो और रील्स वायरल की जाती हैं।

किसी मानसिक रूप से अस्थिर या गलत व्यवहार करने वाले व्यक्ति की हरकतों को अक्सर उसके पूरे धर्म से जोड़ दिया जाता है, और उसे इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो वह पूरे धर्म की पहचान हो। जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। सच यह है कि ऐसे लोग हर धर्म में पाए जाते हैं—यह किसी एक धर्म की समस्या नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज की एक सच्चाई है।

लेकिन यहाँ एक पैटर्न साफ दिखाई देता है। कुछ मामलों में ऐसी घटनाओं को पूरी प्रमुखता के साथ दिखाया जाता है—व्यक्ति का नाम, उसकी पहचान, उसका धर्म—सब कुछ बार-बार दोहराया जाता है, जिससे धीरे-धीरे वह घटना एक व्यक्ति की न रहकर एक पूरे धर्म की पहचान बना दी जाती है। वहीं दूसरी ओर, जब किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति वैसी ही हरकत करता है, तो मीडिया कई बार उसका नाम और धार्मिक पहचान बताने से बचता है। वह खबर तो दिखाता है, क्योंकि यह उसका कर्तव्य है और वह उसे पूरी तरह छुपा नहीं सकता, लेकिन व्यक्ति की पहचान को सीमित रखता है।

यही वह अंतर है, जिसे एक जागरूक व्यक्ति आसानी से समझ सकता है—कि सूचना केवल निष्पक्ष रूप से नहीं दी जाती, बल्कि उसे धर्म के आधार पर दो अलग-अलग तरीकों से परोसा जाता है।

परंतु वास्तविकता इससे अलग और अधिक व्यापक है। सच यह है कि गलत व्यक्ति का कोई धर्म नहीं होता—गलत केवल उसका कर्म होता है। लेकिन जब कर्म की जगह धर्म को केंद्र बना दिया जाता है, तो इससे सत्य कमजोर और भ्रम मजबूत हो जाता है।

इसी कारण आज यह पहले से अधिक आवश्यक हो गया है कि हम हर जानकारी को बिना सोचे-समझे स्वीकार न करें, बल्कि उसके स्रोत, संदर्भ और उद्देश्य को भी समझें।

नफरत फैलाने वाले लोगों से एक सरल प्रश्न पूछा जाना चाहिए—यदि आप उसी धर्म में पैदा हुए होते, जिसका आज आप अपमान कर रहे हैं, तो क्या आप उस धर्म को छोड़कर किसी दूसरे धर्म को अपना लेते?

केवल दो परिवारों का ही उदाहरण ले लीजिए, जिनके घर एक-दूसरे के बिल्कुल पास-पास हैं। दोनों एक ही धर्म से जुड़े हुए हैं, लेकिन एक परिवार ऐसा है जहाँ शराब, जुआ और बुरी आदतों ने घर का माहौल बिगाड़ दिया है, और उनके बच्चे भी उन्हीं गलत रास्तों पर आगे बढ़ रहे हैं। वहीं, उसी धर्म का दूसरा परिवार ऐसा है, जो इन सभी बुराइयों से दूर रहकर आध्यात्मिक विचारों और अच्छे संस्कारों के साथ एक संतुलित और सम्मानजनक जीवन जी रहा है।

अब प्रश्न यह उठता है कि इन दोनों परिवारों में अंतर किसने पैदा किया? क्या उनका धर्म अलग था? नहीं—धर्म तो दोनों का एक ही था।

इससे स्पष्ट होता है कि केवल किसी धर्म विशेष से जुड़ा होना ही पर्याप्त नहीं है। धर्म का वास्तविक अर्थ उसे अपने आचरण और जीवन में अपनाना है, न कि केवल उसके नाम पर इतराना। क्योंकि धर्म की पहचान व्यक्ति के नाम से नहीं, बल्कि उसके कर्म, उसके संस्कार और उसके चरित्र से होती है।

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि इंसान अपने धर्म से नहीं, बल्कि अपने कर्म और संस्कारों से महान बनता है। धर्म चाहे कितना ही महान क्यों न हो, यदि व्यक्ति के अंदर अच्छे संस्कार नहीं हैं, तो समाज उसे सम्मान नहीं देगा। और इसके विपरीत, यदि व्यक्ति के कर्म श्रेष्ठ हैं, तो उसका सम्मान उसके धर्म से परे जाकर भी किया जाएगा।

इससे यह स्पष्ट होता है कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म और संस्कारों से प्राप्त होती है।

यदि किसी व्यक्ति को सच में धर्म को समझने की इच्छा है, तो उसे व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी की भ्रामक और अधूरी जानकारी से ऊपर उठना होगा और विभिन्न धर्मों के मूल शास्त्रों का अध्ययन करना होगा—वह भी खुले मन और विनम्र दृष्टिकोण के साथ। क्योंकि जब तक मन में अपने धर्म को लेकर अहंकार बना रहेगा, तब तक सच्चे ज्ञान का द्वार कभी नहीं खुल सकता।

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब: मेरी जिंदगी का एक हिस्सा

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब: मेरी जिंदगी का एक हिस्सा

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

याद आता है वह बचपन का सुनहरा दौर, जब घर के उस कमरे में, जहाँ डेक रखा होता था, उसके पास बैठकर हर कैसेट का कवर बड़े गौर से देखा करता था—उसकी चमकदार तस्वीरें, रंग-बिरंगे नाम और बड़े-बड़े अक्षर। हर कवर एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल देता था। उनमें से एक कैसेट मेरे लिए खास थी। बाएँ कोने में उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब और दाएँ कोने में जावेद अख्तर साहब—दोनों के मुस्कान भरे चेहरे। और नीचे बीच में बड़े अक्षरों में सिर्फ़ एक शब्द लिखा था—संगम। वही उस एल्बम का नाम था।

बचपन में मैं हर तरह का संगीत सुनता था—फिल्मी गाने, क़व्वाली, ग़ज़लें, सब कुछ। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और एक लंबे अंतराल के बाद जब उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब की आवाज़ फिर से मेरे कानों में गूँजी, तब जाकर सच्चा एहसास हुआ। यह कोई मामूली आवाज़ नहीं थी। यह रूह की गहराइयों से निकलती हुई, सीधे दिल को छूने वाली, आत्मा को झकझोर देने वाली पुकार थी—एक ऐसी आवाज़ जो शब्दों से परे जाकर भावनाओं को जगा देती थी।

उस समय इंटरनेट तो दूर की बात थी, मोबाइल फ़ोन भी बहुत कम लोगों के पास थे। जानकारी सीमित थी, लेकिन चाहत असीम। फिर आया मुहर्रम का महीना। इस्लामी कैलेंडर की नौवीं तारीख। गली-मोहल्ले में जुलूस निकला। दूर से डीजे की आवाज़ आ रही थी। और अचानक एक क़व्वाली गूँजी—

“इस शाने करम का क्या कहना…”

इतनी कठिन जुगलबंदी, इतनी गहराई और रूह को भीतर तक झकझोर देने वाली वह आवाज़ मैंने इससे पहले कभी नहीं सुनी थी। उस क्षण ऐसा लगा मानो समय ठहर गया हो। उसी पल यह स्पष्ट हो गया कि इस क़व्वाली को इस शान, इस असर और इस आत्मिक शक्ति के साथ कोई और गा ही नहीं सकता।

यहीं से मेरे भीतर एक नई चाह पैदा हुई—नुसरत साहब को और सुनने की, उन्हें और समझने की।

मैं बाज़ार गया, उनका नाम बताया और उनकी कैसेट माँगी—लेकिन ज़्यादातर लोग समझ ही नहीं पाए। वजह साफ़ थी। मैं डबरा में रहता हूँ, और यहाँ बहुत से लोग संगीत तो सुनते हैं, लेकिन कौन-सा गीत किसने गाया या लिखा, यह जानना उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं होता। यह स्वाभाविक भी है—जब ऐसे ही लोग फ़िल्म में “दूल्हे का सेहरा” में कादर ख़ान को देखेंगे, तो उनके लिए यह समझना कठिन होगा कि वास्तविक गायक कौन है। उनके लिए मूल बात केवल यही होती है—आम खाओ, गुठलियाँ मत गिनो।

नुसरत साहब के गीतों का अलग से कोई संग्रह मुझे नहीं मिला, इसलिए मैंने फ़िल्म कच्चे धागे की कैसेट खरीद ली, जिसमें उन्होंने संगीत दिया था और क़व्वाली सहित कई शानदार गीत शामिल थे। उस कैसेट ने मेरे लिए एक नया दरवाज़ा खोल दिया—एक ऐसी दुनिया का, जहाँ संगीत केवल सुना नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है।

फिर टेलीविज़न पर एक नया दौर शुरू हुआ। हर शाम एक तय समय पर फिल्मी गीतों के बीच नुसरत साहब का भी एक गीत आता। मैं हर शाम उसका इंतज़ार करने लगा। वह गीत था—“कोई जाने कोई ना जाने…” केवल एक बार सुन पाना मन को तसल्ली नहीं देता था। दिल कहता—और सुनना है, और गहराई में उतरना है।

उसी समय ज़ी टीवी पर “सा रे गा मा” शुरू हुआ। वह कार्यक्रम उन दिनों एक अलग ही रंग लेकर आया था। पाकिस्तान से कई प्रतियोगी शामिल हुए। उनमें मुसर्रत सबसे खास थे। वे अक्सर उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब के गीत गाते थे। उनकी आवाज़ में वही रूहानी झलक दिखाई देती थी। वह कार्यक्रम और मुसर्रत—दोनों मेरे पसंदीदा बन गए।

उन दिनों मेरा एक दोस्त अपनी बहन के नवजात बेटे के लिए नाम सुझाने की बात करने आया था। उसके पापा ने कहा था कि नाम ‘म’ से शुरू होना चाहिए, क्योंकि बच्चे का जन्म किसी खास रात में हुआ था। मैंने बिना सोचे तुरंत कहा—मुसर्रत।

इस नाम में ‘म’ भी था और ‘रत’ भी—जो ‘रात’ से जुड़ा हुआ था।

जब उसने अपने पिताजी को यह नाम बताया, तो उन्हें यह नाम बेहद पसंद आया। आज भी वह परिवार स्नेहपूर्वक याद करता है कि मुसर्रत का नाम मैंने सुझाया था।

इंटरनेट के बिना उन दिनों बेचैनी चरम पर थी। नुसरत साहब को सुनने के लिए तरसता था। आखिरकार एक ऑल-इन-वन म्यूज़िक प्लेयर खरीदा। उसमें सबसे अधिक उनके ही गीत होते थे। सच कहूँ, उसी प्लेयर ने मुझे नुसरत साहब की दुनिया में पूरी तरह ले जाकर बसाया। मोहल्ले के दोस्तों को जब अपने हाई क्वालिटी ईयरफ़ोन से “आफ़रीन आफ़रीन” सुनाता, तो नुसरत साहब की सरगम की आवाज़ कभी लेफ्ट से गूँजती, तो कभी राइट से उभरती। उस स्टीरियो ध्वनि का जादू ऐसा होता, मानो उनकी आवाज़ चारों ओर फैलकर सीधे रूह को छू रही हो। वे भी सुनकर कह उठते—“नुसरत साहब जैसा कोई नहीं।”

अब केवल बात उस महान शख्स की, जिन्होंने अपनी आवाज़ से पूरी दुनिया को बदल दिया।

सन् 1985। इंग्लैंड का मर्सी आइलैंड। वर्ल्ड ऑफ म्यूज़िक, आर्ट्स एंड डांस उत्सव, जिसका आयोजन मशहूर रॉक कलाकार पीटर गैब्रियल कर रहे थे। लोग हाथों में बीयर लिए रॉक और पॉप पर झूम रहे थे। तभी मंच पर अचानक बदलाव हुआ। सफेद कालीन बिछाई गई। कुर्ता-पायजामा में साज़िंदे चुपचाप बैठ गए। दर्शकों को लगा—शायद कोई साधारण लोक संगीत होगा।

हारमोनियम सधा। सुर उठे।

आठ-दस मिनट बीते।

फिर दो शब्द गूँजे—“अल्लाह हू…”

बस, वहीं से जादू छा गया। शब्दों का अर्थ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन आवाज़ का असर इतना गहरा था कि लोग खड़े होकर झूमने लगे। कुछ की आँखों से आँसू बहने लगे। कुछ आँखें बंद कर उस संगीत में खो गए। जो प्रस्तुति केवल एक घंटे की थी, वह रात के तीन बजे तक चलती रही। वही रात उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान की वैश्विक पहचान की शुरुआत बनी।

आपको शायद हैरानी होगी कि उनका प्रशंसक वर्ग भारत, पाकिस्तान और यूनाइटेड किंगडम से भी ज़्यादा जापान में था। जापानी उन्हें सम्मान से “सिंगिंग बुद्धा” कहते थे। फुकुओका शहर में एक कॉन्सर्ट के दौरान वे “दमादम मस्त कलंदर” गा रहे थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक जापानी महिला रोती हुई उनके पास आई। उसने भावुक स्वर में कहा—

“मैं बहुत तनाव में थी। मैं आत्महत्या करने वाली थी। लेकिन आपकी आवाज़ ने मुझे जीने की वजह दे दी।” 

यह केवल एक गायक की आवाज़ नहीं थी। यह रूह की आवाज़ थी—टूटे हुए दिलों को जोड़ने वाली, जीवन की बुझती लौ को फिर से प्रज्वलित करने वाली।

इसी दिव्यता और प्रभाव के कारण दुनिया ने उन्हें “शहंशाह-ए-क़व्वाली” का खिताब दिया। यह कोई साधारण उपाधि नहीं थी—यह प्रेम, श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक थी, जो पूरी दुनिया के श्रोताओं ने उन्हें अपने दिल से दिया था। उनकी आवाज़ ने भाषा, धर्म और सरहदों की सीमाओं को पार कर सीधे रूह को छुआ। यही कारण है कि वे संगीत की दुनिया में अमर हो गए।

एक और वाकया है, जो एक साधारण इंसान और एक महान कलाकार के बीच का अंतर स्पष्ट कर देता है।

फिल्म कच्चे धागे के दौरान, जिसमें मुख्य भूमिका अजय देवगन निभा रहे थे, गीत आनंद बख्शी जी द्वारा लिखे जाने थे और संगीत की जिम्मेदारी उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब के हाथों में थी। इसी सिलसिले में नुसरत साहब पाकिस्तान से मुंबई आए। तय हुआ कि उनकी मुलाकात आनंद बख्शी जी से होगी और दोनों साथ बैठकर गीतों पर काम करेंगे। लेकिन किसी न किसी कारण से यह मुलाकात बार-बार टलती रही।

धीरे-धीरे आनंद बख्शी जी के मन में यह बात घर कर गई—

“नुसरत साहब मुंबई आए हैं, लेकिन मुझसे मिलने नहीं आ रहे। अगर उन्हें गीत चाहिए, तो उन्हें स्वयं आना चाहिए।”

यह एक गलतफहमी थी, लेकिन अहंकार और संकोच ने इस दूरी को और बढ़ा दिया।

एक दिन नुसरत साहब ने अपने साथियों से कहा—

“मुझे बांद्रा ले चलो, आनंद बख्शी जी के घर।”

आनंद बख्शी जी पहली मंजिल पर रहते थे। वहाँ लिफ्ट नहीं थी। सीढ़ियाँ चढ़कर ही ऊपर जाना पड़ता था।

जब आनंद जी को पता चला कि नुसरत साहब आ रहे हैं, तो वे खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए। उन्होंने नीचे देखा—एक कार आकर रुकी। कार से उतरते समय तीन-चार लोग नुसरत साहब को सहारा दे रहे थे। फिर वे धीरे-धीरे, बड़ी कठिनाई से सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

यह दृश्य देखकर आनंद बख्शी जी स्तब्ध रह गए।

उन्हें उसी क्षण एहसास हुआ कि नुसरत साहब उनसे मिलने इसलिए नहीं आ रहे थे, क्योंकि उन दिनों उनके लिए चलना-फिरना अत्यंत कठिन था।

आनंद जी की आँखें भर आईं।

जैसे ही नुसरत साहब ऊपर पहुँचे, आनंद बख्शी जी अपने आप को रोक नहीं पाए। वे तुरंत आगे बढ़े, भावुक होकर उनके चरणों में झुक गए और अपने अहंकार और गलतफहमी के लिए गहरा पश्चाताप व्यक्त किया।

वह क्षण केवल दो कलाकारों की मुलाकात नहीं था—वह महानता, विनम्रता और सच्चे सम्मान का प्रतीक था।

उस दिन के बाद दोनों महान कलाकारों ने साथ मिलकर ऐसे अमर गीतों की रचना की, जो आज भी भारतीय सिनेमा की अनमोल धरोहर हैं।

एक और वाकया है, सन् 1995 में हॉलीवुड फिल्म डेड मैन वॉकिंग के लिए संगीत तैयार किया जा रहा था। निर्देशक सीन पेन थे। संगीत के लिए एडी वेडर को बुलाया गया। एडी वेडर ने कहा—

“मुझे ऐसी आवाज़ चाहिए, जो केवल गले से नहीं, बल्कि रूह से निकले।”

तब उन्हें नुसरत साहब का नाम सुझाया गया। जब नुसरत साहब ने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा, तो एडी वेडर इतने प्रभावित हुए कि रिकॉर्डिंग समाप्त होते ही वे भावुक होकर उनके चरणों में झुक गए।

यह केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं था—यह एक रूहानी शक्ति के प्रति समर्पण था।

आज जब अपने ही देश के कुछ गायक उनके ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हैं, तो दिल में गहरा अफ़सोस होता है। वे ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो संगीत पर केवल उन्हीं का अधिकार हो—जैसे दुनिया को सिर्फ़ उन्हीं की आवाज़ सुननी चाहिए।

पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि नुसरत साहब द्वारा गाई गई क़व्वालियों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करके उनके बारे में भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है।

हाल ही में एक क्लिप वायरल हुई—

“कुछ तो सोचो मुसलमान हो तुम, काफ़िरों को ना घर में बिठाओ…”

पहली नज़र में यह पंक्ति सुनकर गलतफहमी होना स्वाभाविक है। शब्दों का सतही अर्थ अक्सर मन में भ्रम पैदा कर देता है। लेकिन जब आप यूट्यूब पर जाकर ‘साथ देने का वादा किया है’ शीर्षक वाली इसी क़व्वाली को पूरी तरह सुनते हैं, तब इसका वास्तविक भाव और गहराई सामने आती है। ज़रा इन पंक्तियों पर गौर फ़रमाइए—

साथ देने का वादा किया है
जान-ए-जां अपना वादा निभाओ
यूँ ना छोड़ो मुझे रास्ते में
दो कदम तो मेरे साथ आओ

कुछ तो सोचो मुसलमान हो तुम
काफ़िरों को ना घर में बिठाओ
लूट लेंगे ये ईमान हमारा
अपने चेहरे से गेसू हटाओ

मेरी तुरबत पे क्यों रो रहे हो
नींद आई है मुश्किल से मुझको
कब्र में चैन से सो रहा हूँ
छींटे देकर ना मुझको जगाओ

चारागर, मैं हूँ बीमार ऐ फ़ुरक़त
क्यों उठाते हो बेकार ज़हमत
करना चाहो जो मेरा मदावा
ढूँढ़कर मेरे दिलबर को लाओ

जब वो देखेंगे मय्यत तुम्हारी
ऐ फ़ना उनको अफ़सोस होगा
हो तो मुमकिन तो अपने ख़ुदा से
थोड़ी-सी ज़िंदगी माँग लाओ

यह क़व्वाली किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक आशिक़ के टूटे हुए दिल की पुकार है। यह उस प्रेमी की कहानी है, जिसकी महबूबा ने साथ निभाने का वादा किया, लेकिन उसे अधूरा छोड़ दिया। वह स्वयं को बीमार बताता है—ऐसी बीमारी से, जिसका इलाज केवल उसका ‘दिलबर’ है।

जिस शब्द पर सबसे अधिक आपत्ति की जाती है, वह है—‘काफ़िर’। लेकिन सूफ़ी काव्य और उर्दू शायरी में ‘काफ़िर’ शब्द का प्रयोग अक्सर धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक अर्थ में होता है। यहाँ ‘काफ़िर’ उस महबूबा का रूपक है, जिसकी खूबसूरती और बेरुख़ी आशिक़ का ‘ईमान लूट लेती है।’ जब नुसरत साहब गाते हैं—“अपने चेहरे से गेसू हटाओ”—तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आशिक़ अपनी प्रेमिका की ज़ुल्फ़ों की बात कर रहा है, न कि किसी धार्मिक पहचान की।

अब ज़रा इस स्थिति पर विचार कीजिए—यदि आम लोगों को इस क़व्वाली का केवल एक अंश सुनाया जाए, तो स्वाभाविक है कि वे उसी सीमित संदर्भ में अर्थ निकालेंगे। अधूरी जानकारी अक्सर गलत निष्कर्षों को जन्म देती है। ‘काफ़िर’ शब्द का एक अर्थ ‘नास्तिक’ भी है—ऐसा व्यक्ति, जो ईश्वर को नहीं मानता। विभिन्न धर्मों और परंपराओं में ईश्वर की ओर उन्मुख रहने और नास्तिकता से दूर रहने की बात कही गई है। इस संदर्भ में भी यह शब्द घृणा का नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और काव्यात्मक प्रयोग है।

याद आता है ‘आप की अदालत’ का वह प्रसंग, जिसमें तारेक फ़तेह ने कहा था कि ‘काफ़िर’ शब्द का अर्थ समय के साथ विकृत कर दिया गया। कभी यही शब्द सुंदरता के लिए प्रशंसा के रूप में प्रयोग होता था—“क्या काफ़िर हसीना है…”—अर्थात ऐसी सुंदरता, जो व्यक्ति को सम्मोहित कर दे।

लेकिन विडंबना देखिए—जब यही प्रसंग नुसरत साहब की क़व्वाली के संदर्भ में आया, तो बिना पूरी रचना सुने ही तारेक फ़तेह ने कठोर टिप्पणी कर दी।

यह भी याद दिलाना आवश्यक है कि ‘आप की अदालत’ के उसी एपिसोड में बेबाकी से उन्होंने स्वयं को अदनान सामी से बेहतर गायक तक बता दिया था—जो अपने आप में एक दिलचस्प दावा था।

कई बार सार्वजनिक जीवन में कुछ लोग पाकिस्तान या वहाँ के कलाकारों पर तीखी टिप्पणियाँ करके सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं। कला की आलोचना अपनी जगह है, परंतु अधूरी जानकारी के आधार पर दिया गया बयान अक्सर कलाकार के साथ न्याय नहीं कर पाता।

नुसरत साहब ने लगभग हर धर्म से जुड़े धार्मिक गीत गाए हैं और यहाँ तक कि हज़रत बुल्ले शाह, अमीर खुसरो और अन्य महान सूफ़ी संतों के कलाम गाकर प्रेम, एकता और आध्यात्मिकता का संदेश पूरी दुनिया तक पहुँचाया है।

सूफ़ी और उर्दू शायरी में—

मुसलमान का अर्थ होता है—सच्चा प्रेमी

काफ़िर का अर्थ होता है—महबूब की खूबसूरती

“काफ़िर हुस्न”, “काफ़िर निगाहें” और “काफ़िर अदाएँ”—यह धार्मिक नहीं, प्रेम की तीव्रता का प्रतीक है। पूरी क़व्वाली में प्रेमी महबूब से वादा निभाने की बात करता है, जुदाई के दर्द में तड़पता है, और अंत में कहता है—“जब वो देखेंगे मय्यत तुम्हारी, ऐ फ़ना, उनको अफ़सोस होगा…”

यह धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम के प्रतीक हैं।

सूफ़ी परंपरा में इश्क़ दो प्रकार का होता है—

इश्क़-ए-मजाज़ी (मानव से प्रेम)

इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वर से प्रेम)

दोनों के लिए एक ही भाषा, एक ही प्रतीक प्रयुक्त होते हैं।

इसी संदर्भ में अमीर खुसरो की प्रसिद्ध रचना “छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके” को भी समझना चाहिए। “छाप तिलक” का अर्थ बाहरी पहचान से है—जैसे सामाजिक पहचान। सूफ़ी दर्शन के अनुसार, जब साधक भक्ति या प्रेम की उच्चतम अवस्था तक पहुँच जाता है, तो वह इन बाहरी प्रतीकों की परवाह नहीं करता। प्रेम की उस अवस्था में केवल समर्पण शेष रह जाता है। इसका अर्थ किसी धर्म या परंपरा को त्यागना नहीं, बल्कि बाहरी प्रतीकों की परवाह से ऊपर उठना है।

आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोग पूरी रचना को नहीं सुनते। केवल दस या पंद्रह सेकंड का क्लिप देखकर निष्कर्ष निकाल लेते हैं।

लेकिन सच्चाई यह है—

नुसरत साहब का संगीत कभी विभाजन का नहीं, बल्कि एकता का माध्यम था।

उन्होंने कभी किसी के खिलाफ़ एक शब्द नहीं कहा।

उनकी आवाज़ ने पूरी दुनिया को जोड़ा।

उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान केवल एक गायक नहीं थे—

वे रूह की आवाज़ थे।

और रूह की आवाज़ कभी नहीं मरती।

वह आज भी गूँज रही है।

वह अमर है।

और सदियों तक गूँजती रहेगी।

आस्था के नाम पर समझौते: धर्म नहीं, अवसर का खेल?

आस्था के नाम पर समझौते: धर्म नहीं, अवसर का खेल?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

कुछ लोग अपने-अपने दीन-धर्म में रहकर, अपनी धार्मिक आस्था से जुड़ी प्रार्थनाओं और धर्म-कर्म के कामों में शामिल दिखाई देते हैं।
उनका पहनावा और चाल-चलन देखकर लोग अक्सर यही मान लेते हैं कि यह व्यक्ति तो बहुत धार्मिक किस्म का इंसान है।

लेकिन ज़रा रुकिए।
सोचिए।

क्या कहीं ऐसा तो नहीं कि यह धार्मिकता सिर्फ़ तभी तक रहती हो, जब तक वह व्यक्ति किसी परेशानी में है?
या फिर यह धार्मिकता इसलिए दिखती हो क्योंकि उसे कभी बुराई करने का मौका ही नहीं मिला?
या फिर यह सब उसकी आर्थिक स्थिति का ही असर हो?

आज मैं इस विषय पर इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि हाल ही में स्क्रॉल करते समय मुझे एक सेलेब्रिटी का एक वीडियो दिखा, जिसमें उसके नृत्य-भाव से जुड़ी हरकतें उसकी पुरानी आस्था से पूरी तरह उलट थीं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि जब उसके परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी, तब बहुत कम उम्र में ही वह भक्ति-भजनों से जुड़े कार्यक्रमों में दिखाई देने लगी। उस समय यह सब सिर्फ़ आस्था नहीं था, बल्कि ज़रूरत भी थी। उन्हीं मंचों से उसकी पहचान बनी, वहीं से उसे सम्मान मिला, और उसी रास्ते से उसके परिवार का गुज़ारा चलता रहा। उसे देखकर लोग यह मान बैठे कि वह पूरी तरह धर्म और श्रद्धा में रची-बसी लड़की है।

समय बदला।
हालात बदले।
मंच बदले।

और उसी के साथ बदल गया वह रूप, जिसे कभी लोग आस्था का प्रतीक मानते थे। अब उसके हाव-भाव, उसकी प्रस्तुतियाँ और उसका सार्वजनिक व्यक्तित्व उस पुरानी छवि से बिल्कुल उलट दिखाई देने लगे।

सवाल यह नहीं है कि वह आज क्या कर रही है—वह उसका निजी जीवन और उसका चुनाव है।
सवाल यह है कि जिस चीज़ को हमने कभी “श्रद्धा” समझ लिया था, वह वास्तव में कितनी गहरी थी, और कितनी हालात के साथ ढलने वाली।

यहीं पर भ्रम पैदा होता है।

हम अक्सर किसी इंसान के काम, पहनावे या मंच को देखकर उसके भीतर झाँके बिना ही फ़ैसला कर लेते हैं। हम मान लेते हैं कि जो धर्म से जुड़ा दिख रहा है, वह भीतर से भी वैसा ही होगा। जबकि सच्चाई यह है कि कई बार धर्म आस्था से नहीं, ज़रूरत से शुरू होता है — और ज़रूरत खत्म होते ही उसका रूप भी बदल जाता है।

ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि कोई व्यक्ति आज क्या कर रहा है, बल्कि यह होता है कि हमने उसे कल क्या मान लिया था। हमने उसकी ज़रूरतों को उसकी आस्था समझ लिया, उसके हालात को उसका चरित्र मान लिया, और उसके मंच को उसकी आत्मा से जोड़ दिया। यहीं पर हमारी समझ चूक जाती है।

समस्या उस लड़की में नहीं है, जिसने समय के साथ अपने रास्ते बदले।
समस्या उस नज़र में है, जो हर धार्मिक दिखने वाले चेहरे को बिना परखे “सच्चा” मान लेती है।

हम यह मान लेते हैं कि जो भक्ति में दिख रहा है, वह भीतर से भी वैसा ही होगा।
जबकि सच्चाई यह है कि कई बार भक्ति और धर्म रोज़गार का ज़रिया भी होते हैं — सम्मान का साधन भी, और पहचान का माध्यम भी।

इसीलिए जब हालात बदलते हैं, तो रूप बदलता है।
जब ज़रूरत बदलती है, तो रास्ता बदलता है।
और जब विकल्प मिलते हैं, तो असली स्वभाव सामने आता है।

कुछ लोगों के लिए धार्मिकता
तभी तक रहती है
जब तक उनके सामने
कोई बड़ा लालच नहीं आता।

और कुछ ऐसे भी होते हैं
जिनकी धार्मिकता बस इतनी-सी होती है कि
अगर उन्हें लगे कि आसपास के लोग
धर्म के हिसाब से नहीं चल रहे,
तो वे भी उसी पल
धर्म का रास्ता छोड़ देते हैं।

मतलब साफ़ है—
सवाल धर्म का नहीं,
सवाल चरित्र और नीयत का है।

क्योंकि मौका मिलने पर
इंसान वही बनता है
जो वह भीतर से होता है।

अब मैं आपको एक दिलचस्प किस्सा सुनाता हूँ।

मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता है।
एक समय था जब वे दुनियावी चीज़ों के बहुत शौकीन थे।
न कोई बॉलीवुड फ़िल्म उनसे छूटती थी,
न हॉलीवुड।

उनकी ज़िंदगी में
संगीत था,
फ़िल्में थीं,
धारावाहिक थे,
शेर-ओ-शायरियाँ थीं—
यानी जीवन रंगों से भरा हुआ था।

फिर वक्त बदला।
फ़िल्मों और धारावाहिकों में वह मज़ा नहीं रहा जो पहले था।
शायद इसी खालीपन से उन्होंने धर्म का रास्ता पकड़ लिया।
धीरे-धीरे वे इतने सख्त हो गए कि अपनी पुरानी पसंद की हर चीज़ छोड़ दी।

अब अगर कोई संगीत या फ़िल्म की बात करता, तो उसे टोक दिया जाता।
उनकी हर बातचीत प्रवचन बन गई।

यानी कुछ लोगों की धार्मिकता
आस्था से नहीं,
मनोरंजन के अभाव से शुरू होती है।

लेकिन वक्त ने फिर करवट ली।

एक फ़िल्म आई,
जिसका संगीत इतना शानदार था
कि उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया।

बस फिर क्या था—
दबा हुआ शौक
एक बार फिर
जाग उठा।

जो लोग कल तक धारावाहिकों के नाम से भी परहेज़ करने लगे थे,
वे फिर उसी रंगीन ज़िंदगी में लौट आए।

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि
जब वे धार्मिक चोला ओढ़ लेते हैं
और खुद को प्रार्थनाओं का पाबंद मानने लगते हैं,
तो वे दूसरों को भी उसी रास्ते पर चलने के लिए
टोकना और नसीहत देना शुरू कर देते हैं—
सिर्फ़ इसलिए कि लोग उन्हें धर्मी मानें।

पुरानी जीवनशैली
पीछे छूट जाती है,
छुपे हुए गुनाह पहले की तरह ही
रोज़मर्रा की आदत बने रहते हैं—
और वे दूसरों को ऐसा दिखाते हैं
कि अब उनका उनसे
कोई लेना-देना नहीं।

इनकी प्रार्थनाएँ
इसलिए नहीं होतीं कि वे बेहतर इंसान बनें,
बल्कि इसलिए होती हैं कि
ईश्वर उनसे खुश हो जाए।

प्रार्थना खत्म होते ही
इनका दिल जैसे कह उठता है—
“अब जो करना है, करो!”

असल में,
यही लोग बार-बार वही काम कर बैठते हैं
जिसे वे खुद ग़लत मानते हैं।
इसी वजह से उनका ज़मीर
बार-बार प्रार्थनाओं में शामिल होने को बेचैन रहता है।

और जो लोग
खुद को ग़लत कामों से बचाकर रखते हैं,
उन्हें ये लोग अपने से छोटा समझते हैं—
सिर्फ़ इसलिए कि वे
प्रार्थनाओं में शामिल नहीं रहते।

ऐसे ही लोग धीरे-धीरे किसी न किसी धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हैं।
गलियों में, मोहल्लों में, सभाओं में — उनका उद्देश्य प्रार्थना से ज़्यादा प्रचार होता है।
वे उन लोगों को भी खींच लाना चाहते हैं, जो उनकी तरह नहीं चलते।

सवाल आस्था का नहीं होता,
सवाल संख्या का होता है।

जितने ज़्यादा लोग साथ दिखें,
उतनी ही मज़बूत धार्मिक पहचान बनती है।

सीधे-साधे लोगों से कहा जाता है—
देखो, हम वही कर रहे हैं जो पहले के महान लोग करते आए हैं।

पर कोई यह नहीं पूछता कि वे लोग कैसे थे, और हम कैसे हैं।
परंपरा का नाम लिया जाता है,
पर चरित्र की बात टाल दी जाती है।

इसी तर्क के सहारे
और लोगों को जोड़ा जाता है।
लोग जुड़ते हैं—
इसमें कोई बुराई नहीं।

लेकिन असली खेल तब सामने आता है
जब वही बॉलीवुड,
जिसे कल तक ‘माया’, ‘भटकाव’ और ‘फितना’ कहा जा रहा था,
फिर से अच्छा कंटेंट
या कहिए मधुर संगीत देने लगता है।

तब क्या होता है?

वही लोग,
जो कल तक समूहों में घूम-घूमकर
दूसरों को नसीहतें देते थे,
आज फिर उसी संगीत में
अपना दिल लुटा बैठते हैं।

ध्यान रखिए—
मैं यहाँ संगीत सुनने वालों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कह रहा।
संगीत तो आत्मा की भाषा है।

मैं जिस बात की ओर इशारा कर रहा हूँ, वह यह है कि
जिन लोगों को हम धार्मिक समझ लेते हैं,
उनकी धार्मिकता कई बार बहुत सस्ती भी हो सकती है,
इसका अंदाज़ा हमें देर से होता है।

इनकी एक और पहचान यह भी होती है कि
ये अक्सर
ईश्वर द्वारा गुनाह माफ़ किए जाने की बातें
बहुत ज़ोर-शोर से करते हैं।

इससे साफ़ पता चलता है कि उनकी सोच
कुछ ऐसी बन जाती है—

पहले ग़लत करो,
फिर प्रार्थना में जाकर माफ़ी माँगो।
फिर ग़लत करो,
फिर माफ़ी माँगो।
और यह सिलसिला
चलता ही रहे।

और हर बार
मन खुद को समझा लेता है
कि अब सब ठीक हो गया।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है
कि माफ़ी माँगी या नहीं।
असली सवाल यह है
कि गलती के बाद इंसान बदला या नहीं।

यहीं फर्क है
आत्म-संतोष
और आत्म-जवाबदेही में।

आत्म-संतोष कहता है—
मैंने प्रार्थना कर ली, अब मैं सही हूँ।

आत्म-जवाबदेही कहती है—
मैंने जो किया,
क्या वह दोबारा नहीं होना चाहिए?

जहाँ आत्म-जवाबदेही होती है,
वहाँ प्रार्थना ढाल नहीं बनती।

और जहाँ प्रार्थना ढाल बन जाती है,
वहाँ इंसान खुद से बचने लगता है।

हम रोज़ देखते हैं—

कोई सिर झुकाता है,
कोई हाथ उठाता है,
कोई तय समय पर
तय शब्द दोहराता है।

और हमें लगता है—
“यह तो ज़रूर बहुत धार्मिक होगा।”

यहीं से कहानी उलझती है।

क्योंकि धर्म
सिर्फ़ झुकने का नाम नहीं है,
सिर्फ़ बोलने का नाम नहीं है,
और सिर्फ़ दिखने का नाम भी नहीं है।

धर्म तो वहाँ शुरू होता है
जहाँ इंसान
दूसरे इंसान के काम आता है।

अजीब बात है—

जो लोग धर्म की सबसे ज़्यादा बातें करते हैं,
अक्सर वही
सबसे कम सहनशील होते हैं।

और जो लोग
धर्म की बातें नहीं करते,
न कोई चिह्न दिखाते हैं,
न कोई दावा करते हैं—
वही अक्सर
सबसे ज़्यादा धर्म निभा रहे होते हैं।

कुछ लोग धर्म को
अपने भीतर रखते हैं।
उनका धर्म
उनके व्यवहार में दिखता है।

कुछ लोग धर्म को
कपड़ों में,
आवाज़ में,
और पहचान में रखते हैं।

कुछ लोग धर्म को
समय पर निभाते हैं,
और उसके बाद
सब कुछ भूल जाते हैं।

कुछ लोग धर्म को
दूसरों पर थोपते हैं
और खुद को
ऊपर समझने लगते हैं।

और कुछ लोग
न धर्म समझते हैं,
न इंसान।

यही सच्चाई है।

अगर धर्म सच में भीतर होता है,
तो वह इंसान को
नरम बनाता है,
संवेदनशील बनाता है,
और ज़िम्मेदार बनाता है।

और अगर धर्म
सिर्फ़ बाहर होता है,
तो वह अक्सर
अहंकार बन जाता है।

सबसे बड़ा धोखा यही है
कि जो सबसे ज़्यादा धार्मिक दिखता है,
वही सबसे ज़्यादा सही होगा।

नहीं।

धर्म कोई प्रतियोगिता नहीं,
धर्म कोई प्रदर्शन नहीं,
धर्म कोई पहचान-पत्र नहीं।

धर्म तो
चुपचाप किया जाने वाला काम है।

वह वहाँ होता है
जहाँ कोई देख नहीं रहा होता,
जहाँ कोई तारीफ़ नहीं कर रहा होता।

और शायद
इसी वजह से
सबसे सच्चा धर्म
अक्सर दिखाई ही नहीं देता।

क्योंकि वह
शोर नहीं करता,
वह बस
इंसान बनाता है।

यही धर्म है।
बाकी सब—व्याख्या है।

मौसम के साथ जीवन: भालू, मनुष्य और प्रकृति की गहरी समझ

मौसम के साथ जीवन: भालू, मनुष्य और प्रकृति की गहरी समझ

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

वर्षा ऋतु के समाप्त होते ही जाड़े, यानी सर्दी, का प्रभाव वातावरण में साफ़ दिखाई देने लगता है। हवा में ठंडक उतर आती है और प्रकृति का रंग-रूप बदलने लगता है। जाड़े के दिन छोटे होते हैं। कब सुबह हुई और कब शाम ढल गई, इसका एहसास तक नहीं होता। संध्या मानो रात्रि की भूमिका बनकर आती है।

इस समय गाँव का दृश्य भी बदल जाता है। किसानों के कार्य-व्यापार थमने लगते हैं। वे खेतों से लौटकर अपने-अपने घरों की ओर बढ़ जाते हैं, क्योंकि संध्याकालीन ठंडी हवा शरीर को सताने लगती है। धीरे-धीरे अँधेरा छा जाता है, रास्ते सुनसान हो जाते हैं और चारों ओर एक गहरा सन्नाटा फैल जाता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो गाँवों में आदमी ही न हो।

यह वर्णन गाँव में जाड़े के मौसम की एक झलक थी, जहाँ सर्दी के साथ जीवन की गति धीमी पड़ जाती है। अब जंगल की ओर चलें, जहाँ सर्दी केवल मौसम नहीं, बल्कि हर जीव के जीवन को अलग ढंग से आकार देती है।

जंगल में हर जीव एक-सा जीवन नहीं जीता। कुछ प्राणी रोज़ की भागदौड़ में लगे रहते हैं, जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो प्रकृति के संकेत समझकर सही समय पर एक बड़ा फैसला लेते हैं। भालू उन्हीं में से हैं।

जैसे ही मौसम करवट लेता है, भालू को संकेत मिल जाता है—अब रोज़ का भोजन नहीं, बल्कि आने वाले महीनों की तैयारी करनी है। इस समय वे हाइपरफेज़िया नामक अवस्था में प्रवेश करते हैं, जिसमें वे सामान्य से कई गुना अधिक भोजन करते हैं। उद्देश्य पेट भरना नहीं, बल्कि शरीर में अधिकतम ऊर्जा को चर्बी के रूप में जमा करना होता है।

अगर बचपन या टीनएज के दिनों में आप डिस्कवरी चैनल के कार्यक्रम देखा करते थे, तो यह दृश्य आपको ज़रूर याद होगा—तेज़ बहती नदियाँ, ऊपर की ओर छलाँग लगाती सैलमन मछलियाँ और नदी के किनारे खड़े विशाल भालू।

उत्तर अमेरिका और यूरोप के ठंडे इलाकों में रहने वाले भालू—जैसे ग्रिज़ली, अमेरिकी ब्लैक और ब्राउन भालू—सर्दियों से पहले मुख्य रूप से सैलमन और कुछ क्षेत्रों में ट्राउट मछलियों का शिकार करते हैं। ये मछलियाँ ठंडे, तेज़ बहते पानी में पाई जाती हैं और सर्दियों से पहले इनके शरीर में अत्यधिक चर्बी जमा हो जाती है। यही चर्बी भालू के लिए सबसे मूल्यवान ऊर्जा स्रोत होती है।

इसी कारण भालू इन मछलियों के पीछे बेहद सक्रिय दिखाई देते हैं। लेकिन जब वे मछली पकड़ते हैं, तो एक अजीब-सा दृश्य सामने आता है। भालू मछली को उलट-पलटकर देखते हैं और अक्सर मछली का मांस खाने के बजाय केवल वही हिस्से खाते हैं, जिनमें ऊर्जा सबसे अधिक होती है—मछली की खाल, उसके नीचे जमा मोटी चर्बी, पेट के पास का चर्बी-युक्त भाग, रीढ़ के आसपास की परत, दिमाग़ और मादा मछलियों के अंडे। कई बार वे बाकी मांस छोड़ देते हैं।

देखने वाले को लगता है कि यह बर्बादी है। लेकिन भालू जानते हैं—मांस पेट जल्दी भर देता है, जबकि चर्बी महीनों तक जीवन चलाती है। यह बर्बादी नहीं है, यह कुदरत द्वारा दी गई सबसे सही सोच है। भालू जानते हैं कि अगली बार भोजन कई महीनों बाद मिलेगा, इसलिए वे कुछ ही मछलियों पर नहीं रुकते, बल्कि अधिक से अधिक मछलियाँ पकड़ते हैं। वे मांस खाकर पेट जल्दी भरने के बजाय मछली के चर्बी वाले हिस्से पर ध्यान देते हैं, ताकि शरीर में अधिकतम ऊर्जा जमा हो सके।

और फिर एक दिन ऐसा आता है, जब पहली बर्फ़ गिरते ही भालू अचानक ग़ायब हो जाते हैं। न पैरों के निशान, न आवाज़, न कोई हलचल। जंगल में गहरा सन्नाटा छा जाता है।

भालू कभी भी कहीं भी लेटकर नहीं सोते। वे अपनी शीतनिद्रा के लिए अत्यंत सुरक्षित स्थान चुनते हैं—पहाड़ों की गहरी गुफाएँ, बड़े पेड़ों की जड़ों के नीचे बनी खोखली जगहें, या बर्फ़ के नीचे खुद खोदकर बनाए गए मांद। यह मांद ठंड को रोकती है, हवा को काटती है और दुश्मनों से रक्षा करती है।

भालू की शीतनिद्रा कोई गहरी बेहोशी नहीं होती—वे खाते-पीते नहीं, घूमते नहीं, लेकिन पूरी तरह सोए भी नहीं रहते। विज्ञान इसे टॉरपर कहता है: एक तरह की हल्की सुस्ती, जिसमें शरीर धीमा पड़ जाता है, मगर जरा-सी आहट पर भालू तुरंत जाग सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर हमला भी कर सकते हैं।

भालू शीतनिद्रा के दौरान न पेशाब करते हैं, न शौच—फिर भी उनका शरीर पूरी तरह स्वस्थ रहता है। उनका शरीर यूरिया को पुनः उपयोग में ले लेता है; उसे तोड़कर नाइट्रोजन से नए प्रोटीन बनाता है। इसी प्रक्रिया से उनकी मांसपेशियाँ और हड्डियाँ मज़बूत बनी रहती हैं, जबकि जमा की हुई चर्बी धीरे-धीरे ऊर्जा देती रहती है।

इसी बीच समय आगे बढ़ता है। ठंड की कठोरता कम होने लगती है और बसंत का आगमन होता है। बर्फ़ पिघलने लगती है, नदियाँ फिर से बहने लगती हैं और जंगल में जीवन लौट आता है। तभी भालू अपने मांद से बाहर निकलते हैं—धीमे क़दमों से, लेकिन पूरी ताक़त के साथ। चारों ओर बदलते मौसम के साथ जंगल की गतिविधियाँ भी लौटने लगती हैं।

भालू का यह लंबा सोना कोई कहानी नहीं, कोई चमत्कार नहीं और आलस तो बिल्कुल नहीं। यह सही भोजन चुनने, सही हिस्सा खाने और सही समय पर दुनिया से ओझल हो जाने की कला है। एक बार पेट भर लिया, और फिर—महीनों का सुरक्षित, ऊर्जा-बचत वाला सुकून।

प्रकृति कितने सटीक और संतुलित ढंग से काम करती है, इसकी एक झलक हमने भालू के जीवन में देखी। भालू के भोजन से लेकर उसकी शीतनिद्रा तक—हर चरण में प्रकृति की गहरी समझ और समयबद्ध योजना साफ़ दिखाई देती है। सच तो यह है कि यही समझ प्रकृति हर जीव-जंतु के लिए अपनाती है।

जैसा कि हमने जाना है, ग्रिज़ली, अमेरिकी ब्लैक और ब्राउन भालू सर्दियों से पहले सैलमन और कुछ क्षेत्रों में ट्राउट मछलियों का शिकार करते हैं। ठीक उसी समय इन मछलियों के शरीर में अत्यधिक चर्बी जमा हो जाती है, जब भालुओं को उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति की समयानुकूल व्यवस्था है—ऊर्जा वहीं और तभी उपलब्ध कराना, जहाँ और जब उसकी ज़रूरत हो।

इसी प्रकार प्रकृति मनुष्य के लिए भी मौसम के अनुसार भोजन और संसाधन उपलब्ध कराती है। सर्दियों में आलू और शकरकंद जैसे कंद-मूल खूब उगते हैं। आलू कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है और शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है, इसलिए ठंडे इलाकों में यह सदियों से खेतिहर लोगों और मज़दूरों के भोजन का मुख्य हिस्सा रहा है। वहीं शकरकंद प्राकृतिक रूप से मीठा होता है, ज़मीन के भीतर पकता है और शरीर को अंदर से गर्म रखता है। यही कारण है कि सर्द शामों में अलाव के पास शकरकंद भूनकर खाने की परंपरा आज भी जीवित है।

असल बात यह है कि सर्दियों में शरीर अधिक कैलोरी जलाता है और अधिक ऊर्जा की माँग करता है। आलू और शकरकंद, जो ज़मीन के भीतर उगते हैं, ठंड से स्वयं को बचाने के लिए अपने भीतर ऊर्जा संचित करते हैं—और वही ऊर्जा हमारे शरीर को मिलती है। एक पंक्ति में कहें तो, आलू पेट भरता है और शकरकंद शरीर को गरम रखता है।

कभी हमारे खान-पान का रिश्ता मौसम से बहुत गहरा हुआ करता था। गर्मियों में शरीर को ठंडक देने वाले पेय—जैसे सत्तू, शरबत और सिकंजी; बरसात में हल्का और सुपाच्य भोजन—जैसे कद्दू, लौकी और तोरी; तथा सर्दियों में ऊर्जा और गर्मी देने वाले खाद्य पदार्थ—जैसे आलू, शकरकंद और तिल-गुड़—सब कुछ ऋतु के अनुसार होता था। आज हम उस समझ से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं, जबकि पुराने समय में लोग जानते थे कि मौसम के साथ भोजन बदलना ही स्वस्थ जीवन की असली कुंजी है।

आज भी बुज़ुर्ग बताया करते हैं कि उनके समय में लोग सर्दियों में अधिक परिश्रम करते थे। शिल्पकार और पेशेवर लोग रात देर तक काम करते रहते थे।

बचपन और टीनएज के दिनों में मुझे सर्दी से जुड़े अलग-अलग अनुभव अधिक हुआ करते थे—जैसे ठंड बढ़ते ही दाँत से दाँत बजने लगते थे और शरीर में कंपन शुरू हो जाता था। उन दिनों धूप न हो तो लोग आग जलाकर रजाई में दुबक जाते थे।

और फिर आता था बसंत—मार्च और अप्रैल के महीने। न अधिक ठंड, न अधिक गर्मी। पेड़ों पर नई-नई कोपलें फूट पड़तीं, खेतों में फसलें पकने लगतीं और पूरे वातावरण में एक नई ताज़गी फैल जाती थी।

ठीक वैसे ही जैसे बसंत भालुओं को महीनों की शीतनिद्रा के बाद जीवन की नई शुरुआत देता है, वैसे ही यह ऋतु मनुष्य के लिए भी आशा, ऊर्जा और संतुलन का संदेश लेकर आती है।

प्रकृति कभी गलती नहीं करती। वह हर जीव को, हर मौसम में, वही देती है—जो उसके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है।

क्या सच में कुछ मेंढक मरने के बाद फिर ज़िंदा हो जाते हैं?

क्या सच में कुछ मेंढक मरने के बाद फिर ज़िंदा हो जाते हैं?

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

अक्सर हम सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर सुनते या पढ़ते हैं कि कुछ मेंढकों की प्रजातियाँ ऐसी होती हैं, जो मरने के बाद फिर ज़िंदा हो जाती हैं। यह बात सुनने में जितनी रहस्यमयी लगती है, सच्चाई उतनी ही वैज्ञानिक और रोचक है।

असल में, ये मेंढक कभी मरते ही नहीं। वे बस ऐसी अस्थायी निष्क्रिय अवस्था में चले जाते हैं, जहाँ शरीर की गतिविधियाँ इतनी धीमी हो जाती हैं कि देखने वाले को वे मरे हुए प्रतीत होते हैं।

आइए, ऐसी ही तीन प्रसिद्ध मेंढक प्रजातियों को समझते हैं।

1. वुड फ्रॉग (Wood Frog)

वैज्ञानिक नाम: Rana sylvatica

वुड फ्रॉग ठंडे इलाक़ों में पाया जाने वाला एक असाधारण मेंढक है।

इसके साथ क्या होता है?

  • कड़ी सर्दी में इसका शरीर लगभग पूरी तरह जम जाता है
  • साँस लेने की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है
  • हृदय की धड़कन अस्थायी रूप से रुक जाती है
  • शरीर के भीतर मौजूद पानी बर्फ का रूप ले लेता है

इस अवस्था में यह मेंढक मरा हुआ नहीं होता, बल्कि उसका शरीर कुछ समय के लिए लगभग निष्क्रिय हो जाता है।

यह सुरक्षित कैसे रहता है?

  • इसके शरीर में प्राकृतिक रूप से शर्करा (glucose) जमा हो जाती है
  • यह शर्करा कोशिकाओं को जमने से होने वाले नुकसान से बचाती है
  • तापमान बढ़ने पर शरीर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे सामान्य होने लगती हैं

इसलिए यह कहना सही है कि
👉 मेंढक फिर से जीवित नहीं होता, बल्कि उसका शरीर दोबारा सक्रिय हो जाता है।

2. ऑस्ट्रेलियन रेज़रेक्शन फ्रॉग (Australian Resurrection Frog)

अन्य नाम: Water-holding Frog

यह मेंढक अत्यधिक गर्म और सूखे क्षेत्रों में पाया जाता है।

इसकी खास रणनीति

  • लंबे सूखे के समय यह ज़मीन के भीतर चला जाता है
  • अपने शरीर के चारों ओर एक सख़्त परत (cocoon) बना लेता है
  • इस दौरान शरीर की गतिविधियाँ बहुत कम हो जाती हैं
  • यह महीनों, यहाँ तक कि वर्षों तक बिना खाए-पीए जीवित रह सकता है

बारिश होने पर

  • मिट्टी में नमी लौट आती है
  • शरीर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे सक्रिय होने लगती हैं
  • मेंढक ज़मीन से बाहर निकल आता है

लोगों को लगता है कि यह “मरकर ज़िंदा” हुआ है, जबकि असल में यह गहरी निष्क्रिय अवस्था (aestivation) से बाहर आता है।

3. अफ़्रीकी बुल फ्रॉग (African Bullfrog)

अन्य नाम: Pixie Frog

यह आकार में बड़ा और काफ़ी सहनशील मेंढक होता है।

यह क्या करता है?

  • सूखे के समय ज़मीन के भीतर छिप जाता है
  • अपनी सूखी त्वचा से एक प्रकार का प्राकृतिक कवच बना लेता है
  • शरीर की ऊर्जा की खपत बहुत कम कर देता है

अनुकूल परिस्थितियाँ मिलते ही

  • यह कवच टूट जाता है
  • शरीर की गतिविधियाँ सामान्य होने लगती हैं
  • मेंढक फिर से सक्रिय जीवन में लौट आता है

यहाँ भी मृत्यु नहीं, बल्कि ऊर्जा बचाने की अवस्था होती है।

🧠 वैज्ञानिक सच्चाई

इन तीनों मेंढकों में एक बात समान है—

  • ये कभी मरते नहीं
  • बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में शरीर की गतिविधियों को अस्थायी रूप से बहुत धीमा या स्थिर कर लेते हैं
  • ताकि जीवन सुरक्षित रह सके

विज्ञान में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे—
Freeze Tolerance, Aestivation और Cryptobiosis

निष्कर्ष

सोशल मीडिया पर फैलने वाली “मरकर ज़िंदा होने” की कहानियाँ असल में प्रकृति की अद्भुत जीवन-रक्षा रणनीतियों की गलत या अधूरी व्याख्या हैं।

यह लेख हमें यह समझाता है कि—
जीवित रहना सिर्फ़ चलने-फिरने का नाम नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर शरीर का रुक जाना भी जीवन की ही एक समझदारी है।

कुछ भी न दिखना: अंधेपन का वो अनुभव जो आप कभी समझ नहीं पाएंगे

कुछ भी न दिखना: अंधेपन का वो अनुभव जो आप कभी समझ नहीं पाएंगे

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

अक्सर हम न दिखने को अँधेरे से जोड़कर समझने की कोशिश करते हैं,
लेकिन आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि जब किसी इंसान की आँखें न हों—या किसी दुर्घटना के कारण उसकी आँखें नष्ट हो जाएँ—तो उसे अँधेरा नहीं, बल्कि कुछ भी नहीं दिखता।

अब आप सोच सकते हैं—
“कुछ भी न दिखना” आखिर होता क्या है?
वह अनुभव कैसा होता होगा?

तो चलिए, इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक सच को समझते हैं।

वैज्ञानिक रूप से देखें तो देखना सिर्फ़ आँखों का काम नहीं होता।
आँखें तो बस बाहर की रोशनी को पकड़ने का ज़रिया हैं।

असल काम होता है दिमाग़ में।

जब रोशनी आँखों में प्रवेश करती है, तो रेटिना उसे विद्युत संकेतों में बदल देता है।
ये संकेत ऑप्टिक नर्व के ज़रिये दिमाग़ के विज़ुअल कॉर्टेक्स तक पहुँचते हैं।
यहीं जाकर “दिखना” नाम का अनुभव पैदा होता है।

अब ज़रा सोचिए—
अगर आँखें ही न हों,
या ऑप्टिक नर्व पूरी तरह नष्ट हो जाए,
तो दिमाग़ तक कोई संकेत पहुँचता ही नहीं।

और जब कोई संकेत नहीं पहुँचता,
तो दिमाग़ के पास
न अँधेरा बनाने का कारण होता है,
न उजाला।

इसीलिए ऐसा व्यक्ति अँधेरा नहीं देखता—
क्योंकि अँधेरा भी अपने आप में एक दृश्य अनुभव है।

वह “कुछ नहीं” देखता है,
क्योंकि वहाँ देखने की प्रक्रिया ही समाप्त हो चुकी होती है।

यही वजह है कि “कुछ भी न दिखना”
अँधेरे से भी अलग अनुभव होता है—
यह दृश्य का अभाव है,
दृश्य नहीं।

अब सवाल उठता है—
“कुछ भी न दिखना” आखिर होता क्या है?

इसे समझना थोड़ा कठिन है,
क्योंकि हमारा दिमाग़ हमेशा
या तो उजाले की कल्पना करता है,
या अँधेरे की।

लेकिन “कुछ भी न दिखना”
इन दोनों से अलग होता है।

“कुछ भी न दिखना”
ऐसा अनुभव है
जिसे न रंगों से समझाया जा सकता है,
न अँधेरे से,
न उजाले से।

न वहाँ काला रंग होता है,
न सफ़ेदी,
न कोई खालीपन।

बस… दृश्य की अनुपस्थिति।

जिस तरह आप इस समय
अपने सिर के पीछे कुछ नहीं देख रहे,
लेकिन आपको वहाँ “अँधेरा” भी नहीं दिख रहा—
ठीक वैसा ही।

उस व्यक्ति के लिए
यह अनुभव ज़रूरी नहीं कि डरावना हो,
क्योंकि डर भी तभी पैदा होता है
जब कुछ देखने या खोने का एहसास हो।

उसके लिए दुनिया
आवाज़ों, स्पर्श, गंध और यादों से बनती है—
न कि दृश्यों से।

इसलिए “कुछ भी न दिखना”
किसी असीम अँधेरे में खो जाना नहीं,
बल्कि एक ऐसा संसार है
जहाँ देखने की अवधारणा
मौजूद ही नहीं होती।

शादी की महफ़िल: रसगुल्ले की गिनती से बुफे की भेड़चाल तक

शादी की महफ़िल: रसगुल्ले की गिनती से बुफे की भेड़चाल तक

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आप सभी ने बचपन की यादों से जुड़े तमाम किस्से-कहानियाँ तो सुनी ही होंगी,
पर आज मैं रोशनी डालने जा रहा हूँ उन्हीं यादों से जुड़े एक ख़ास पहलू पर—और वह पहलू है शादियों का खाना और उसका माहौल।

याद आता है वह समय, जब शादी का खाना अक्सर टेबल-कुर्सियों पर होता था और पत्तल-दोनों पर परोसा जाता था। उन दिनों हम सभी बचपन के दोस्त शादी समारोह में एक साथ पहुँच जाते थे—बिना मम्मी-पापा को ज़्यादा डिस्टर्ब किए।
पता नहीं क्यों, उन दिनों का संगीत एक अलग ही माहौल बना देता था। जैसे ही हम वहाँ पहुँचने वाले होते थे, दूर से ही शादी के फंक्शन में बजता हुआ संगीत सुनाई देने लगता था—

“इश्क़ में जब जी घबराया,
दूरियाँ दिल सह नहीं पाया…”

आपके बचपन में भले ही कोई और गीत बजते होंगे, लेकिन मेरे बचपन में तो कुछ ऐसे ही गीत उन दिनों बजते थे। 😄
साथ ही उस दौर की पहचान बने कुछ अलग वाइब वाले गीत भी गूँजते रहते थे, जैसे—

“जागे-जागे रहते थे, खोये-खोये रहते थे,
करते थे प्यार की बातें…”

हम सभी दोस्त कुर्सियों पर बैठ जाते थे और टेबल पर पत्तल-दोने सजने लगते थे, जिन पर खाना परोसा जाने वाला होता था। वह इंतज़ार भी इंतज़ार जैसा नहीं लगता था, क्योंकि वहाँ मधुर संगीत लगातार बजता रहता था—

“दैया दैया दैया रे, दैया दैया दैया रे,
आशिक़ मेरे, मैंने तुझसे प्यार किया रे…”

हम दोस्तों के बीच वहाँ खाने को लेकर जो शुरुआती गपशप होती थी, वह कुछ इस तरह की होती थी—
“इनके यहाँ रसगुल्ले हैं!”

और अगर किसी ऐसी शादी में जाते थे, जहाँ गुलाब जामुन दिख जाते, तो कहते—
“इनके यहाँ गुलाब जामुन हैं!”

और कभी-कभी अगर खाने में दही-बड़े की जगह बूंदी का रायता कर दिया जाता, तो हम एक-दूसरे से कहते—
“अरे यार, मज़ा नहीं आया… दही-बड़े होने चाहिए थे!”

कभी-कभी माहौल ऐसा होता था कि हम बच्चे डरते भी थे—कहीं हमें बच्चा समझकर सिर्फ़ एक ही रसगुल्ला या गुलाब जामुन न दे दिया जाए। इसलिए हम कमर सीधी करके बैठ जाते थे, ताकि दो पीस मिल जाएँ।

पर थोड़ी देर बाद पता चलता—अरे, यहाँ तो सबको ही दो दिए जा रहे हैं। यानी समझ आता कि जिनके यहाँ शादी है, उन्होंने सभी के लिए दो-दो पीस रखवाए हैं।

उन दिनों खाने में जो स्वाद होता था, वह आज के बुफे में कहाँ मिलता है!

याद आता है वह समय, जब कद्दू की सब्ज़ी बेहद पतली बनती थी—अगर जल्दी-जल्दी न खाई जाए, तो वह पत्तल से बाहर तक बहने लगती थी। और उस कद्दू का स्वाद… क्या खूब होता था!

और जब किसी-किसी शादी में कद्दू कुछ ज़्यादा ही पतला हो जाता था—शायद बहुत ज़्यादा गरम होने की वजह से—तब पंगत खिलाने वाले लोग एक-दूसरे को सलाह देते थे—
“कद्दू सबसे आख़िर में परोसियो, पहले पूड़ी करवा दो!” 😄

याद आता है बचपन का एक ख़ास पल—एक शादी समारोह, जो हमारे घर से कुछ ही दूर, मिसूरिया धर्मशाला में था। जिनके यहाँ शादी थी, उन्होंने बहुत ज़्यादा लोगों को न्योता दे दिया था। हम सभी दोस्त वहाँ पहुँचे और खड़े रह गए।
वहाँ इतनी भारी भीड़ थी कि हम सबने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। शादी समारोह, शादी समारोह जैसा नहीं लग रहा था; ऐसा लगता था मानो यहाँ सिर्फ़ खाना ही खिलाया जा रहा हो।

कठिन परिस्थिति को देखते हुए पंगत खिलाने वालों ने अपने हिसाब से एक अलग सिस्टम बना लिया था—अगर एक-दो लोग भी उठने लगते, तो सबकी पत्तलें उठा ली जाती थीं; यानी टेबल से उठाकर सीधे कंटेनर में डाल दी जाती थीं, और फिर दूसरी पंगत के लिए पत्तलें लगाई जाने लगती थीं।

हम सभी बच्चे काफ़ी देर से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उस कार्यक्रम में न रसगुल्ला था, न गुलाब जामुन; मिठाई में सिर्फ़ कपासी रंग की बेसन की बर्फ़ी शामिल थी।
जैसे ही हम सब दोस्त टेबल-कुर्सियों पर बैठे और सुकून से खाना खाने लगे, हम यह भूल गए कि हमारे साथ भी वही होने वाला है, जो बाक़ी सभी के साथ हो रहा था।

दूर से कुछ लोग उठे और उनकी पत्तलें उठनी शुरू हुईं—तो हमने जल्दी-जल्दी अपनी बर्फ़ी उठा ली। पेट तो नहीं भरा, लेकिन वहाँ ऐसा पल आया कि हम सब दोस्त खुलकर हँस पड़े।

हुआ यूँ कि मेरे चाचा का लड़का हमसे कुछ दूर बैठा था। वह खाने में इतना मग्न था कि उसे ज़रा भी ख़बर नहीं रही कि पत्तल उठाने वाले अब उसके क़रीब आ पहुँचे हैं। जैसे ही उसकी पत्तल उठी, उसने अफ़रा-तफ़री में ऐसी फुर्ती दिखाई कि अपनी उठती पत्तल में से ही बर्फ़ी झपट ली। 😁

वह बर्फ़ी भी कोई मामूली नहीं थी—उसका कपासी रंग ही उसे अपने आप में ख़ास बना रहा था।

ख़ैर, यह तो थी टेबल-कुर्सियों पर खाने की बात। समय के साथ कुछ लोगों ने शादियों में बुफे सिस्टम अपनाना शुरू कर दिया, और देखते-ही-देखते इसका क्रेज़ बढ़ता चला गया। उस दौर में हम इसे ‘बफ़र सिस्टम’ कहा करते थे।
बचपन में यह हमें बेहद आकर्षक लगता था—क्योंकि वहाँ सब कुछ बिना गिनती के मिलता था।

पर सच्चाई यह है कि वही कुर्सी-टेबल पर बैठकर पत्तल-दोनों पर परोसा जाने वाला खाना खाने का अनुभव ही सबसे बेहतरीन था। मिठाई इंसान कितनी खाता है?—एक, दो, तीन या ज़्यादा से ज़्यादा पाँच पीस। और अपनी बात करूँ, तो मैं दो पीस से ज़्यादा नहीं खा पाता।
उस समय का खाना इतना स्वादिष्ट होता था कि उसे खाकर मन को जो सुकून मिलता था, वैसा सुकून आज के बुफे में परोसे गए तमाम देसी-विदेशी आइटम भी नहीं दे पाते।

पत्तल-दोनों पर परोसे जाने वाले खाने का स्वाद ही कुछ और था। लोग सुकून से बैठकर खाते थे, प्यार से खिलाया जाता था… और नब्बे के दशक के गाने बजते रहते थे—वही अनुभव सचमुच बेहतरीन था।

उन दिनों किसी-किसी की शादी में बफ़र सिस्टम सिर्फ़ दिखावे का होता था। मिठाई के स्टॉल पर एक ख़ास आदमी खड़ा कर दिया जाता था, जिसे सख़्त हिदायत होती थी कि बच्चों को सिर्फ़ एक रसगुल्ला या गुलाब जामुन देना—उसके बाद नहीं।
बाहर से देखने पर सब कुछ खुला-खुला और भरपूर लगता था, लेकिन भीतर से गिनती और कंजूसी का पूरा हिसाब चलता था।

यहीं से शादियों के खाने और महफ़िल सजाने की असली तस्वीर सामने आती है। यह ऐसी स्थिति है कि यहाँ बड़े दिल वाला भी ग़लत ठहर सकता है और छोटे दिल वाला भी।

आजकल दिखावे की इस कदर महफ़िल सजाई जा रही है कि हर जगह भेड़चाल के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। कोई शख़्स अमीरी झाड़ने के लिए शादियों में अलग-अलग वैरायटी की तमाम मिठाइयाँ और दुनिया भर के स्वादिष्ट आइटम सजा देता है—मानो ज़रूरत नहीं, बल्कि दिखावे की होड़ चल रही हो।

और लोगों का भी क्या कहना! वे इन्हें ऐसे खाते हैं, मानो खाकर कोई बहुत बड़ा कारनामा कर रहे हों। कभी कोई आइटम पूरा खा लिया जाएगा, तो कभी उसे यूँ ही छोड़ दिया जाएगा।
और अगर नॉनवेज की व्यवस्था भी हो, तो वहाँ यह पागलपन और ज़्यादा खुलकर सामने आ जाता है।

चिकन-मटन से बनी तमाम डिशें सजाई जाती हैं, और अब तो आलम यह है कि लगभग जानवर के आकार में दिखाई देने वाला भुना मटन भी सजा दिया जाता है—सिर्फ़ इसलिए कि इससे पहले किसी अमीर आदमी ने अपनी शादी में ऐसा किया था।

नॉनवेज में इस तरह का रूप दिखाना न तो मटन की किसी डिश में सही है और न ही चिकन में—यानी मांस को इस अंदाज़ में परोसना कि देखकर जानवर की पूरी छवि का एहसास हो जाए। यह सब हरकतें पागलपन के सिवा कुछ नहीं हैं। खाने में सजावट के नाम पर ऐसी प्रस्तुति, जो जानवर की पूरी छवि उभार दे, स्वाभाविक रूप से असहज ही लगती है।

नॉनवेज खाते वक्त इंसान यही चाहता है कि उसके सामने सिर्फ़ खाने का पीस हो, न कि ऐसा रूप, जिसे देखकर वही जानवर याद आ जाए—क्योंकि ऐसा दृश्य अधिकांश लोगों को अच्छा नहीं लगता।

कुछ लोग नॉनवेज के बेहद शौकीन होते हैं; उन्हें इन बातों से बिल्कुल फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कई वेजिटेरियन ही नहीं, बल्कि बहुत-से नॉनवेजिटेरियन लोगों को भी ऐसी प्रस्तुति गहरी असहजता में डाल देती है—बल्कि उनके लिए यह अनुभव बेहद अप्रिय हो जाता है।

तो फिर सवाल यह उठता है कि भेड़चाल का हिस्सा क्यों बना जाए? क्यों न ऐसा रास्ता चुना जाए, जिसमें नॉनवेजिटेरियन और वेजिटेरियन—दोनों ही सहज महसूस करें और किसी की भावनाएँ आहत न हों।

दुबई या मिडिल ईस्ट के अन्य देशों के खान-पान की वीडियो देखी जाएँ, तो यह साफ़ समझ में आता है कि वहाँ ऐसी प्रस्तुतियाँ उनकी स्थानीय सजावट और संस्कृति का हिस्सा हैं। लेकिन कुछ लोगों ने उन्हीं देशों की नकल करते हुए भारत में भी शेखी बघारनी शुरू कर दी है। उसी की देखा-देखी यहाँ भी लोग वही भेड़चाल वाली हरकतें दोहराने लगे हैं।

मेरा लोगों से बस यही कहना है—उनकी नकल न की जाए। वे वे हैं, और हम हम।

और आजकल तो यह भी देखने को मिल रहा है कि दिल्ली की जामा मस्जिद की मुख्य सड़क—जो स्ट्रीट फूड के मामले में काफ़ी मशहूर है—वहाँ कई लोग दुबई के शेखों जैसा गेटअप अपनाकर, खुद को ‘हबीबी’ की तरह पेश करते हुए, ‘मोहब्बत का शरबत’ बेच रहे हैं। उनकी हरकतें देखकर कहीं से भी यह नहीं लगता कि वे खुद को किसी शेख से कमतर समझते हों। इसी वजह से एक शख़्स ने उनकी वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दी, जिसमें वह यह कहते हुए नज़र आता है—

“भाई, ये जो लोग ‘हबीबी’ बने फिर रहे हैं न, इन्हें शेख अपनी ख़ाज खुजवाने के लिए भी न रखें!”

ख़ैर, यह उस शख़्स का कहना है। मेरा कहना बस इतना है कि भारत के लोगों के डीएनए में खाने को लेकर एक अलग ही नज़रिया है। इसलिए यहाँ ऐसी कोई भी बाहरी परंपरा नहीं अपनाई जानी चाहिए, जो लोगों को असहज करे या पसंद न आए।

क्योंकि अगर देश-विदेश पर नज़र डालें, तो भोजन को लेकर ऐसी-ऐसी परंपराएँ देखने को मिलती हैं, जिन्हें हम भारतीय शायद देखना भी न चाहें। इसलिए मेरा सुझाव बस इतना-सा है—नॉनवेज डिशों का रूप वही रहने दिया जाए, उसी रूप और आकार में, जो यहाँ के लोगों को सहज, स्वीकार्य और सामान्य लगे।

वरना दुनिया भर की सभ्यताएँ इतनी अलग-अलग हैं कि कई बार उन्हें देखकर इंसान सिर पकड़कर बैठ जाए। इसलिए किसी भी चलन को अपनाने से पहले लोगों की सोच, भावना और सहजता का ध्यान रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।