रुकी हुई सोच और भागती हुई शान: कुदरत का अनोखा फॉर्मूला

रुकी हुई सोच और भागती हुई शान: कुदरत का अनोखा फॉर्मूला

Ghibli-style illustration inspired by Shabbir Khan’s life and writings

आप लोगों ने अक्सर देखा होगा कि कुछ लोग अमीर तो बहुत होते हैं, पर दुनिया मानो उनके साथ कुछ ऐसा कर देती है कि उनका समझदारी वाला GPS जैसे सालों पहले ही स्विच ऑफ हो गया हो।

आपने ऐसे महापुरुष ज़रूर देखे होंगे—अमीरी का ऐसा नशा कि शादी-ब्याह में बंदूक लटकाकर पहुँचते हैं। सुरक्षा? अरे भाई, सुरक्षा तो बस एक बहाना है, असली मकसद तो ये बताना है कि दुनिया वालो! “देखो, मैं अमीर हूँ!”
उधर लोग सोच रहे होते हैं—“हाँ भाई, अमीर हो, पर सोच का क्या? वो भी कभी रिचार्ज कर लिया करो!”

किसी ने बहुत सटीक कहा है—कुदरत जब देती है, तो कुछ छीन भी लेती है। शायद इन्हें पैसे देते वक्त कुदरत ने बुद्धि का हिस्सा थोड़ा शॉर्ट-सर्किट कर दिया। वरना हराम की कमाई से अमीरी जमा लेने वालों में इतना दिखावा क्यों फूटता?
असली उद्योगपति तो दस सिक्योरिटी गार्ड के साथ भी बिना अट्टीट्यूड घूम लेते हैं—क्योंकि वे जानते हैं कि रुतबा जेब से नहीं, काम से बनता है।

अब ज़रा नज़र डालिए उन महफ़िल-प्रेमियों पर, जो इन दिखावेबाज़ों के इर्द-गिर्द ऐसे चक्कर काटते दिखाई देते हैं जैसे ग्रह अपने सूरज के चारों ओर घूमते हों। और जब ये दिखावेबाज़ बोलना शुरू करते हैं, तो टॉपिक भी क्या होते हैं—

बिज़नेस डील, महंगी कारें, ऊँची बिल्डिंगें… यानी वो सारी चीज़ें जिनके बिना शायद इनका आत्मविश्वास सुबह बिस्तर से उठने की हिम्मत ही न जुटा पाए।
इन दिखावेबाज़ों का एक स्पेशल “इडियट क्लब” भी होता है—कोट-पैंट में हमेशा तैयार, और अपने ही फुलाए हुए अट्टीट्यूड के गुब्बारे में तैरता हुआ।

पर सच कहूँ तो इनकी शक्लें और ये हरकतें सिर्फ़ उन्हें ही अच्छी लगती हैं जिनका IQ हमेशा के लिए छुट्टी पर चला गया हो। वरना बड़ी सोच वाले लोग तो इनके आस-पास खड़ा होना भी पसंद नहीं करते। और नतीजा ये होता है कि कभी-कभी ऊँची सोच वालों को इन दिखावेबाज़ों के चमचों से यह तक सुनना पड़ जाता है कि “अरे, वो तो इनसे जलते हैं!”

हाँ भाई, जलते हैं… अपनी किस्मत पर कि ऐसे लोगों की सोहबत में फँस गए!

छोड़िए इन साज-ठाठ की नक़ली चमक में डूबे टपोरियों को—अब आगे बढ़ते हैं।

अब उन महानुभावों की भी बात कर लें जो महंगे कुत्तों के साथ फिरंगियों की स्टाइल में सुबह-सबेरे निकलते हैं। चेन पकड़ने का उनका अंदाज़ बताता है कि वे वॉक पर नहीं, अपने “फ़र्जी रुआब” की शोभायात्रा पर निकले हैं—और रास्ते भर ऐसे संवाद करते हैं मानो कोई अदृश्य पत्रकार उनके शब्द नोट कर रहा हो।

बेशक, हर बंदूक वाला और कुत्ता पालने वाला गलत नहीं। कुछ को सच में शौक होता है, कुछ को जरूरत। मेरा निशाना सिर्फ उन पर है जो:

  • शो-ऑफ करते हैं,
  • स्टाइल मारते हैं,
  • इडियट जैसे लगते हैं,
  • महँगी चीजों के साथ फोटो खिंचवाने को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानते हैं,
  • और अपनी “क्रिएटिविटी” का ऐसा दिखावा करते हैं कि देखने वाला बोले—“भाई, रहम कर दो!”

अब जमाना ऐसा है कि बच्चों का भी अट्टीट्यूड 5G स्पीड से आगे निकल चुका है।
कल ही एक 9–10 साल का बच्चा अपने दोस्त से अकड़ के साथ बोल रहा था—“मेरे पापा के पास इतने सारे क्रेडिट कार्ड हैं!”
थोड़ी देर बाद दूसरा बोला—“तू एडिटिंग क्या जाने? मेरी एडिटिंग देख के सिर पकड़ लेगा!”

अब जब बड़े ही बच्चों जैसा व्यवहार करें तो बच्चों से क्या शिकायत?

उन्हें कौन समझाए कि:

  • समझदारी क्रेडिट कार्ड गिनने में नहीं, सही कार्ड चुनने में है।
  • समझदारी एडिटिंग सीख लेने में नहीं, बल्कि एडिटिंग की हर बारीकी को समझने में है।
  • समझदारी महँगे कपड़ों में अकड़ दिखाने में नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व की गहराई जानने में है।

अब आते हैं उस तंज़ पर, जो डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब ने बड़ी सटीकता से इन दिखावेबाज़ों पर साधा था। अपनी किताब “माय जर्नी” में वे लिखते हैं—

“हमारे देश में यह एक अजीब तरीक़ा है, एक अजीब-सा ढंग है—अपने लोगों को हद-दर्जे तक निचोड़ लेने का, जो हमारे लोगों को इंतहा-पसंद बना देता है। शायद इसलिए कि सदियों से इस देश ने ग़ैर-मुल्की तहज़ीब के ज़ख़्म भी खाए हैं और उन्हें अपने दामन में जगह भी दी है। अलग-अलग हुक्मरानों से वफ़ा करते-करते हम अपनी हैसियत, अपनी यकताई खो बैठे हैं। बल्कि हमने एक और ही क़िस्म की ख़ूबी पैदा कर ली है—कि एक ही वक़्त में रहमदिल भी हैं और बेरहम भी, हस्सास भी हैं और बेहिस भी; जितने गहरे हैं, उतने ही सतही। ऊपर से देखो तो हम बड़े ख़ुशरंग और ख़ूब-रू नज़र आते हैं, लेकिन कोई ग़ौर से देखे तो अपने हुक्मरानों की एक बेढंगी नकल से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। मैंने कानपुर में कल्ले में दबाए हुए पान वाले नवाब वाजिद अली शाह के नक़लची बहुत देखे हैं, और बेंगलूर में फिरंगी के अंदाज़ में कुत्ते की ज़ंजीर थामे टहलते हुए साहिबों की कमी नहीं थी। बेंगलूर में रहकर मैं रामेश्वरम के सुकून और गहरे शांत वातावरण के लिए तरसता था।”

मतलब साफ़ है—वे फिरंगी ही असली फिरंगी थे, और वह नवाब ही असली नवाब थे। उनकी पहचान उनकी मौलिकता में थी; न उनकी जगह कोई और बन सकता है, न उनकी नकल करने वाले कभी उनकी सतह तक पहुँच सकते हैं।
वह वो थे… और तुम, तुम हो।

अब जब फिरंगी और नवाब का ज़िक्र छिड़ा ही है, तो न जाने क्यों मेरा ध्यान ग़ालिब की किसी ख़ास बात पर चला गया, जिससे जुड़ा एक वीडियो अभी-अभी मैंने यूट्यूब पर देखा था, जहाँ बात यूँ ही छिड़ गई। तो चलिए, एक और तरह की प्रवृत्ति पर भी नज़र डाल लेते हैं—फ़र्क़ बस इतना है कि अब तक बात दौलत के दिखावेबाज़ों की थी, और अब रुख़ ज्ञान के दिखावेबाज़ों की ओर है।

कुछ लोग ग़ालिब के शेरों का ऐसा पोस्टमॉर्टम कर रहे हैं कि अगर ग़ालिब ख़ुद होते, तो शायद कह देते—
“साहब, मेरी नहीं तो अपनी इज़्ज़त ही बचा लीजिए!”

ये लोग भाषण देते हैं, छात्रों को ज्ञान बाँटते हैं, और ग़ालिब के प्रति श्रद्धा भी दिखाते हैं—लेकिन शेरों के मतलब की बात आते ही उनका दिमाग अपनी ही दुनिया में चला जाता है, जहाँ असली अर्थ नहीं, बल्कि बस उनका गढ़ा हुआ मतलब चलता है।

उदाहरण के तौर पर ग़ालिब का यह मशहूर शेर—

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

आज के समय में प्रचलित अधिकांश व्याख्याओं के अनुसार, ग़ालिब इस शेर के ज़रिये यह कहना चाहते हैं कि—
उन्हें जन्नत की सच्चाई का बोध है; यानी जन्नत कोई ठोस, आँखों-देखी हक़ीक़त नहीं, बल्कि एक कल्पना, एक आस्था और एक तसल्ली भर है।
फिर भी, इस जीवन की कठिनाइयों के बीच, दिल को ढाढ़स देने और आशा बनाए रखने के लिए यह मान लेना कि जन्नत है—मन को अच्छा लगता है और सुकून देता है।

यानी कुछ लोगों का मानना है कि ग़ालिब इस शेर के माध्यम से यह कहना चाहते हैं कि सच जानने के बावजूद, दिल को ज़िंदा रखने के लिए कुछ ख़्वाब ज़रूरी होते हैं।

कुछ विद्वानों द्वारा इस शेर की ऐसी व्याख्या की जाती है, जिसमें ग़ालिब को सीधे-सीधे धर्म-विरोधी साबित कर दिया जाता है। इसी संदर्भ में कार्ल मार्क्स का उदाहरण भी दिया जाता है—यह कहा जाता है कि मार्क्स इस शेर से बहुत प्रभावित हुए, क्योंकि उन्हें लगा कि ग़ालिब भी उसी तरह सोचते हैं, जैसा वे स्वयं सोचते थे।

संभव है कि अंग्रेज़ी अनुवाद में यह शेर पढ़ते समय मार्क्स को ऐसा अर्थ दिखाई दिया हो। लेकिन सवाल यह है कि जो लोग ग़ालिब की ज़िंदगी और हिंदी-उर्दू की बारीकियों से परिचित हैं, वे भी उसी एकमात्र निष्कर्ष पर क्यों अटक जाते हैं?

ग़ालिब के शेर बहु-अर्थी होते हैं। मेरी समझ में इस शेर का एक और, उतना ही स्वाभाविक अर्थ भी आता है—

ग़ालिब यह नहीं कह रहे कि जन्नत झूठ है या काल्पनिक है।
वे यह कह रहे हैं कि—

मुझे जन्नत की हक़ीक़त मालूम है।
यानी जन्नत में सुकून है, आराम है, नेमतें हैं—सब कुछ है।

लेकिन मेरी मौजूदा ज़िंदगी—
मेरी आदतें, मेरी कमज़ोरियाँ, मेरा जीने का ढंग—
शायद उस जन्नत के पैमाने पर खरा न उतरे।

यानी यह कहना कि—

“मैं जन्नत की हक़ीक़त जानता हूँ,
लेकिन मेरी ज़िंदगी शायद उस पैमाने पर पूरी नहीं उतरती।”

यह न सिर्फ़ ग़ालिब की भाषा से मेल खाता है, बल्कि उनके मिज़ाज से भी।

ऐसे में अभी जो थोड़ा-सा दिल बहलाने का सहारा है,
जो सोच है, जो तसल्ली है,
वही मेरे लिए काफ़ी है।

और इसी बिंदु पर दूसरी पंक्ति आती है—

“दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।”

यानी यह एक आत्म-स्वीकार है, न कि इंकार।

मेरा यह अनुमान भी पूरी तरह मुनासिब है कि यह शेर शायद तब कहा गया हो, जब कोई उन्हें धार्मिक नसीहत दे रहा हो।

ग़ालिब अक्सर ऐसे मौकों पर सीधी टकराहट नहीं करते।
वे तंज़, तहज़ीब और गहराई से जवाब देते हैं।

यह शेर भी वैसा ही जवाब लगता है—

न बहस,
न इंकार,
न बग़ावत—

बस एक मुस्कुराता हुआ,
ख़ुद को पहचानता हुआ वाक्य।

अगर एक पंक्ति में अपनी व्याख्या को समेटूँ, तो—

ग़ालिब जन्नत पर शक नहीं कर रहे,
वे अपनी ज़िंदगी की सच्चाई को स्वीकार कर रहे हैं।

और यही बात इस शेर को आज भी ज़िंदा, मानवीय और ईमानदार बनाती है।

इस शेर में धर्म को नकारने जैसा कुछ भी अनिवार्य रूप से नहीं है। मार्क्स का धर्म-विरोध उनके अपने दर्शन का हिस्सा था, लेकिन ग़ालिब को उसी चश्मे से देखना ज़रूरी नहीं।

दरअसल, ग़ालिब की शायरी में अक्सर यह बात दिखती है कि वे अगर धर्म के मुताबिक पूरी तरह न भी चल पा रहे हों, तो भी अपने आप को लेकर आत्म-स्वीकृति और कभी-कभी अफ़सोस ज़रूर ज़ाहिर करते हैं। उनके कुछ शेर देखिए—

ठिकाना क़ब्र है तेरा इबादत कुछ तो कर ‘ग़ालिब’
कहते हैं ख़ाली हाथ किसी के घर जाया नहीं करते

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुमको मगर नहीं आती

बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई

अब ज़रा ठहरकर सोचिए—
क्या ये किसी ऐसे शख़्स के शेर लगते हैं, जो धर्म को संदेह की दृष्टि से देख रहा हो?
या फिर ये एक ऐसे इंसान की आवाज़ हैं, जो अपनी कमज़ोरियों को पहचानता है और उन्हें छिपाने की कोशिश नहीं करता?

अंत में बस इतना कहना है कि ये बातें किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि एक अलग दृष्टि रखने के इरादे से लिखी गई हैं।
अगर किसी को यह व्याख्या पसंद न आए, तो मेरा निवेदन बस इतना है—या तो लेख को एक बार फिर ठहरकर पढ़ लें, या फिर ग़ालिब का ही यह शेर पढ़कर दिल को थोड़ी तसल्ली दे लें—

‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका शुक्रिया।
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