याद आता है वह बचपन का सुनहरा दौर, जब घर के उस कमरे में, जहाँ डेक रखा होता था, उसके पास बैठकर हर कैसेट का कवर बड़े गौर से देखा करता था—उसकी चमकदार तस्वीरें, रंग-बिरंगे नाम और बड़े-बड़े अक्षर। हर कवर एक नई दुनिया का दरवाज़ा खोल देता था। उनमें से एक कैसेट मेरे लिए खास थी। बाएँ कोने में उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब और दाएँ कोने में जावेद अख्तर साहब—दोनों के मुस्कान भरे चेहरे। और नीचे बीच में बड़े अक्षरों में सिर्फ़ एक शब्द लिखा था—संगम। वही उस एल्बम का नाम था।
बचपन में मैं हर तरह का संगीत सुनता था—फिल्मी गाने, क़व्वाली, ग़ज़लें, सब कुछ। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और एक लंबे अंतराल के बाद जब उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब की आवाज़ फिर से मेरे कानों में गूँजी, तब जाकर सच्चा एहसास हुआ। यह कोई मामूली आवाज़ नहीं थी। यह रूह की गहराइयों से निकलती हुई, सीधे दिल को छूने वाली, आत्मा को झकझोर देने वाली पुकार थी—एक ऐसी आवाज़ जो शब्दों से परे जाकर भावनाओं को जगा देती थी।
उस समय इंटरनेट तो दूर की बात थी, मोबाइल फ़ोन भी बहुत कम लोगों के पास थे। जानकारी सीमित थी, लेकिन चाहत असीम। फिर आया मुहर्रम का महीना। इस्लामी कैलेंडर की नौवीं तारीख। गली-मोहल्ले में जुलूस निकला। दूर से डीजे की आवाज़ आ रही थी। और अचानक एक क़व्वाली गूँजी—
“इस शाने करम का क्या कहना…”
इतनी कठिन जुगलबंदी, इतनी गहराई और रूह को भीतर तक झकझोर देने वाली वह आवाज़ मैंने इससे पहले कभी नहीं सुनी थी। उस क्षण ऐसा लगा मानो समय ठहर गया हो। उसी पल यह स्पष्ट हो गया कि इस क़व्वाली को इस शान, इस असर और इस आत्मिक शक्ति के साथ कोई और गा ही नहीं सकता।
यहीं से मेरे भीतर एक नई चाह पैदा हुई—नुसरत साहब को और सुनने की, उन्हें और समझने की।
मैं बाज़ार गया, उनका नाम बताया और उनकी कैसेट माँगी—लेकिन ज़्यादातर लोग समझ ही नहीं पाए। वजह साफ़ थी। मैं डबरा में रहता हूँ, और यहाँ बहुत से लोग संगीत तो सुनते हैं, लेकिन कौन-सा गीत किसने गाया या लिखा, यह जानना उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं होता। यह स्वाभाविक भी है—जब ऐसे ही लोग फ़िल्म में “दूल्हे का सेहरा” में कादर ख़ान को देखेंगे, तो उनके लिए यह समझना कठिन होगा कि वास्तविक गायक कौन है। उनके लिए मूल बात केवल यही होती है—आम खाओ, गुठलियाँ मत गिनो।
नुसरत साहब के गीतों का अलग से कोई संग्रह मुझे नहीं मिला, इसलिए मैंने फ़िल्म कच्चे धागे की कैसेट खरीद ली, जिसमें उन्होंने संगीत दिया था और क़व्वाली सहित कई शानदार गीत शामिल थे। उस कैसेट ने मेरे लिए एक नया दरवाज़ा खोल दिया—एक ऐसी दुनिया का, जहाँ संगीत केवल सुना नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है।
फिर टेलीविज़न पर एक नया दौर शुरू हुआ। हर शाम एक तय समय पर फिल्मी गीतों के बीच नुसरत साहब का भी एक गीत आता। मैं हर शाम उसका इंतज़ार करने लगा। वह गीत था—“कोई जाने कोई ना जाने…” केवल एक बार सुन पाना मन को तसल्ली नहीं देता था। दिल कहता—और सुनना है, और गहराई में उतरना है।
उसी समय ज़ी टीवी पर “सा रे गा मा” शुरू हुआ। वह कार्यक्रम उन दिनों एक अलग ही रंग लेकर आया था। पाकिस्तान से कई प्रतियोगी शामिल हुए। उनमें मुसर्रत सबसे खास थे। वे अक्सर उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब के गीत गाते थे। उनकी आवाज़ में वही रूहानी झलक दिखाई देती थी। वह कार्यक्रम और मुसर्रत—दोनों मेरे पसंदीदा बन गए।
उन दिनों मेरा एक दोस्त अपनी बहन के नवजात बेटे के लिए नाम सुझाने की बात करने आया था। उसके पापा ने कहा था कि नाम ‘म’ से शुरू होना चाहिए, क्योंकि बच्चे का जन्म किसी खास रात में हुआ था। मैंने बिना सोचे तुरंत कहा—मुसर्रत।
इस नाम में ‘म’ भी था और ‘रत’ भी—जो ‘रात’ से जुड़ा हुआ था।
जब उसने अपने पिताजी को यह नाम बताया, तो उन्हें यह नाम बेहद पसंद आया। आज भी वह परिवार स्नेहपूर्वक याद करता है कि मुसर्रत का नाम मैंने सुझाया था।
इंटरनेट के बिना उन दिनों बेचैनी चरम पर थी। नुसरत साहब को सुनने के लिए तरसता था। आखिरकार एक ऑल-इन-वन म्यूज़िक प्लेयर खरीदा। उसमें सबसे अधिक उनके ही गीत होते थे। सच कहूँ, उसी प्लेयर ने मुझे नुसरत साहब की दुनिया में पूरी तरह ले जाकर बसाया। मोहल्ले के दोस्तों को जब अपने हाई क्वालिटी ईयरफ़ोन से “आफ़रीन आफ़रीन” सुनाता, तो नुसरत साहब की सरगम की आवाज़ कभी लेफ्ट से गूँजती, तो कभी राइट से उभरती। उस स्टीरियो ध्वनि का जादू ऐसा होता, मानो उनकी आवाज़ चारों ओर फैलकर सीधे रूह को छू रही हो। वे भी सुनकर कह उठते—“नुसरत साहब जैसा कोई नहीं।”
अब केवल बात उस महान शख्स की, जिन्होंने अपनी आवाज़ से पूरी दुनिया को बदल दिया।
सन् 1985। इंग्लैंड का मर्सी आइलैंड। वर्ल्ड ऑफ म्यूज़िक, आर्ट्स एंड डांस उत्सव, जिसका आयोजन मशहूर रॉक कलाकार पीटर गैब्रियल कर रहे थे। लोग हाथों में बीयर लिए रॉक और पॉप पर झूम रहे थे। तभी मंच पर अचानक बदलाव हुआ। सफेद कालीन बिछाई गई। कुर्ता-पायजामा में साज़िंदे चुपचाप बैठ गए। दर्शकों को लगा—शायद कोई साधारण लोक संगीत होगा।
हारमोनियम सधा। सुर उठे।
आठ-दस मिनट बीते।
फिर दो शब्द गूँजे—“अल्लाह हू…”
बस, वहीं से जादू छा गया। शब्दों का अर्थ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन आवाज़ का असर इतना गहरा था कि लोग खड़े होकर झूमने लगे। कुछ की आँखों से आँसू बहने लगे। कुछ आँखें बंद कर उस संगीत में खो गए। जो प्रस्तुति केवल एक घंटे की थी, वह रात के तीन बजे तक चलती रही। वही रात उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान की वैश्विक पहचान की शुरुआत बनी।
आपको शायद हैरानी होगी कि उनका प्रशंसक वर्ग भारत, पाकिस्तान और यूनाइटेड किंगडम से भी ज़्यादा जापान में था। जापानी उन्हें सम्मान से “सिंगिंग बुद्धा” कहते थे। फुकुओका शहर में एक कॉन्सर्ट के दौरान वे “दमादम मस्त कलंदर” गा रहे थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक जापानी महिला रोती हुई उनके पास आई। उसने भावुक स्वर में कहा—
“मैं बहुत तनाव में थी। मैं आत्महत्या करने वाली थी। लेकिन आपकी आवाज़ ने मुझे जीने की वजह दे दी।”
यह केवल एक गायक की आवाज़ नहीं थी। यह रूह की आवाज़ थी—टूटे हुए दिलों को जोड़ने वाली, जीवन की बुझती लौ को फिर से प्रज्वलित करने वाली।
इसी दिव्यता और प्रभाव के कारण दुनिया ने उन्हें “शहंशाह-ए-क़व्वाली” का खिताब दिया। यह कोई साधारण उपाधि नहीं थी—यह प्रेम, श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक थी, जो पूरी दुनिया के श्रोताओं ने उन्हें अपने दिल से दिया था। उनकी आवाज़ ने भाषा, धर्म और सरहदों की सीमाओं को पार कर सीधे रूह को छुआ। यही कारण है कि वे संगीत की दुनिया में अमर हो गए।
एक और वाकया है, जो एक साधारण इंसान और एक महान कलाकार के बीच का अंतर स्पष्ट कर देता है।
फिल्म कच्चे धागे के दौरान, जिसमें मुख्य भूमिका अजय देवगन निभा रहे थे, गीत आनंद बख्शी जी द्वारा लिखे जाने थे और संगीत की जिम्मेदारी उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान साहब के हाथों में थी। इसी सिलसिले में नुसरत साहब पाकिस्तान से मुंबई आए। तय हुआ कि उनकी मुलाकात आनंद बख्शी जी से होगी और दोनों साथ बैठकर गीतों पर काम करेंगे। लेकिन किसी न किसी कारण से यह मुलाकात बार-बार टलती रही।
धीरे-धीरे आनंद बख्शी जी के मन में यह बात घर कर गई—
“नुसरत साहब मुंबई आए हैं, लेकिन मुझसे मिलने नहीं आ रहे। अगर उन्हें गीत चाहिए, तो उन्हें स्वयं आना चाहिए।”
यह एक गलतफहमी थी, लेकिन अहंकार और संकोच ने इस दूरी को और बढ़ा दिया।
एक दिन नुसरत साहब ने अपने साथियों से कहा—
“मुझे बांद्रा ले चलो, आनंद बख्शी जी के घर।”
आनंद बख्शी जी पहली मंजिल पर रहते थे। वहाँ लिफ्ट नहीं थी। सीढ़ियाँ चढ़कर ही ऊपर जाना पड़ता था।
जब आनंद जी को पता चला कि नुसरत साहब आ रहे हैं, तो वे खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए। उन्होंने नीचे देखा—एक कार आकर रुकी। कार से उतरते समय तीन-चार लोग नुसरत साहब को सहारा दे रहे थे। फिर वे धीरे-धीरे, बड़ी कठिनाई से सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
यह दृश्य देखकर आनंद बख्शी जी स्तब्ध रह गए।
उन्हें उसी क्षण यह एहसास हुआ कि नुसरत साहब उनसे मिलने इसलिए नहीं आ सके थे, क्योंकि उन दिनों उनके लिए चलना-फिरना बेहद कठिन हो गया था।
यह सच्चाई समझते ही आनंद जी की आँखें नम हो गईं, और वे खुद को संभाल नहीं पाए—वे रो पड़े।
जैसे ही नुसरत साहब ऊपर पहुँचे, आनंद बख्शी जी अपने भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाए। वे तुरंत आगे बढ़े, उनके चरणों में झुक गए और अपने अहंकार व गलतफहमी के लिए विनम्रता से गहरा पश्चाताप व्यक्त करने लगे।
वह क्षण केवल दो कलाकारों की मुलाकात नहीं था—वह महानता, विनम्रता और सच्चे सम्मान का प्रतीक था।
उस दिन के बाद दोनों महान कलाकारों ने साथ मिलकर ऐसे अमर गीतों की रचना की, जो आज भी भारतीय सिनेमा की अनमोल धरोहर हैं।
एक और वाकया है, सन् 1995 में हॉलीवुड फिल्म डेड मैन वॉकिंग के लिए संगीत तैयार किया जा रहा था। निर्देशक सीन पेन थे। संगीत के लिए एडी वेडर को बुलाया गया। एडी वेडर ने कहा—
“मुझे ऐसी आवाज़ चाहिए, जो केवल गले से नहीं, बल्कि रूह से निकले।”
तब उन्हें नुसरत साहब का नाम सुझाया गया। जैसे ही नुसरत साहब ने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा, एडी वेडर इतने प्रभावित हुए कि रिकॉर्डिंग समाप्त होते ही वे गहरे सम्मान के साथ उनके सामने झुक गए।
यह केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं था—यह एक रूहानी आवाज़ के प्रति आत्मा से निकला हुआ समर्पण था।
आज जब अपने ही देश के कुछ गायक उनके ख़िलाफ़ ज़हर उगलते हैं, तो दिल में गहरा अफ़सोस होता है। वे ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो संगीत पर केवल उन्हीं का अधिकार हो।
पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि नुसरत साहब द्वारा गाई गई क़व्वालियों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करके उनके बारे में भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है।
हाल ही में एक क्लिप वायरल हुई—
“कुछ तो सोचो मुसलमान हो तुम, काफ़िरों को ना घर में बिठाओ…”
पहली नज़र में यह पंक्ति सुनकर गलतफहमी होना स्वाभाविक है। शब्दों का सतही अर्थ अक्सर मन में भ्रम पैदा कर देता है। लेकिन जब आप यूट्यूब पर जाकर ‘साथ देने का वादा किया है’ शीर्षक वाली इसी क़व्वाली को पूरी तरह सुनते हैं, तब इसका वास्तविक भाव और गहराई सामने आती है। ज़रा इन पंक्तियों पर गौर फ़रमाइए—
साथ देने का वादा किया है
जान-ए-जां अपना वादा निभाओ
यूँ ना छोड़ो मुझे रास्ते में
दो कदम तो मेरे साथ आओ
कुछ तो सोचो मुसलमान हो तुम
काफ़िरों को ना घर में बिठाओ
लूट लेंगे ये ईमान हमारा
अपने चेहरे से गेसू हटाओ
मेरी तुरबत पे क्यों रो रहे हो
नींद आई है मुश्किल से मुझको
कब्र में चैन से सो रहा हूँ
छींटे देकर ना मुझको जगाओ
चारागर, मैं हूँ बीमार ऐ फ़ुरक़त
क्यों उठाते हो बेकार ज़हमत
करना चाहो जो मेरा मदावा
ढूँढ़कर मेरे दिलबर को लाओ
जब वो देखेंगे मय्यत तुम्हारी
ऐ फ़ना उनको अफ़सोस होगा
हो तो मुमकिन तो अपने ख़ुदा से
थोड़ी-सी ज़िंदगी माँग लाओ
यह क़व्वाली किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक आशिक़ के टूटे हुए दिल की पुकार है। यह उस प्रेमी की कहानी है, जिसकी महबूबा ने साथ निभाने का वादा किया, लेकिन उसे अधूरा छोड़ दिया। वह स्वयं को बीमार बताता है—ऐसी बीमारी से, जिसका इलाज केवल उसका ‘दिलबर’ है।
जिस शब्द पर सबसे अधिक आपत्ति की जाती है, वह है—‘काफ़िर’। लेकिन सूफ़ी काव्य और उर्दू शायरी में ‘काफ़िर’ शब्द का प्रयोग अक्सर धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक अर्थ में होता है। यहाँ ‘काफ़िर’ उस महबूबा का रूपक है, जिसकी खूबसूरती और बेरुख़ी आशिक़ का ‘ईमान लूट लेती है।’ जब नुसरत साहब गाते हैं—“अपने चेहरे से गेसू हटाओ”—तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आशिक़ अपनी प्रेमिका की ज़ुल्फ़ों की बात कर रहा है, न कि किसी धार्मिक पहचान की।
अब ज़रा इस स्थिति पर विचार कीजिए—यदि आम लोगों को इस क़व्वाली का केवल एक अंश सुनाया जाए, तो स्वाभाविक है कि वे उसी सीमित संदर्भ में अर्थ निकालेंगे। अधूरी जानकारी अक्सर गलत निष्कर्षों को जन्म देती है। ‘काफ़िर’ शब्द का एक अर्थ ‘नास्तिक’ भी है—ऐसा व्यक्ति, जो ईश्वर को नहीं मानता। विभिन्न धर्मों और परंपराओं में ईश्वर की ओर उन्मुख रहने और नास्तिकता से दूर रहने की बात कही गई है। इस संदर्भ में भी यह शब्द घृणा का नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और काव्यात्मक प्रयोग है।
याद आता है ‘आप की अदालत’ का वह प्रसंग, जिसमें तारेक फ़तेह ने कहा था कि ‘काफ़िर’ शब्द का अर्थ समय के साथ विकृत कर दिया गया। कभी यही शब्द सुंदरता के लिए प्रशंसा के रूप में प्रयोग होता था—“क्या काफ़िर हसीना है…”—अर्थात ऐसी सुंदरता, जो व्यक्ति को सम्मोहित कर दे।
लेकिन विडंबना यह है कि जब यही प्रसंग नुसरत साहब की क़व्वाली के संदर्भ में सामने आया, तो बिना पूरी रचना को सुने ही तारेक फ़तेह ने उस पर कठोर टिप्पणी कर दी।
यह भी उल्लेखनीय है कि ‘आप की अदालत’ के उसी एपिसोड में तारेक फ़तेह ने बेबाकी से स्वयं को अदनान सामी से बेहतर गायक तक बताया था—जो अपने आप में एक चौंकाने वाला और दिलचस्प दावा है।
यह अक्सर देखने में आता है कि सार्वजनिक जीवन में कुछ लोग पाकिस्तान या वहाँ के कलाकारों पर तीखी टिप्पणियाँ करके सुर्खियाँ बटोरने का प्रयास करते हैं। लेकिन अधूरी जानकारी के आधार पर दिया गया कोई भी बयान न तो निष्पक्ष होता है और न ही वह कलाकार के साथ न्याय कर पाता है।
नुसरत साहब ने लगभग हर धर्म से जुड़े धार्मिक गीत गाए हैं और यहाँ तक कि हज़रत बुल्ले शाह, अमीर खुसरो और अन्य महान सूफ़ी संतों के कलाम गाकर प्रेम, एकता और आध्यात्मिकता का संदेश पूरी दुनिया तक पहुँचाया है।
सूफ़ी और उर्दू शायरी में—
मुसलमान का अर्थ होता है—सच्चा प्रेमी
काफ़िर का अर्थ होता है—महबूब की खूबसूरती
“काफ़िर हुस्न”, “काफ़िर निगाहें” और “काफ़िर अदाएँ”—यह धार्मिक नहीं, प्रेम की तीव्रता का प्रतीक है। पूरी क़व्वाली में प्रेमी महबूब से वादा निभाने की बात करता है, जुदाई के दर्द में तड़पता है, और अंत में कहता है—“जब वो देखेंगे मय्यत तुम्हारी, ऐ फ़ना, उनको अफ़सोस होगा…”
यह धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम के प्रतीक हैं।
सूफ़ी परंपरा में इश्क़ दो प्रकार का होता है—
इश्क़-ए-मजाज़ी (मानव से प्रेम)
इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वर से प्रेम)
दोनों के लिए एक ही भाषा, एक ही प्रतीक प्रयुक्त होते हैं।
इसी संदर्भ में अमीर खुसरो की प्रसिद्ध रचना “छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके” को भी समझना चाहिए। “छाप तिलक” का अर्थ बाहरी पहचान से है—जैसे सामाजिक पहचान। सूफ़ी दर्शन के अनुसार, जब साधक भक्ति या प्रेम की उच्चतम अवस्था तक पहुँच जाता है, तो वह इन बाहरी प्रतीकों की परवाह नहीं करता। प्रेम की उस अवस्था में केवल समर्पण शेष रह जाता है। इसका अर्थ किसी धर्म या परंपरा को त्यागना नहीं, बल्कि बाहरी प्रतीकों की परवाह से ऊपर उठना है।
आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोग पूरी रचना को नहीं सुनते। केवल दस या पंद्रह सेकंड का क्लिप देखकर निष्कर्ष निकाल लेते हैं।
लेकिन सच्चाई यह है—
नुसरत साहब का संगीत कभी विभाजन का नहीं, बल्कि एकता का माध्यम था।
उन्होंने कभी किसी के खिलाफ़ एक शब्द नहीं कहा।
उनकी आवाज़ ने पूरी दुनिया को जोड़ा।
उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान केवल एक गायक नहीं थे—
वे रूह की आवाज़ थे।
और रूह की आवाज़ कभी नहीं मरती।
वह आज भी गूँज रही है।
वह अमर है।
और सदियों तक गूँजती रहेगी।