क्या सच में कुछ मेंढक मरने के बाद फिर ज़िंदा हो जाते हैं?
Guidanceअक्सर हम सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर सुनते या पढ़ते हैं कि कुछ मेंढकों की प्रजातियाँ ऐसी होती हैं, जो मरने के बाद फिर ज़िंदा हो जाती हैं। यह बात सुनने में जितनी रहस्यमयी लगती है, सच्चाई उतनी ही वैज्ञानिक और रोचक है।
असल में, ये मेंढक कभी मरते ही नहीं। वे बस ऐसी अस्थायी निष्क्रिय अवस्था में चले जाते हैं, जहाँ शरीर की गतिविधियाँ इतनी धीमी हो जाती हैं कि देखने वाले को वे मरे हुए प्रतीत होते हैं।
आइए, ऐसी ही तीन प्रसिद्ध मेंढक प्रजातियों को समझते हैं।
1. वुड फ्रॉग (Wood Frog)
वैज्ञानिक नाम: Rana sylvatica
वुड फ्रॉग ठंडे इलाक़ों में पाया जाने वाला एक असाधारण मेंढक है।
इसके साथ क्या होता है?
- कड़ी सर्दी में इसका शरीर लगभग पूरी तरह जम जाता है
- साँस लेने की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है
- हृदय की धड़कन अस्थायी रूप से रुक जाती है
- शरीर के भीतर मौजूद पानी बर्फ का रूप ले लेता है
इस अवस्था में यह मेंढक मरा हुआ नहीं होता, बल्कि उसका शरीर कुछ समय के लिए लगभग निष्क्रिय हो जाता है।
यह सुरक्षित कैसे रहता है?
- इसके शरीर में प्राकृतिक रूप से शर्करा (glucose) जमा हो जाती है
- यह शर्करा कोशिकाओं को जमने से होने वाले नुकसान से बचाती है
- तापमान बढ़ने पर शरीर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे सामान्य होने लगती हैं
इसलिए यह कहना सही है कि
👉 मेंढक फिर से जीवित नहीं होता, बल्कि उसका शरीर दोबारा सक्रिय हो जाता है।
2. ऑस्ट्रेलियन रेज़रेक्शन फ्रॉग (Australian Resurrection Frog)
अन्य नाम: Water-holding Frog
यह मेंढक अत्यधिक गर्म और सूखे क्षेत्रों में पाया जाता है।
इसकी खास रणनीति
- लंबे सूखे के समय यह ज़मीन के भीतर चला जाता है
- अपने शरीर के चारों ओर एक सख़्त परत (cocoon) बना लेता है
- इस दौरान शरीर की गतिविधियाँ बहुत कम हो जाती हैं
- यह महीनों, यहाँ तक कि वर्षों तक बिना खाए-पीए जीवित रह सकता है
बारिश होने पर
- मिट्टी में नमी लौट आती है
- शरीर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे सक्रिय होने लगती हैं
- मेंढक ज़मीन से बाहर निकल आता है
लोगों को लगता है कि यह “मरकर ज़िंदा” हुआ है, जबकि असल में यह गहरी निष्क्रिय अवस्था (aestivation) से बाहर आता है।
3. अफ़्रीकी बुल फ्रॉग (African Bullfrog)
अन्य नाम: Pixie Frog
यह आकार में बड़ा और काफ़ी सहनशील मेंढक होता है।
यह क्या करता है?
- सूखे के समय ज़मीन के भीतर छिप जाता है
- अपनी सूखी त्वचा से एक प्रकार का प्राकृतिक कवच बना लेता है
- शरीर की ऊर्जा की खपत बहुत कम कर देता है
अनुकूल परिस्थितियाँ मिलते ही
- यह कवच टूट जाता है
- शरीर की गतिविधियाँ सामान्य होने लगती हैं
- मेंढक फिर से सक्रिय जीवन में लौट आता है
यहाँ भी मृत्यु नहीं, बल्कि ऊर्जा बचाने की अवस्था होती है।
🧠 वैज्ञानिक सच्चाई
इन तीनों मेंढकों में एक बात समान है—
- ये कभी मरते नहीं
- बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में शरीर की गतिविधियों को अस्थायी रूप से बहुत धीमा या स्थिर कर लेते हैं
- ताकि जीवन सुरक्षित रह सके
विज्ञान में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे—
Freeze Tolerance, Aestivation और Cryptobiosis।
निष्कर्ष
सोशल मीडिया पर फैलने वाली “मरकर ज़िंदा होने” की कहानियाँ असल में प्रकृति की अद्भुत जीवन-रक्षा रणनीतियों की गलत या अधूरी व्याख्या हैं।
यह लेख हमें यह समझाता है कि—
जीवित रहना सिर्फ़ चलने-फिरने का नाम नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर शरीर का रुक जाना भी जीवन की ही एक समझदारी है।
लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।
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