शादी की महफ़िल: रसगुल्ले की गिनती से बुफे की भेड़चाल तक

शादी की महफ़िल: रसगुल्ले की गिनती से बुफे की भेड़चाल तक

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आप सभी ने बचपन की यादों से जुड़े तमाम किस्से-कहानियाँ तो सुनी ही होंगी,
पर आज मैं रोशनी डालने जा रहा हूँ उन्हीं यादों से जुड़े एक ख़ास पहलू पर—और वह पहलू है शादियों का खाना और उसका माहौल।

याद आता है वह समय, जब शादी का खाना अक्सर टेबल-कुर्सियों पर होता था और पत्तल-दोनों पर परोसा जाता था। उन दिनों हम सभी बचपन के दोस्त शादी समारोह में एक साथ पहुँच जाते थे—बिना मम्मी-पापा को ज़्यादा डिस्टर्ब किए।
पता नहीं क्यों, उन दिनों का संगीत एक अलग ही माहौल बना देता था। जैसे ही हम वहाँ पहुँचने वाले होते थे, दूर से ही शादी के फंक्शन में बजता हुआ संगीत सुनाई देने लगता था—

“इश्क़ में जब जी घबराया,
दूरियाँ दिल सह नहीं पाया…”

आपके बचपन में भले ही कोई और गीत बजते होंगे, लेकिन मेरे बचपन में तो कुछ ऐसे ही गीत उन दिनों बजते थे। 😄
साथ ही उस दौर की पहचान बने कुछ अलग वाइब वाले गीत भी गूँजते रहते थे, जैसे—

“जागे-जागे रहते थे, खोये-खोये रहते थे,
करते थे प्यार की बातें…”

हम सभी दोस्त कुर्सियों पर बैठ जाते थे और टेबल पर पत्तल-दोने सजने लगते थे, जिन पर खाना परोसा जाने वाला होता था। वह इंतज़ार भी इंतज़ार जैसा नहीं लगता था, क्योंकि वहाँ मधुर संगीत लगातार बजता रहता था—

“दैया दैया दैया रे, दैया दैया दैया रे,
आशिक़ मेरे, मैंने तुझसे प्यार किया रे…”

हम दोस्तों के बीच वहाँ खाने को लेकर जो शुरुआती गपशप होती थी, वह कुछ इस तरह की होती थी—
“इनके यहाँ रसगुल्ले हैं!”

और अगर किसी ऐसी शादी में जाते थे, जहाँ गुलाब जामुन दिख जाते, तो कहते—
“इनके यहाँ गुलाब जामुन हैं!”

और कभी-कभी अगर खाने में दही-बड़े की जगह बूंदी का रायता कर दिया जाता, तो हम एक-दूसरे से कहते—
“अरे यार, मज़ा नहीं आया… दही-बड़े होने चाहिए थे!”

कभी-कभी माहौल ऐसा होता था कि हम बच्चे डरते भी थे—कहीं हमें बच्चा समझकर सिर्फ़ एक ही रसगुल्ला या गुलाब जामुन न दे दिया जाए। इसलिए हम कमर सीधी करके बैठ जाते थे, ताकि दो पीस मिल जाएँ।

पर थोड़ी देर बाद पता चलता—अरे, यहाँ तो सबको ही दो दिए जा रहे हैं। यानी समझ आता कि जिनके यहाँ शादी है, उन्होंने सभी के लिए दो-दो पीस रखवाए हैं।

उन दिनों खाने में जो स्वाद होता था, वह आज के बुफे में कहाँ मिलता है!

याद आता है वह समय, जब कद्दू की सब्ज़ी बेहद पतली बनती थी—अगर जल्दी-जल्दी न खाई जाए, तो वह पत्तल से बाहर तक बहने लगती थी। और उस कद्दू का स्वाद… क्या खूब होता था!

और जब किसी-किसी शादी में कद्दू कुछ ज़्यादा ही पतला हो जाता था—शायद बहुत ज़्यादा गरम होने की वजह से—तब पंगत खिलाने वाले लोग एक-दूसरे को सलाह देते थे—
“कद्दू सबसे आख़िर में परोसियो, पहले पूड़ी करवा दो!” 😄

याद आता है बचपन का एक ख़ास पल—एक शादी समारोह, जो हमारे घर से कुछ ही दूर, मिसूरिया धर्मशाला में था। जिनके यहाँ शादी थी, उन्होंने बहुत ज़्यादा लोगों को न्योता दे दिया था। हम सभी दोस्त वहाँ पहुँचे और खड़े रह गए।
वहाँ इतनी भारी भीड़ थी कि हम सबने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। शादी समारोह, शादी समारोह जैसा नहीं लग रहा था; ऐसा लगता था मानो यहाँ सिर्फ़ खाना ही खिलाया जा रहा हो।

कठिन परिस्थिति को देखते हुए पंगत खिलाने वालों ने अपने हिसाब से एक अलग सिस्टम बना लिया था—अगर एक-दो लोग भी उठने लगते, तो सबकी पत्तलें उठा ली जाती थीं; यानी टेबल से उठाकर सीधे कंटेनर में डाल दी जाती थीं, और फिर दूसरी पंगत के लिए पत्तलें लगाई जाने लगती थीं।

हम सभी बच्चे काफ़ी देर से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। उस कार्यक्रम में न रसगुल्ला था, न गुलाब जामुन; मिठाई में सिर्फ़ कपासी रंग की बेसन की बर्फ़ी शामिल थी।
जैसे ही हम सब दोस्त टेबल-कुर्सियों पर बैठे और सुकून से खाना खाने लगे, हम यह भूल गए कि हमारे साथ भी वही होने वाला है, जो बाक़ी सभी के साथ हो रहा था।

दूर से कुछ लोग उठे और उनकी पत्तलें उठनी शुरू हुईं—तो हमने जल्दी-जल्दी अपनी बर्फ़ी उठा ली। पेट तो नहीं भरा, लेकिन वहाँ ऐसा पल आया कि हम सब दोस्त खुलकर हँस पड़े।

हुआ यूँ कि मेरे चाचा का लड़का हमसे कुछ दूर बैठा था। वह खाने में इतना मग्न था कि उसे ज़रा भी ख़बर नहीं रही कि पत्तल उठाने वाले अब उसके क़रीब आ पहुँचे हैं। जैसे ही उसकी पत्तल उठी, उसने अफ़रा-तफ़री में ऐसी फुर्ती दिखाई कि अपनी उठती पत्तल में से ही बर्फ़ी झपट ली। 😁

वह बर्फ़ी भी कोई मामूली नहीं थी—उसका कपासी रंग ही उसे अपने आप में ख़ास बना रहा था।

ख़ैर, यह तो थी टेबल-कुर्सियों पर खाने की बात। समय के साथ कुछ लोगों ने शादियों में बुफे सिस्टम अपनाना शुरू कर दिया, और देखते-ही-देखते इसका क्रेज़ बढ़ता चला गया। उस दौर में हम इसे ‘बफ़र सिस्टम’ कहा करते थे।
बचपन में यह हमें बेहद आकर्षक लगता था—क्योंकि वहाँ सब कुछ बिना गिनती के मिलता था।

पर सच्चाई यह है कि वही कुर्सी-टेबल पर बैठकर पत्तल-दोनों पर परोसा जाने वाला खाना खाने का अनुभव ही सबसे बेहतरीन था। मिठाई इंसान कितनी खाता है?—एक, दो, तीन या ज़्यादा से ज़्यादा पाँच पीस। और अपनी बात करूँ, तो मैं दो पीस से ज़्यादा नहीं खा पाता।
उस समय का खाना इतना स्वादिष्ट होता था कि उसे खाकर मन को जो सुकून मिलता था, वैसा सुकून आज के बुफे में परोसे गए तमाम देसी-विदेशी आइटम भी नहीं दे पाते।

पत्तल-दोनों पर परोसे जाने वाले खाने का स्वाद ही कुछ और था। लोग सुकून से बैठकर खाते थे, प्यार से खिलाया जाता था… और नब्बे के दशक के गाने बजते रहते थे—वही अनुभव सचमुच बेहतरीन था।

उन दिनों किसी-किसी की शादी में बफ़र सिस्टम सिर्फ़ दिखावे का होता था। मिठाई के स्टॉल पर एक ख़ास आदमी खड़ा कर दिया जाता था, जिसे सख़्त हिदायत होती थी कि बच्चों को सिर्फ़ एक रसगुल्ला या गुलाब जामुन देना—उसके बाद नहीं।
बाहर से देखने पर सब कुछ खुला-खुला और भरपूर लगता था, लेकिन भीतर से गिनती और कंजूसी का पूरा हिसाब चलता था।

यहीं से शादियों के खाने और महफ़िल सजाने की असली तस्वीर सामने आती है। यह ऐसी स्थिति है कि यहाँ बड़े दिल वाला भी ग़लत ठहर सकता है और छोटे दिल वाला भी।

आजकल दिखावे की इस कदर महफ़िल सजाई जा रही है कि हर जगह भेड़चाल के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। कोई शख़्स अमीरी झाड़ने के लिए शादियों में अलग-अलग वैरायटी की तमाम मिठाइयाँ और दुनिया भर के स्वादिष्ट आइटम सजा देता है—मानो ज़रूरत नहीं, बल्कि दिखावे की होड़ चल रही हो।

और लोगों का भी क्या कहना! वे इन्हें ऐसे खाते हैं, मानो खाकर कोई बहुत बड़ा कारनामा कर रहे हों। कभी कोई आइटम पूरा खा लिया जाएगा, तो कभी उसे यूँ ही छोड़ दिया जाएगा।
और अगर नॉनवेज की व्यवस्था भी हो, तो वहाँ यह पागलपन और ज़्यादा खुलकर सामने आ जाता है।

चिकन-मटन से बनी तमाम डिशें सजाई जाती हैं, और अब तो आलम यह है कि लगभग जानवर के आकार में दिखाई देने वाला भुना मटन भी सजा दिया जाता है—सिर्फ़ इसलिए कि इससे पहले किसी अमीर आदमी ने अपनी शादी में ऐसा किया था।

नॉनवेज में इस तरह का रूप दिखाना न तो मटन की किसी डिश में सही है और न ही चिकन में—यानी मांस को इस अंदाज़ में परोसना कि देखकर जानवर की पूरी छवि का एहसास हो जाए। यह सब हरकतें पागलपन के सिवा कुछ नहीं हैं। खाने में सजावट के नाम पर ऐसी प्रस्तुति, जो जानवर की पूरी छवि उभार दे, स्वाभाविक रूप से असहज ही लगती है।

नॉनवेज खाते वक्त इंसान यही चाहता है कि उसके सामने सिर्फ़ खाने का पीस हो, न कि ऐसा रूप, जिसे देखकर वही जानवर याद आ जाए—क्योंकि ऐसा दृश्य अधिकांश लोगों को अच्छा नहीं लगता।

कुछ लोग नॉनवेज के बेहद शौकीन होते हैं; उन्हें इन बातों से बिल्कुल फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कई वेजिटेरियन ही नहीं, बल्कि बहुत-से नॉनवेजिटेरियन लोगों को भी ऐसी प्रस्तुति गहरी असहजता में डाल देती है—बल्कि उनके लिए यह अनुभव बेहद अप्रिय हो जाता है।

तो फिर सवाल यह उठता है कि भेड़चाल का हिस्सा क्यों बना जाए? क्यों न ऐसा रास्ता चुना जाए, जिसमें नॉनवेजिटेरियन और वेजिटेरियन—दोनों ही सहज महसूस करें और किसी की भावनाएँ आहत न हों।

दुबई या मिडिल ईस्ट के अन्य देशों के खान-पान की वीडियो देखी जाएँ, तो यह साफ़ समझ में आता है कि वहाँ ऐसी प्रस्तुतियाँ उनकी स्थानीय सजावट और संस्कृति का हिस्सा हैं। लेकिन कुछ लोगों ने उन्हीं देशों की नकल करते हुए भारत में भी शेखी बघारनी शुरू कर दी है। उसी की देखा-देखी यहाँ भी लोग वही भेड़चाल वाली हरकतें दोहराने लगे हैं।

मेरा लोगों से बस यही कहना है—उनकी नकल न की जाए। वे वे हैं, और हम हम।

और आजकल तो यह भी देखने को मिल रहा है कि दिल्ली की जामा मस्जिद की मुख्य सड़क—जो स्ट्रीट फूड के मामले में काफ़ी मशहूर है—वहाँ कई लोग दुबई के शेखों जैसा गेटअप अपनाकर, खुद को ‘हबीबी’ की तरह पेश करते हुए, ‘मोहब्बत का शरबत’ बेच रहे हैं। उनकी हरकतें देखकर कहीं से भी यह नहीं लगता कि वे खुद को किसी शेख से कमतर समझते हों। इसी वजह से एक शख़्स ने उनकी वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दी, जिसमें वह यह कहते हुए नज़र आता है—

“भाई, ये जो लोग ‘हबीबी’ बने फिर रहे हैं न, इन्हें शेख अपनी ख़ाज खुजवाने के लिए भी न रखें!”

ख़ैर, यह उस शख़्स का कहना है। मेरा कहना बस इतना है कि भारत के लोगों के डीएनए में खाने को लेकर एक अलग ही नज़रिया है। इसलिए यहाँ ऐसी कोई भी बाहरी परंपरा नहीं अपनाई जानी चाहिए, जो लोगों को असहज करे या पसंद न आए।

क्योंकि अगर देश-विदेश पर नज़र डालें, तो भोजन को लेकर ऐसी-ऐसी परंपराएँ देखने को मिलती हैं, जिन्हें हम भारतीय शायद देखना भी न चाहें। इसलिए मेरा सुझाव बस इतना-सा है—नॉनवेज डिशों का रूप वही रहने दिया जाए, उसी रूप और आकार में, जो यहाँ के लोगों को सहज, स्वीकार्य और सामान्य लगे।

वरना दुनिया भर की सभ्यताएँ इतनी अलग-अलग हैं कि कई बार उन्हें देखकर इंसान सिर पकड़कर बैठ जाए। इसलिए किसी भी चलन को अपनाने से पहले लोगों की सोच, भावना और सहजता का ध्यान रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।
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