तस्वीरों में अपना-सा ईरान, खबरों में पराया क्यों?
Emotionsकुछ चित्र ऐसे होते हैं जो सिर्फ तस्वीरें नहीं होते…
वे यादों के दरवाज़े होते हैं।
उन्हें देखते ही बचपन की खुशबू, मासूमियत और सादगी जैसे फिर से ज़िंदा हो उठती है—
और हम अनजाने में ही उसी दुनिया में लौट जाते हैं,
जहाँ ज़िंदगी आसान थी… और दिल सच्चे थे।
ऐसे ही कुछ चित्रों ने मुझे रोक लिया।
इतना कि एक दिन मेरी नज़र उनके सिग्नेचर पर ठहर गई।
थोड़ा खोजा… और तब पता चला कि ये खूबसूरत रचनाएँ एक ईरानी कलाकार अली मिरी की हैं।
उनकी कला सिर्फ चित्र नहीं बनाती—
वो एहसास जगा देती है।
कहीं बच्चे खेलते दिखते हैं,
कहीं परिवार एक साथ बैठा होता है…
और हर दृश्य में एक सुकून छुपा होता है,
जो धीरे-धीरे दिल में उतरता जाता है।
उनके कुछ चित्रों में दीवार पर रुहोल्ला खोमैनी की तस्वीर भी नजर आती है—
जो उनके ईरानी परिवेश की झलक देती है…
लेकिन भावनाएँ?
वो बिल्कुल अपनी-सी लगती हैं।
और शायद यहीं से एक सच्चाई समझ में आती है—
ईरान के लोग भी हमारी तरह ही हैं…
वही हँसी, वही रिश्ते, वही छोटी-छोटी खुशियाँ, वही ज़िंदगी।
तो फिर सवाल उठता है—
जिस देश के लोग इतने अपने जैसे हैं…
उसे दुनिया के सामने “पराया” क्यों दिखाया जाता है?
अक्सर दुनिया में “अच्छा” और “बुरा” तय करने का पैमाना भी ताकत से तय होता है।
आपने सुना होगा—
ईरान पर दबाव इसलिए है क्योंकि वह न्यूक्लियर प्रोग्राम चला रहा है।
यह सच है कि दुनिया में सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है…
लेकिन क्या पूरी कहानी सिर्फ इतनी ही है?
अगर थोड़ा गहराई से देखें, तो बात सिर्फ न्यूक्लियर या आतंकवाद की नहीं लगती…
बात लगती है—नियंत्रण की, ताकत की, और यह तय करने की कि कौन झुकेगा और कौन नहीं।
ईरान की “गलती” क्या थी?
बस इतनी कि उसने कहा—
हम अपने फैसले खुद लेंगे।
अपने संसाधनों पर अपना हक माँगा।
और झुकने से इंकार किया।
फिर क्या हुआ?
प्रतिबंध लगे।
छवि खराब की गई।
दबाव बढ़ाया गया।
संदेश सीधा था—
या तो झुको… या झुका दिए जाओ।
आज की दुनिया देखिए—
हमले होते हैं… जवाब दिए जाते हैं।
लेकिन इस टकराव के बीच सबसे ज्यादा कौन पिसता है?
मासूम लोग।
आज ग़ज़ा में हज़ारों बच्चे, औरतें, परिवार—अपनी जान गंवा चुके हैं।
अस्पताल तक सुरक्षित नहीं रहे।
कारण बताया जाता है—
वहाँ आतंकी छिपे थे।
लेकिन एक सवाल दिल में चुभता है—
अगर किसी जगह कुछ गलत लोग छिपे हों…
तो क्या उस पूरी जगह को मिटा देना इंसाफ़ है?
क्या वे बच्चे भी दोषी थे?
यहीं एक पुरानी कहानी याद आती है—
एक धनी व्यक्ति था, जिसके पास एक बंदर था, जो उसकी सेवा करता था।
एक दिन वह व्यक्ति सो रहा था।
एक मक्खी बार-बार आकर उसे परेशान कर रही थी।
बंदर ने यह देखा… और उसे सहन नहीं हुआ।
वह मक्खी को भगाने की कोशिश करता रहा,
लेकिन जब वह बार-बार लौटती रही, तो वह झुंझला गया।
आखिरकार उसने एक बड़ा पत्थर उठाया…
और ज़ोर से वार कर दिया।
लेकिन उस एक वार में…
उसने अपने ही स्वामी की जान ले ली।
सीख बहुत साफ है—
मूर्खता और जल्दबाज़ी,
हमेशा विनाश लाती है।
आज भी कहीं-कहीं यही हो रहा है—
एक को खत्म करने के नाम पर
सैकड़ों मासूमों को मिटा दिया जाता है।
असल मुद्दा क्या है?
सिर्फ हथियार नहीं।
सिर्फ आतंकवाद नहीं।
असल खेल है—
ताकत, संसाधन और नियंत्रण।
और सबसे बड़ी सच्चाई?
ताकतवर देश कहानियाँ बनाते हैं…
और दुनिया उन्हें सच मान लेती है।
लेकिन असली कहानियाँ कहीं और लिखी जाती हैं—
मासूमों के खून में,
टूटी हुई छतों के नीचे,
और उन आँखों में…
जो आज भी बस एक ही सवाल पूछ रही हैं—
“हमारा कसूर क्या था?”
लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।
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