सवाल चावल पर उठते हैं, बिरयानी पर नहीं!

सवाल चावल पर उठते हैं, बिरयानी पर नहीं!

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

गर्मियों में फ्रिज अक्सर जरूरत से ज्यादा भरा-भरा रहने लगता है। कारण भी साफ है — शरीर और दिल दोनों को ठंडक देने वाली चीजें उसी में जगह मांगती रहती हैं। कभी ठंडे पानी की बोतलें, कभी मौसमी फल, कभी दही, सलाद, हरी सब्जियां, रायता, बची हुई दाल-सब्जी, तो कभी रात का आटा। कुल मिलाकर फ्रिज ऐसा महसूस होने लगता है जैसे कोई छोटा-मोटा गोदाम हो।

इसी भीड़भाड़ के बीच पिछले कई दिनों से मेरी नजर एक बड़े कटोरे पर बार-बार जा रही थी। उसमें पके हुए चावल रखे थे। पहले दिन लगा ठीक है, दूसरे दिन लगा चलो अभी भी चल जाएगा, लेकिन तीसरे दिन जब नया सामान रखने के लिए मैंने फ्रिज खोला और वही कटोरा सामने दिखाई दिया, तो मेरे अंदर का “फ्रिज मैनेजर” भड़क उठा।

अब मन में बस यही चल रहा था कि या तो इन चावलों का खेल खत्म करो या इन्हें बाहर निकालो। आधा फ्रिज तो मानो इन्होंने ही घेर रखा था।

असल वजह यह नहीं थी कि कोई उन चावलों को खा नहीं रहा था, बल्कि उन्हें नजरअंदाज किए जाने की वजह यह थी कि घर में हर दिन कुछ न कुछ ताजा और स्वादिष्ट बन रहा था। ऐसे में बेचारे चावल लगातार फ्रिज में पड़े अपनी किस्मत का इंतजार कर रहे थे।

मैंने सोचा कि आखिर किया क्या जाए।

तभी मन में विचार आया कि क्यों न इन्हें बढ़िया तरीके से फ्राई कर दिया जाए। लेकिन अगले ही पल दिमाग ने सवाल दाग दिया — तीन दिन पुराने चावल… कहीं ज्यादा तो नहीं हो गए? एक-दो दिन होते तो बात अलग थी।

फिर मैंने चैटजीपीटी से पूछा कि तीन दिन पुराने चावल खाना ठीक है या नहीं।

उसने बताया कि अगर पके हुए चावल 3–4 दिन तक फ्रिज में सही तरीके से रखे गए हों, तो कई लोग उन्हें खा लेते हैं, लेकिन इसमें थोड़ा रिस्क रहता है। खासकर चावल में ‘बैसिलस सेरियस’ नाम का बैक्टीरिया बढ़ सकता है, जो फूड पॉइज़निंग का कारण बन सकता है।

फिर चैटजीपीटी ने ध्यान रखने वाली कुछ जरूरी बातें भी बताईं — चावल पकने के बाद उन्हें जल्दी ठंडा करके फ्रिज में रखा गया हो, फ्रिज ठीक से ठंडा हो, और उन चावलों को बार-बार बाहर निकालकर गर्म-ठंडा न किया गया हो। साथ ही यह भी कहा कि 1–2 दिन के अंदर खाना सबसे सुरक्षित माना जाता है और 3–4 दिन पुराने चावल में सावधानी ज्यादा बेहतर है। अगर कभी बिजली गई हो, फ्रिज बंद रहा हो या चावल लंबे समय तक बाहर रहे हों, तो उन्हें नहीं खाना चाहिए।

आखिरकार, मैंने निर्णय लिया कि अब इन चावलों का सम्मानजनक पुनर्जन्म किया जाए। इसलिए सबसे पहले प्याज को बढ़िया तरीके से फ्राई किया। फिर उसमें कुटा जीरा, कुटी सौंफ और कुटी काली मिर्च डाली। उसके बाद उबाले और निचोड़े हुए सोया चंक्स डाले, फिर हरी मिर्च, टमाटर और दूसरी सब्जियां डालीं, और आखिर में उन चावलों को ऐसा तगड़ा फ्राई किया कि साधारण लेफ्टओवर राइस एकदम देसी फ्राइड राइस में बदल गए।

लेकिन कहानी में ट्विस्ट अभी बाकी था।

इतनी मेहनत से साधारण चावलों को वेज पुलाव जैसा शानदार रूप देने के बाद अचानक मैंने ताजा खाना ही खा लिया, क्योंकि भिंडी, रायता और घी चुपड़ी रोटियों के नज़ारे ने मेरा मूड ही बदल दिया। उस समय सोचा कि रात में भूख लगेगी तो फ्राइड राइस खा लूंगा।

लेकिन रात आई और साथ में याद आया कि मैंने नहाने जाने से पहले मैंगो जूस बनाया था और अपने हिस्से का जूस पहले से ही फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दिया था, ताकि बाद में उसे सुकून से पी सकूं।

फिर क्या था…

मैंने एक बेहद बड़े कांच के गिलास में स्ट्रॉ लगाया और सुकून से यूट्यूब वीडियो देखते हुए पूरा जूस पी गया। उसके बाद पेट ने अंदर से मानो ऐलान कर दिया — “अब भाई, एक दाना भी अंदर नहीं आएगा…”

अब समस्या यह थी कि शानदार मसालेदार सोया फ्राइड राइस फ्रिज में पड़े थे और मेरे पेट में उनके लिए एक चम्मच जगह भी नहीं बची थी। इसके बाद मामला सिर्फ खाने का नहीं रहा था। अब यह भावनात्मक लगाव का विषय बन चुका था। आखिर इतनी मेहनत… तेल, मसाले और सब्जियां… सब बेकार कैसे जाने देता?

उस रात चैटजीपीटी के वैज्ञानिक ज्ञान से हटकर मेरे मन में एक अलग ही ख्याल आया — वह यह कि खाने के मामले में इंसान अक्सर सुरक्षा से पहले स्वाद को चुनता है।

सच कहूं, अगर यही साधारण चावल न होकर लज़ीज़ बिरयानी होती, तो शायद मैं चैटजीपीटी से एक भी सवाल नहीं पूछता। सीधे बिरयानी गरम करता, प्लेट भरता और चुपचाप खा जाता।

यही इंसानी स्वभाव है।

जब खाना साधारण होता है, तो दिमाग वैज्ञानिक बन जाता है। लेकिन जब वही चीज मसालों, तड़के और लज़ीज़ स्वाद में बदल जाए, तो इंसान अंदर ही अंदर दार्शनिक बन जाता है और फिर अपने मन ही मन सोचता है — “जिंदगी में थोड़ा जोखिम तो चलता है…”

आपने अक्सर लोगों को यह कहते सुना होगा कि चाय में मक्खी गिर जाए तो इंसान पूरी चाय फेंक देता है, लेकिन वही मक्खी अगर घी में गिर जाए, तो लोग सिर्फ मक्खी निकालकर घी फिर इस्तेमाल कर लेते हैं।

दरअसल, इसी इंसानी स्वभाव को समझने के लिए एक सटीक उदाहरण यह भी है —

फ्रिज में दिनों तक रखे साधारण चावलों पर इंसान शक करता है, सवाल पूछता है… लेकिन वही इंसान फ्रिज में उतने ही दिन रखी लज़ीज़ बिरयानी चुपचाप चट कर जाता है।

लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।
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