मौसम के साथ जीवन: भालू, मनुष्य और प्रकृति की गहरी समझ

मौसम के साथ जीवन: भालू, मनुष्य और प्रकृति की गहरी समझ

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

वर्षा ऋतु के समाप्त होते ही जाड़े, यानी सर्दी, का प्रभाव वातावरण में साफ़ दिखाई देने लगता है। हवा में ठंडक उतर आती है और प्रकृति का रंग-रूप बदलने लगता है। जाड़े के दिन छोटे होते हैं। कब सुबह हुई और कब शाम ढल गई, इसका एहसास तक नहीं होता। संध्या मानो रात्रि की भूमिका बनकर आती है।

इस समय गाँव का दृश्य भी बदल जाता है। किसानों के कार्य-व्यापार थमने लगते हैं। वे खेतों से लौटकर अपने-अपने घरों की ओर बढ़ जाते हैं, क्योंकि संध्याकालीन ठंडी हवा शरीर को सताने लगती है। धीरे-धीरे अँधेरा छा जाता है, रास्ते सुनसान हो जाते हैं और चारों ओर एक गहरा सन्नाटा फैल जाता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो गाँवों में आदमी ही न हो।

यह वर्णन गाँव में जाड़े के मौसम की एक झलक थी, जहाँ सर्दी के साथ जीवन की गति धीमी पड़ जाती है। अब जंगल की ओर चलें, जहाँ सर्दी केवल मौसम नहीं, बल्कि हर जीव के जीवन को अलग ढंग से आकार देती है।

जंगल में हर जीव एक-सा जीवन नहीं जीता। कुछ प्राणी रोज़ की भागदौड़ में लगे रहते हैं, जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो प्रकृति के संकेत समझकर सही समय पर एक बड़ा फैसला लेते हैं। भालू उन्हीं में से हैं।

जैसे ही मौसम करवट लेता है, भालू को संकेत मिल जाता है—अब रोज़ का भोजन नहीं, बल्कि आने वाले महीनों की तैयारी करनी है। इस समय वे हाइपरफेज़िया नामक अवस्था में प्रवेश करते हैं, जिसमें वे सामान्य से कई गुना अधिक भोजन करते हैं। उद्देश्य पेट भरना नहीं, बल्कि शरीर में अधिकतम ऊर्जा को चर्बी के रूप में जमा करना होता है।

अगर बचपन या टीनएज के दिनों में आप डिस्कवरी चैनल के कार्यक्रम देखा करते थे, तो यह दृश्य आपको ज़रूर याद होगा—तेज़ बहती नदियाँ, ऊपर की ओर छलाँग लगाती सैलमन मछलियाँ और नदी के किनारे खड़े विशाल भालू।

उत्तर अमेरिका और यूरोप के ठंडे इलाकों में रहने वाले भालू—जैसे ग्रिज़ली, अमेरिकी ब्लैक और ब्राउन भालू—सर्दियों से पहले मुख्य रूप से सैलमन और कुछ क्षेत्रों में ट्राउट मछलियों का शिकार करते हैं। ये मछलियाँ ठंडे, तेज़ बहते पानी में पाई जाती हैं और सर्दियों से पहले इनके शरीर में अत्यधिक चर्बी जमा हो जाती है। यही चर्बी भालू के लिए सबसे मूल्यवान ऊर्जा स्रोत होती है।

इसी कारण भालू इन मछलियों के पीछे बेहद सक्रिय दिखाई देते हैं। लेकिन जब वे मछली पकड़ते हैं, तो एक अजीब-सा दृश्य सामने आता है। भालू मछली को उलट-पलटकर देखते हैं और अक्सर मछली का मांस खाने के बजाय केवल वही हिस्से खाते हैं, जिनमें ऊर्जा सबसे अधिक होती है—मछली की खाल, उसके नीचे जमा मोटी चर्बी, पेट के पास का चर्बी-युक्त भाग, रीढ़ के आसपास की परत, दिमाग़ और मादा मछलियों के अंडे। कई बार वे बाकी मांस छोड़ देते हैं।

देखने वाले को लगता है कि यह बर्बादी है। लेकिन भालू जानते हैं—मांस पेट जल्दी भर देता है, जबकि चर्बी महीनों तक जीवन चलाती है। यह बर्बादी नहीं है, यह कुदरत द्वारा दी गई सबसे सही सोच है। भालू जानते हैं कि अगली बार भोजन कई महीनों बाद मिलेगा, इसलिए वे कुछ ही मछलियों पर नहीं रुकते, बल्कि अधिक से अधिक मछलियाँ पकड़ते हैं। वे मांस खाकर पेट जल्दी भरने के बजाय मछली के चर्बी वाले हिस्से पर ध्यान देते हैं, ताकि शरीर में अधिकतम ऊर्जा जमा हो सके।

और फिर एक दिन ऐसा आता है, जब पहली बर्फ़ गिरते ही भालू अचानक ग़ायब हो जाते हैं। न पैरों के निशान, न आवाज़, न कोई हलचल। जंगल में गहरा सन्नाटा छा जाता है।

भालू कभी भी कहीं भी लेटकर नहीं सोते। वे अपनी शीतनिद्रा के लिए अत्यंत सुरक्षित स्थान चुनते हैं—पहाड़ों की गहरी गुफाएँ, बड़े पेड़ों की जड़ों के नीचे बनी खोखली जगहें, या बर्फ़ के नीचे खुद खोदकर बनाए गए मांद। यह मांद ठंड को रोकती है, हवा को काटती है और दुश्मनों से रक्षा करती है।

भालू की शीतनिद्रा कोई गहरी बेहोशी नहीं होती—वे खाते-पीते नहीं, घूमते नहीं, लेकिन पूरी तरह सोए भी नहीं रहते। विज्ञान इसे टॉरपर कहता है: एक तरह की हल्की सुस्ती, जिसमें शरीर धीमा पड़ जाता है, मगर जरा-सी आहट पर भालू तुरंत जाग सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर हमला भी कर सकते हैं।

भालू शीतनिद्रा के दौरान न पेशाब करते हैं, न शौच—फिर भी उनका शरीर पूरी तरह स्वस्थ रहता है। उनका शरीर यूरिया को पुनः उपयोग में ले लेता है; उसे तोड़कर नाइट्रोजन से नए प्रोटीन बनाता है। इसी प्रक्रिया से उनकी मांसपेशियाँ और हड्डियाँ मज़बूत बनी रहती हैं, जबकि जमा की हुई चर्बी धीरे-धीरे ऊर्जा देती रहती है।

इसी बीच समय आगे बढ़ता है। ठंड की कठोरता कम होने लगती है और बसंत का आगमन होता है। बर्फ़ पिघलने लगती है, नदियाँ फिर से बहने लगती हैं और जंगल में जीवन लौट आता है। तभी भालू अपने मांद से बाहर निकलते हैं—धीमे क़दमों से, लेकिन पूरी ताक़त के साथ। चारों ओर बदलते मौसम के साथ जंगल की गतिविधियाँ भी लौटने लगती हैं।

भालू का यह लंबा सोना कोई कहानी नहीं, कोई चमत्कार नहीं और आलस तो बिल्कुल नहीं। यह सही भोजन चुनने, सही हिस्सा खाने और सही समय पर दुनिया से ओझल हो जाने की कला है। एक बार पेट भर लिया, और फिर—महीनों का सुरक्षित, ऊर्जा-बचत वाला सुकून।

प्रकृति कितने सटीक और संतुलित ढंग से काम करती है, इसकी एक झलक हमने भालू के जीवन में देखी। भालू के भोजन से लेकर उसकी शीतनिद्रा तक—हर चरण में प्रकृति की गहरी समझ और समयबद्ध योजना साफ़ दिखाई देती है। सच तो यह है कि यही समझ प्रकृति हर जीव-जंतु के लिए अपनाती है।

जैसा कि हमने जाना है, ग्रिज़ली, अमेरिकी ब्लैक और ब्राउन भालू सर्दियों से पहले सैलमन और कुछ क्षेत्रों में ट्राउट मछलियों का शिकार करते हैं। ठीक उसी समय इन मछलियों के शरीर में अत्यधिक चर्बी जमा हो जाती है, जब भालुओं को उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति की समयानुकूल व्यवस्था है—ऊर्जा वहीं और तभी उपलब्ध कराना, जहाँ और जब उसकी ज़रूरत हो।

इसी प्रकार प्रकृति मनुष्य के लिए भी मौसम के अनुसार भोजन और संसाधन उपलब्ध कराती है। सर्दियों में आलू और शकरकंद जैसे कंद-मूल खूब उगते हैं। आलू कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है और शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है, इसलिए ठंडे इलाकों में यह सदियों से खेतिहर लोगों और मज़दूरों के भोजन का मुख्य हिस्सा रहा है। वहीं शकरकंद प्राकृतिक रूप से मीठा होता है, ज़मीन के भीतर पकता है और शरीर को अंदर से गर्म रखता है। यही कारण है कि सर्द शामों में अलाव के पास शकरकंद भूनकर खाने की परंपरा आज भी जीवित है।

असल बात यह है कि सर्दियों में शरीर अधिक कैलोरी जलाता है और अधिक ऊर्जा की माँग करता है। आलू और शकरकंद, जो ज़मीन के भीतर उगते हैं, ठंड से स्वयं को बचाने के लिए अपने भीतर ऊर्जा संचित करते हैं—और वही ऊर्जा हमारे शरीर को मिलती है। एक पंक्ति में कहें तो, आलू पेट भरता है और शकरकंद शरीर को गरम रखता है।

कभी हमारे खान-पान का रिश्ता मौसम से बहुत गहरा हुआ करता था। गर्मियों में शरीर को ठंडक देने वाले पेय—जैसे सत्तू, शरबत और सिकंजी; बरसात में हल्का और सुपाच्य भोजन—जैसे कद्दू, लौकी और तोरी; तथा सर्दियों में ऊर्जा और गर्मी देने वाले खाद्य पदार्थ—जैसे आलू, शकरकंद और तिल-गुड़—सब कुछ ऋतु के अनुसार होता था। आज हम उस समझ से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं, जबकि पुराने समय में लोग जानते थे कि मौसम के साथ भोजन बदलना ही स्वस्थ जीवन की असली कुंजी है।

आज भी बुज़ुर्ग बताया करते हैं कि उनके समय में लोग सर्दियों में अधिक परिश्रम करते थे। शिल्पकार और पेशेवर लोग रात देर तक काम करते रहते थे।

बचपन और टीनएज के दिनों में मुझे सर्दी से जुड़े अलग-अलग अनुभव अधिक हुआ करते थे—जैसे ठंड बढ़ते ही दाँत से दाँत बजने लगते थे और शरीर में कंपन शुरू हो जाता था। उन दिनों धूप न हो तो लोग आग जलाकर रजाई में दुबक जाते थे।

और फिर आता था बसंत—मार्च और अप्रैल के महीने। न अधिक ठंड, न अधिक गर्मी। पेड़ों पर नई-नई कोपलें फूट पड़तीं, खेतों में फसलें पकने लगतीं और पूरे वातावरण में एक नई ताज़गी फैल जाती थी।

ठीक वैसे ही जैसे बसंत भालुओं को महीनों की शीतनिद्रा के बाद जीवन की नई शुरुआत देता है, वैसे ही यह ऋतु मनुष्य के लिए भी आशा, ऊर्जा और संतुलन का संदेश लेकर आती है।

प्रकृति कभी गलती नहीं करती। वह हर जीव को, हर मौसम में, वही देती है—जो उसके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है।

लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।
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